मोहासक्त मनुष्य की बुद्धि, मोह के बादलों से ढक जाने से, उसे अपना ही राम रूपी, आत्मा रूपी सूर्य दिखाई नहीं देता: तुलसीदास

 

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मोहासक्त मनुष्य की बुद्धि, मोह के बादलों से ढक जाने से, उसे अपना ही राम रूपी, आत्मा रूपी सूर्य दिखाई नहीं देता तुलसीदास जी ने अरण्यकांड के मंगलाचरण में हनुमानजी के लिए बड़ा विचित्र शब्द लिखा है- "मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ"

अर्थात् मोह रूपी बादलों के समूह को छिन्न भिन्न करने की विधि धारण करने वाला।विचार करें, सूर्य के प्रचंड ताप से उत्पन्न बादल, स्वयं सूर्य को ही ढक ले, क्या यह संभव है? नहीं। बादल सूर्य को नहीं ढकता, पर मनुष्य की दृष्टि को ढक देता है।

तो जिस प्रकार मनुष्य की आँख, बादल से ढक जाने से, सूर्य दिखाई नहीं देता। इसी प्रकार मोहासक्त मनुष्य की बुद्धि, मोह के बादलों से ढक जाने से, उसे अपना ही राम रूपी, आत्मा रूपी सूर्य दिखाई नहीं देता।

हनुमानजी जैसे संत, उन मोह के बादलों को छिन्न भिन्न कर देते हैं। तब मोहादि राक्षसी वृत्तियाँ घबड़ाने लगती हैं, और जीव सचेत होकर साधन मार्ग पर बढ़ने लगता है। यही लंका में हुआ, हनुमानजी के लंका दहन से, रावण आदि राक्षस व्याकुल हो गए, और विभीषण सचेत हो गया, उसे चेत आ गया, होश आ गया।

होश आया तो विभीषण रावण से कहता है- भाई! तुम अपना प्रेम राम को दे दो, तब कोई तुम्हारा बाल भी बाँका न कर पाएगा-

"सीता देहू राम कहुँ अहित न होई तुम्हार"

पर रावण समझने वाला नहीं है। रावण ने यह सुना तो विभीषण को एक लात मारी। विभीषण लात खाते ही देहासक्ति की लंका से बाहर हो गया। देहासक्ति त्याग कर भगवान की ओर प्रस्थान कर गया।देखो, वह तो अतिश्रेष्ठ है जो बात से ही अलग हो जाए, पर जो लात से अलग हो जाए वह भी कम श्रेष्ठ नहीं। पर जिस पर लात तक का असर न हो, उस पर बात का तो असर हो ही कैसे? हम लोग तो-

"हजार बार जलील होकर हम जिस गली से निकले।

लेकर चला मचलकर कमबख़्त दिल वहीं पर॥"

विभीषण समझदार निकला, जिसे पहली ही बार में, रावण की लात की कठोरता के अनुभव से, रामजी के चरणों की कोमलता ध्यान आ गई।लोकेशानन्द कहता है कि उसकी ऐसी एक रामकथा से, यदि कोई एक विभीषण भी, रामजी की शरण में पहुँच जाए, तो यह रामकथा सफल हो जाए।

 


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