मार्कंडेय पुराण :नैतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक विषयों का महत्वपूर्ण ग्रंथ-दिनेश मालवीय

मार्कंडेय पुराण संक्षेपmarkanday puran

-दिनेश मालवीय

पुराणों की श्रृंखला में ‘मारमार्कंडेय पुराण’ आकार में छोटा, लेकिन बहुत महत्वपूर्ण ग्रंथ है. इसमें करीब 9 हज़ार श्लोक हैं. इस पुराण में दुर्गा चरित्र और दुर्गा सप्तशती का प्रमुख रूप से वर्णन है. इसी कारण इसे शाक्त सम्प्रदाय का पुराण कहा जाता है. इसमें मार्कंडेय ऋषि ने मानव कल्याण के लिए नैतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और अन्य जीवनोपयोगी विषयों को प्रतिपादित किया है. इसमें भारतवर्ष के विस्तृत रूप और उसके प्राकृतिक सौन्दर्य का बहुत मनोहारी वर्णन है.

इस पुराण में आयुर्वेद के सिद्धांतों के अनुसार शरीरविज्ञान की विवेचना के साथ ही गृहस्थ धर्म की उपयोगिता को बताया गया है.

इस पुराण में संन्यास की अपेक्षा गृहस्थ धर्म को महत्त्व दिया गया है. मनुष्य को सन्मार्ग पर चलने के लिए अनेक तरह से प्रेरित किया गया है. करुणा से प्रेरित कर्म को पूजा-पाठ और जप-तप से बेहतर कहा गया है. ईश्वर की प्राप्ति के लिए ऊँकार की साधना पर बल दिया गया है. इसमें सभी देवी-देवताओं का समान रूप से आदर किया गया है. मदालसा के कथानक के माध्यम से जहाँ ब्राह्मण धर्म का उल्लेख किया गया है, वहीँ अनेक राजाओं के आख्यानों द्वारा क्षत्रिय राजाओं के साहस, कर्तव्यनिष्ठा और राजधर्म की भी सुंदर व्याख्या की गयी है.

इस पुराण के पाँच भाग हैं.

पहले भाग में जैमिनी ऋषि को महाभारत के सम्बन्ध में चार शंकाएं, हैं, जिनका समाधान विंध्यांचल पर्वत पर रहने वाले धर्म पक्षी करते हैं.

दूसरे भाग में जड़ सुमति के माध्यम से धर्म पक्षी सर्ग प्रतिसर्ग अर्थात श्रृष्टि की उत्पत्ति, प्राणियों के जन्म और उनके विकास का वर्णन है.

तीसरे भाग में ऋषि मार्कंडेय अपने शिष्य क्रोष्टिकी को पुराण के मूल प्रतिपाद्य विषय-सूर्योपासना और सूर्य द्वारा समस्त श्रृष्टि के जन्म की कथा बताते हैं.

चौथे भाग में ‘देवी भगवत पुराण’ में वर्णित’ दुर्गा चरित्र’ और ‘दुर्गा सप्तशती’ की कथा का विस्तार से वर्णन है.

पांचवें भाग में वंशानुचरित के आधार पर कुछ विशेष राजवंशों का उल्लेख है.

‘महाभारत’ के सम्बन्ध में पूछे गये चार प्रश्नों के उत्तर में धर्म पक्षी बताते हैं कि श्रीकृष्ण के निर्गुण और सगुण रूप में राग-द्वेष से रहित वासुदेव का प्रतिरूप, तमोगुण से युक्त शेष का अंश, सतोगुण से युक्त प्रद्युम्न की छाया, रजोगुण से युक्त अनिरुद्ध की प्रगति आदि का वर्णन है.

द्रोपदी के पाँच पतियों से जुड़े प्रश्न के उत्तर में वह बताते हैं कि ये पाँचों पति देवेन्द्र इंद्र के ही अंशावतार थे और द्रोपदी इंद्र की पत्नी शची की अंशावतार थीं. लिहाजा उनका पाँच पतियों को स्वीकार करना पूर्वजन्म की कथा से जुड़ा है.

इसमें बलराम द्वारा तीर्थयात्रा में ब्रह्महत्या के शाप सम्बन्ध में धर्म पक्षी बताते हैं कि मद्यपान करने वाला व्यक्ति अपना विवेक खो बैठता है. बलराम भी नशे में ऐसा कर बैठे.

इस पुराण में द्रोपदी के पुत्रों की ह्त्या और सत्यवादी हरिश्चंद्र की पूरी कथा भी दी गयी है. इस ग्रंथ में भार्गव पुत्र सुमति के प्रसंग के जरिये पुनर्जन्म के सिद्धांत का बहुत सुंदर चित्रण किया गया है. मदालसा का आख्यान नारी के उदात्त चरित्र को उजाकर करता है. वह अपने तीन पुत्रों को उच्च कोटि की आध्यात्मिक शिक्षा देती है. वे वैरागी हो जाते हैं. तब पति के कहने पर वह अपने चौथे पुत्र को धर्माचरण, सत्संगति, राजधर्म , कर्तव्य पालन और आदर्श राजा बनने की शिक्षा देती है.

पुराणकार ने श्रृष्टि के विकास क्रम में ब्रह्मा द्वारा पुरुष का सृजन और उसके आधे भाग से स्त्री का निर्माण और फिर मैथुनी श्रृष्टि से पति-पत्नी द्वारा श्रृष्टि का विकास किया जाना बताया गया है. इस पुराण में जम्बू, प्लक्ष,शाल्मलि, कुश, क्रोंच, सूर्य और पुष्कर आदि सप्त द्वीपों का सुंदर वर्णन किया गया है. सारी श्रृष्टि का प्रारंभ सूर्यपुत्र वैवस्वत मनु से बताया गया है. इसमें सूर्य से सम्बंधित अनेक कथाएं दी गयी हैं.

दुर्गा चरित्र और दुर्गा सप्तशती की कथा में मधु-केटभ, महिषासुर शुम्भ-निशुम्भ और रक्त्बीज आदि असुरों के वध के लिए देवी अवतारों की कथाएं भी वर्णित हैं.

इस पुराण में पृथ्वी का भौगोलिक वर्णन नौ खण्डों में है. ऋषियों द्वारा कालगणना, पृथ्वी का भौगोलिक वर्णन और ब्रह्माण्ड की असीमता को गूढ़ रूप में योगसाधना का अंग बताया गया है. ब्रह्माण्ड रचना शरीर में स्थित इस ब्रहमाण्ड के लघु रूप से सम्बंधित प्रतीत होती है, जो बहुत गोपनीय है.


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