केंद्र सरकार द्वारा जातिवार जनगणना से उपजे कई प्रश्न, जातिवादी राजनीति करने वाले अब भी ज़िद पर अड़े.. दिनेश मालवीय

केंद्र सरकार द्वारा जातिवार जनगणना से उपजे कई प्रश्न, जातिवादी राजनीति करने वाले अब भी ज़िद पर अड़े.. दिनेश मालवीय
dineshकेंद्र सरकार ने कुछ प्रदेशों की जातिवार जनगणना करवाने की माँग को ठुकरा दिया है. यह भविष्य में समतामूलक समाज की स्थापना कि ओर एक महत्वपूर्ण कदम है. जातिवाद एक ऐसा नासूर बन गया है, जो देश की जड़ों को ही खोखला किये दे रहा है. केंद्र सरकार द्वारा जातिवार जनगणना से मना करने पर उत्तरप्रदेश  के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा है कि, अगर हम सत्ता में आये तो राज्य स्तर पर जातिवार जनगणना करवाएंगे. यह अकेले अखिलेश यादव की बात नहीं है, ऐसे और भी अनेक नेता और दल हैं जो सिर्फ जातिवाद के सहारे ही सत्ता में आते रहे हैं. सत्ता में आने के बाद अपनी जाति लोगों की बेहतरी ही उनका मुख्य काम होता है. ऐसा इसलिए नहीं होता कि, वे अपनी जाति के लोगों के बहुत शुभचिंतक हैं. ऐसा वे केवल अपने वोट बैंक को मजबूत बनाए रखने के लिए करते हैं. उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों में जाति का खेल जमकर खेला जा रहा है. कोई भी राजनितिक दल इससे अछूता नहीं है. कोई रहना भी चाहे, तो व्यावहारिक रूप से अपनी हार को न्योता देने जैसा ही होगा. इसलिए मजबूरी में कुछ दलों को न चाहते हुए भी ऐसा करना पड़ रहा है.



देश में आज सामाजिक बिखराव और बहुत हद तक दिशाहीनता साफ़ दिखाई देती है. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि, आज़ादी के बाद देश में कोई सामाजिक आन्दोलन नहीं हुआ. कोई सर्वमान्य सामाजिक नेता भी नहीं हुआ, जो पूरे समाज को एक इकाई मानकर उसकी भलाई के लिए काम करे. जो भी सामाजिक नेता उभर कर आये, वे या तो अपनी जाति या समुदाय के हितों की रक्षा तक सीमित रहे या समाज सेवा को उन्होंने सियासत में ऊपर जाने के लिए एक सीढ़ी के रूप में ही इस्तेमाल किया. न उनकी सोच में पूरा समाज था और न पूरे समाज ने उन्हें अपना  नेता स्वीकार किया. देश को अंग्रेज़ों की गुलामी से आज़ाद करना की लड़ाई सिर्फ राजनीतिक आज़ादी पाने के लिए नहीं लड़ी गयी थी. इसके नेताओं के मन में यह कल्पना थी कि, आज़ाद भारत में एक ऐसे समाज का निर्माण होगा, जो सारे संसार में एक आदर्श होगा. आज़ादी कि लड़ाई में सभी धर्मों, जातियों और समुदायों के लोगों ने कंधे से कंधा मिलाकर भाग लिया था. आज़ादी के सिपाहियों में जाति-पात या धर्म-समुदाय का कोई भेद ही नहीं था. उनकी एक ही पहचान थी और वह थी “स्वतंतत्रा सेनानी”. सभी स्वतंत्रता सेनानियों का एक ही मंत्र  था-“वंदे मातरम”.




आज़ादी के कुछ वर्ष तक तो सामाजिक एकता का “रोमांस” चला, लेकिन देखते ही देखते पूरा समाज फिर से जाति, फिरकों और समुदायों में विभाजित होता चला गया. इसमें सियासत की सबसे बड़ी भूमिका रही. सियासी दल उम्मीदवारों का चयन उनकी जाति के लोगों की संख्या और  अपनी जाति में उनके प्रभाव के आधार  पर किया जाने लगा. सियासत में आगे जाने की तमन्ना रखने वाले लोगों ने इसके लिए “समाज सेवा” का सहारा लिया. उनकी कथित समाज सेवा सिर्फ सियासत के मैदान में उतारकर सत्ता पाने का साधन ही रही है. इससे विभिन्न जातियों में एकाधिक नेता भी उभरकर आ गये. इसके चलते “गिरोहबंदी” होने लगी. एक ही जाति-समाज के एकाधिक नेताओं में अपनी जाति के ज्यादा से ज्यादा लोगों को साथ लेने की होड़ बढ़ गयी. सियासी दल और नेता यह देखने लगे कि, किस जातीय नेता के साथ कितने लोग हैं. जिसके साथ ज्यादा लोग होते हैं, उसके सिर पर हाथ रख देते हैं. यह गिरोहबंदी कई बार तो “गेंगवार” का रूप ले लेती है. देश में अनेक धर्म हैं और सबके अपने-अपने धर्मगुरु हैं. लेकिन किसी भी धर्मगुरु ने सम्पूर्ण समाज को एक इकाई मानकर उसे एकजुट करने की कोई ठोस कोशिश नहीं की. इसके विपरीत देखा तो यह गया है कि, अनेक कथित धर्मगुरु भी सियासी दलों अपने समुदाय के लोगों के वोट दिलवाने की सुपारी ले लेते हैं. इसके बदले सियासी दल उनकी संस्थाओं को कि प्रकार की सुविधाएं और छूट देते रहते हैं.



उनके गलत कामों की भी यह सोचकर अनदेखी की जाती है, कि कहीं उनका वोट बैंक कमज़ोर नहीं पड़ जाए. इस सूरते-हाल में समाज और देश को बिखराव से बचाने का केवल एक महामंत्र ह कि, हर संभव तरीके से जातिवाद को ख़त्म किया जाए. जाति व्यवस्था अलग चीज़ थी औ रदेश-समाज को उससे किसी समय बहुत फायदा भी  हुआ. लेकिन आज यह नासूर का रूप ले चुकी है. राजनीतिक दलों को अपने सियासी हितों की जगह अब समग्र समाज और राष्ट्र के हित को सामने रखना होगा. जो ऐसा नहीं करे, उसे जनता पूरी तरह ठुकरा दे. यदि जनता ही जातिवाद को नकार देगी, तो नेता भी उससे विमुख होकर अपने पक्ष में जनमत जुटाने का कोई नया तलाश करेंगे. बहरहाल केद्र सरकार का जातिवार जनगणना से इंकार करना एक प्रगतिशील कदम है, जो देश को आगे लेजाने में बहुत सहायक होगा.



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