EDITORApril 8, 20211min44

धर्म सूत्र 13 : कष्ट,विलाप और बन्धन रुपी माया बन जाएगी सुन्दरी यदि ये जान लोगे: अतुल विनोद 

धर्म सूत्र 13 : कष्ट,विलाप और बन्धन रुपी माया बन जाएगी सुन्दरी यदि ये जान लोगे: अतुल विनोद 

meditation

एक बार नारद जी धरती पर आए उस समय श्री कृष्ण का राज था, नारद जी ने श्री कृष्ण से पूछा प्रभु मुझे आपकी माया को देखना है| श्री कृष्ण ने कहा ठीक है मेरे साथ चलो| श्री कृष्ण और नारद जी चलते-चलते ऐसी जगह पहुंचे जहां आसपास पानी नहीं था| श्री कृष्ण ने नारद से कहा, नारद जी क्या तुम मेरे लिए कहीं से पानी ला सकते हो, नारद जी ने कहा बिल्कुल, आप ठहरिये, नारद जी घूमते घूमते पास के एक गांव में पहुंचे यहां एक घर में वह पानी लेने के लिए रुके| नारद जी ने दरवाजा खटखटाया| अंदर से सुंदर युवती बाहर निकली| नारद जी उसे देखते ही मोहित हो गए| वह भूल गए कि श्रीकृष्ण प्यासे हैं| 

नारद जी उस युवती से बात करने लगे, उसी गांव में रुक गए मोबाइल नंबर का आदान प्रदान हो गया, दोनों के बीच रोज घंटों बात होने लगी| प्यार हुआ, इकरार हुआ| नारद जी उस युवती के पिता से उसका हाथ मांगने पहुंचे| विवाह हो गया| कपल अब उसी गांव में रहने लगे| दोनों की संताने भी हो गई| ससुर साहब नहीं रहे| नारद जी उत्तराधिकारी बन गए| सब कुछ मजे से चल रहा था| नारद जी को याद ही नहीं था वे पानी मांगने आए थे| देखते ही देखते 12 साल निकल गए| लेकिन अचानक उस गांव में बांध टूटने से पानी भर गया| सब अपने बीवी बच्चों के साथ भागने लगे|

नारद जी भी रत्न आभूषण पोटली में भरकर अपने पत्नी और बच्चे को लेकर बाहर निकलने की कोशिश करने लगे|

पानी बढ़ता जा रहा था| स्थिति ऐसी बनी कि पहले एक बच्चा बहा फिर दूसरा बच्चा और आखिर में भार्या भी चली   गई बह| खुद को बचाना था तो पोटली भी छोड़ दी| पानी ने उन्हें सुनसान इलाके में छोड़ दिया|

वो विलाप करने लगे हाय सब कुछ छूट गया|  तभी किसी ने उनकी पीठ पर स्पर्श किया नारद जी जल कहां है? आधे घंटे से मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था और तुम यहां पड़े हुए विलाप कर रहे हो| नारद जी के 12 साल निकल गए लेकिन श्रीकृष्ण तो कह रहे हैं कि सिर्फ आधा घंटा हुआ। 

हम सब का जीवन भी इसी तरह स्वप्न की तरह चलता रहता है| पैदा होने से लेकर मरने तक इसी तरह के दृश्य चलते रहते हैं| हम बहुत कुछ इकट्ठा करते हैं लेकिन आखिर में सब छूट जाता है| फिर हम विलाप करते हैं लेकिन जब आंख खुलती है तो पता चलता है कि वह जिसे हमें जीवन समझ रहे थे माया थी, एक भ्रम था, जो गुजर गया|

हम पैदा होते हैं सपने बुनते हैं आगे बढ़ते हैं लेकिन अचानक हमारे रास्ते में कोई ऐसा अवरोध खड़ा हो जाता है जो हमसे सब कुछ छीन लेता है| सारे सपने टूट जाते हैं| हम सब ऐसी चीजों में आनंद की खोज करते हैं| जिनसे कभी आनंद मिल ही नहीं सकता| 

हम बार-बार उत्साह से सक्सेस के लिए लग जाते हैं| लेकिन सक्सेस है कहां? 

तथाकथित आधुनिकता वादी कहते हैं कि धर्म मनुष्य को डराता है| निश्चित ही यह बातें हमें डराती है लेकिन तब तक जब हम इन सब बातों को पूरा सच मानते हैं|  जब सच्चाई सामने आती है तो डर लगता है कि अरे सब कुछ चला जाएगा| आंखें खोलने से हमें डर लगता है|

कितने सारे सपने हैं आशाएं हैं सुख हैं| हर जगह हमें जीत चाहिए|

इस सच्चाई को जानने के बाद दुख किस बात का| तकलीफ किस बात की|

इस सच्चाई को एक्सेप्ट करने के बाद ही सही आशा आती है| तब उम्मीद की किरणें दिखाई देती हैं|

सत्य के साथ ही हमारा लक्ष्य भी बदल जाता है|  हमारे सपने बदल जाते हैं|  झूठे सपने आना बंद हो जाते हैं|

बंधन तो एक पल में खत्म हो जाता है| इंटरेस्टिंग बात यह है कि जो भी बातें और घटनाएं हमें असहनीय और दुख देने वाली नजर आती है वास्तव में वह हमारी मुक्ति का मार्ग है|

हर एक घटना हमें मुक्त की तरफ एक कदम आगे बढ़ा देती है| 

हमारे अंदर ही मुक्ति छिपी हुई है|  मुक्ति के लिए हमें कहीं बाहर नहीं जाना|

और यह छिपी हुई मुक्ति बार-बार आवाज लगाती है| इसीलिए तो हम कहते हैं हमें मुक्ति चाहिए, मोक्ष चाहिए, मुक्ति चाहिए|

कोई इस आवाज को सुन लेता है तो कोई इसे सुनते हुए भी समझ नहीं पाता, कोई उसे दबा देता है|

मुक्ति की आवाज जैसे-जैसे प्रबल होती जाती है|  सारे दुख हवा में उड़ने लगते हैं|  दबाव खत्म हो जाते हैं|  माया का प्रभाव भी नहीं रहता, ना तो अभाव रहता,निराशा और विलाप की कोई गुंजाइश रहती|

सृष्टि का प्रत्येक पिंड इसी मुक्ति के लिए लगातार संघर्ष कर रहा है|

पृथ्वी सूर्य के चक्कर क्यों काट रही है? कहीं ना कहीं उसे उस क्षण की तलाश है जो उसे चक्कर से मुक्त दिला दे|

भारत का सनातन दर्शन कहता है कि हमारा शरीर, हमारी इच्छाएं, हमारे सपने, माया के कंट्रोल में है लेकिन हमारे अंदर मौजूद हमारी आत्मा माया के अधीन नहीं है|

मुक्ति हमारी आत्मा की अंतरात्मा है|

स्वामी विवेकानंद कहते हैं डरे हुए बालक के समान तुम सपने देख रहे थे कि प्रकृति तुम्हारा गला दबा रही है|

अब तुम मुक्त हो सत्य यही है| 

जिस दिन समझ आ जाये 

सारी दिक्कतें उसी दिन ख़तम|

उसी दिन माया से डर भी गया| 

सारी उलझने ख़त्म| 

माया अब सुंदर लगेगी| 

सारे कष्ट ब्रह्म के ही रूप दिखाई देंगे उनमे भी मुक्ति दिखाई देगी| 

“atulyam”

 


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