भौतिकवाद बनाम अध्यात्मवाद ….भौतिक और अध्यात्मिक शक्तियों का गूढ़ रहस्य …  P अतुल विनोद 

भौतिकवाद बनाम अध्यात्मवाद ….भौतिक और अध्यात्मिक शक्तियों का गूढ़ रहस्य …  P अतुल विनोद 

Materialism vs Spiritualism…. Secret of Physical and Spiritual Powers… P Atul Vinod

भौतिक शक्तियां दिखाई देती है जबकि आध्यात्मिक शक्तियां दिखाई नहीं देती|

अध्यात्मिक शक्तियों का वर्णन तो किया जा सकता है लेकिन प्रदर्शन नहीं .. विज्ञान की आधुनिकतम टेक्नोलोजी भी इसे डिटेक्ट नहीं कर सकती| अध्यात्मिक शक्ति विज्ञान के रडार से बाहर है| 

भौतिक शक्तियों का दुरूपयोग किया जा सकता है, अध्यात्मिक शक्तियों का नही| 

भौतिक और अध्यात्मिक उन्नति साथ साथ चल सकते हैं .. लेकिन तब जब व्यक्ति भौतिक शक्तियों का दुरुपयोग न करे| भौतिक जीवन में बेईमानी, चोरी, हिंसा, पाप, दुराचार करने वाला व्यक्ति अध्यात्मिक उन्नति नहीं कर सकता| 

अध्यात्म आत्म स्थिति में आने का नाम है| 

सामान्यतः कहा जाता है कि अध्यात्म आत्मा को बंधन से मुक्त करने का नाम है| 

वास्तव में आत्मा तो मुक्त है .. उसे कोई बंधन में कैसे बांध सकता है तो बंधन से कौन बंधा है? 

आत्मा की उपस्थिति के कारण मन, प्राण और शरीर से पैदा हुआ “चित्त” ही बंधता है| 

आत्मा सूर्य के प्रकाश की तरह है “चित्त” जिसका उपयोग चाहे जैंसा करे| 

आत्मा रुपी सूर्य के प्रकाश के कारण ही शरीर मन और प्राण .. “चित्त” का निर्माण करते हैं .. और एक स्वतंत्र जीव सत्ता का निर्माण करते हैं| 

जैसे मेरा नाम अतुल है| ये अतुल कौन है? ये आत्मा के प्रकाश में कार्य करने वाले मन, प्राण और शरीर की संयुक्त सत्ता “चित्त” की पहचान है| 

आम मनुष्य इस “चित्त” को ही “मैं” समझता है लेकिन ये चित्त आत्मा की मौजूदगी के कारण अस्तित्व में आया जड़ तत्व है|

आत्मा जब शरीर छोड़ देती है तो प्राण और मन भी साथ छोडकर आत्मा के साथ निकल पड़ते हैं| 

मरने के बाद भी प्राण और मन (सूक्ष्म और कारण शरीर) आत्मा के साथ चिपके रहते हैं इसीलिए उसे फिर नया शरीर लेना पड़ता है| 

आत्मा के प्रकाश में …  मन+प्राण+ स्थूल (पञ्च भूत शरीर) = चित्त 

आध्यात्मिक उन्नति करते हुए व्यक्ति उस अवस्था तक पहुच जाता है जब आत्मा से प्राण और मन भी अलग हो जाते हैं| तब वो मुक्त हो जाती है| 

आध्यात्मिक शक्ति हासिल करना यानी आत्मा के प्रकाश में बने “चित्त” से पूर्ण मुक्ति की यात्रा से जुड़ना| 

उद्बोधित आत्म शक्ति व्यक्ति को चित्त(जड़) से मुक्त करने की यात्रा शुरू कराती है| 

चित्त को फ़ैलाने से संसार(भौतिकता) बढ़ता है और चित्त को संकुचित करने से अध्यात्म|

चित्त खुदको आत्मा समझता है लेकिन चित्त आत्मा नहीं है| चित्त तो आत्मा की मौजूदगी में पैदा हुआ एक आभासी अस्तित्व है| 

इस चित्त को आभासी अस्तित्व इसलिए कहा गया है क्यूंकि ये नित्य नहीं है| न ही ये शुद्ध बुद्ध मुक्त है| इस चित्त के पीछे बैठी आत्मा(पुरुष) .. परमात्मा ही नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त है| 

चित्त के साथ जब आत्मशक्ति जुड़ जाती है तो इसे चेतना कहते है| चेतना की सामान्य अवस्था में व्यक्ति भौतिकवादी ही रहता है| चेतना का सुप्त भाग(कुण्डलिनी) .. ईश्वर के अनुग्रह, गुरु कृपा या प्रारब्ध की साधना के कारण जाग जाता है| 

अब चेतना उच्च स्तरीय हो जाती है और भौतिकता से मुक्त होकर आध्यात्मिकता की तरफ बढने को लालायित होती है| 

जागृत कुण्डलिनी अपनी उच्च स्तरीय बुद्धिमत्ता से व्यक्ति को साधना के पथ पर आगे बढ़ाती है और अहंकार, काम, क्रोध, धमंड, लोभ, लालच, बेईमानी से मुक्त करते हुए चित्त को अन्तर्मुखी करती है| वृत्तियों का निरोध करती है|

आभासी चित्त कमजोर होने लगता है| आभासी पर्दा मिटते ही आत्मा का प्रकाश सामने आ जाता है| 

चित्त की सत्ता समाप्त हो जाति है| व्यक्ति चित्त स्थिति से उपर उठकर आत्म स्थिति में आ जाता है| अब वो चित्त को ही आत्मा नहीं समझता, क्यूंकि चित्त मौजूद ही नहीं तो भ्रम कहाँ रह गया| वास्तविक आत्मा को ही स्वयं मानता है| 

यहाँ ब्रह्म भाव पैदा होता है| जीवन यात्रा सफल हो जाती है| भटकाव बंद होकर पूर्णता आ जाती है|

समय आने पर  शरीर छूटने के साथ आत्मा, सूक्ष्म और कारण शरीर से भी मुक्त हो जाती है| यही आत्मा की मोक्ष की अवस्था है| यही अध्यात्म का चरम लक्ष्य है| 

 

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