हमारा जीवन अर्थपूर्ण और कामयाब कब बन जाता है?

अतुल विनोद 

जीवन के अर्थ और कामयाबी के मापदंड हर एक के लिए अलग हो सकते हैं| एक समय मध्य प्रदेश के भिंड जिले का एक बाप अपने बेटे से कहता था, देखो “बाके मोड़ा ने 2 मर्डर कर दये और एक तुम हो कि अब तक कछउ नई कर पाए”(उस वक्त इस तरह कि चर्चाएँ आम थी)

हर व्यक्ति जीवन के अर्थ और कामयाबी को अपनी नजर से देखता है| आध्यात्मिक परिवेश में रहने वाले व्यक्ति के लिए जीवन का अर्थ आध्यात्मिक ऊंचाई प्राप्त करना है|

राजनीतिक परिवेश में कामयाबी उस क्षेत्र में पद प्रतिष्ठा और रसूख प्राप्त करना है|

इसी तरह बिजनेस, समाज, धर्म के अनुसार अर्थपूर्ण जिंदगी की अलग अलग परिभाषाएं हैं|

यदि हम ताउम्र अंधेरे में रहे तो अंधेरा ही हमें प्रकाश नजर आने लगता है| यदि हम अंधेरे को ही प्रकाश मान ले तो फिर हम उस अंधेरे से निकलने की कभी कोशिश नहीं करेंगे| हमारा जीवन हमारे द्वारा बनाए गए दायरे के अंदर ही सिमट कर रह जाता है|

दृष्टि बदलते ही दृश्य बदल जाते हैं|

भारतीय दर्शन में आंखों से देखे जाने वाले प्रकाश को अंधकार कहा गया है|  बाहरी चकाचौंध में उलझे हुए व्यक्ति को भटका हुआ बताया गया है| यदि धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताओं को मापदंड बनाए तो जीवन अर्थपूर्ण तभी होता है जब हम आंतरिक सनातन प्रकाश से जुड़ जाएं|

ज्यादातर धर्म दर्शन में छाया के इस जगत को माया कहा है, जिसे आँखों से देखते हैं वो माया यानि प्रतिबिम्ब| है न आश्चर्य जनक बात! तो फिर असली जगत क्या है? और उसे कैसे देखा जाए? क्यूंकि शरीर की 2 आँखों से से यही जगत दिखाई देता है?

उस असली जगत को देखने के लिए एक तीसरी आँख की ज़रूरत पडती है| उस दृष्टी का विकास और उससे अपने अंदर उस वास्तविक जगत को देख पाने से ही जीवन अर्थपूर्ण माना जा सकता है|

एक और मत है चार्वाक का जो कहता है “यावज्जीवेत्सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्”

चार्वाक कहते हैं मनुष्य जब तक जिए तब तक सुख से  जिये । कर्ज करके भी घी पिये । यानि सुख-भोग के लिए जो भी उपाय करने पड़ें उन्हें करे। दूसरों से भी उधार लेकर भौतिक मजे लेने में हिचके नहीं। परलोक, पुनर्जन्म और आत्मा-परमात्मा जैसी बातों की परवाह न करे। जो भी है इस शरीर की सलामती तक ही है और उसके बाद कुछ भी नहीं बचता इस तथ्य को समझकर सुखभोग करे, उधार लेकर ही सही। तीनों वेदों के रचयिता धूर्त प्रवृत्ति के मसखरे निशाचर रहे हैं, जिन्होंने लोगों को मूर्ख बनाने के लिए आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य जैसी बातों का भ्रम फैलाया है ।

इधर शंकराचार्य  ने जगत के दिखाई देने को ‘माया का खेल’ कहा है. उन का कहना है कि माया के कारण ब्रह्म ही जगत दिखाई देने लगता है. असल में न जगत है, न जीव. सब कुछ ब्रह्म ही है.माया के इस जगत में साधक का आंतरिक चैतन्य ही उसका एकमात्र केंद्र हैं| जब हम किसी चकित कर देनेवाली घटना को देखते हैं, तो उसे ईश्वर की माया कह देते हैं। यहाँ माया का अर्थ शक्ति है। 

अद्वैतमत के अनुसार जगत् मिथ्या है। जिस प्रकार स्वप्न जूठे होते हैं तथा अँधेरे में रस्सी को देखकर सांप का भ्रम होता है, उसी प्रकार इस भ्रान्ति, अविद्या, अज्ञान के कारण ही जीव, इस मिथ्या संसार को सत्य मान रहा है। वास्तव में न कोई संसार की उत्पत्ति, न प्रलय, न कोई साधक, न कोई मुमुक्षु (मुक्ति) चाहने वाला है, केवल ब्रह्मा ही सत्य है और कुछ नहीं। अद्वैतमत के अनुसार यह अंतरात्मा न कर्ता है, न भोक्ता है, न देखता है, न दिखाता है। यह निष्क्रिय है।

अध्यात्मिक ज्ञान व रास्ता क्या है इस लिंक से जाने

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एक मानव के लिए संसार को नकार देना संभव नहीं है| जब तक शरीर है तब तक उसे भौतिक जगत की परवाह करनी ही होगी| भौतिक जगत के साथ अध्यात्मिक अस्तित्व को साधना ही तर्कसंगत अर्थपूर्ण जीवन और कामयाबी होगी|

भौतिक जीवन के लिए अच्छा रोजगार जो आपके घर-बार की ज़रूरतें पूरी कर सके, उतना धन जो आपको आर्थिक स्वतंत्रता का अहसास दे| अच्चा स्वास्थ्य जो आपके भौतिक और अध्यात्मिक साधन के लिए ज़रूरी है|

अब एक और सवाल उठता है कि सामान्य जीवन निर्वाह के लिए क्या ज्यादा ज़रूरी है ध्यान या सेवा? तो उसका जवाब इस कहानी से मिल सकता है-

एक बार एक पंहुचे हुए संत सुबह सुबह नदी तट पर टहलने निकले।उन्होंने देखा कि एक लड़का नदी में गोते खा रहा है। नज़दीक ही, एक युवा संन्यासी आँखे मूंदे बैठा था| संत तुरंत नदी में कूदे, डूबते लड़के को बाहर निकाला और फिर संन्यासी को पुकारा। युवा संन्यासी ने आँखें खोलीं तो संत बोले, “क्या आपका ध्यान लगता है ?  संन्यासी ने उत्तर दिया, ” ध्यान तो नहीं लगता , मन इधर उधर भागता है।” संत ने फिर पूछा, “लड़का डूब रहा था, क्या आपको दिखाई नहीं दिया ?” उत्तर मिला, “देखा तो था, लेकिन मैं साधना कर रहा था।” संत ने समझाया, आप ध्यान में कैसे सफल हो सकते हो? भगवान ने आपको किसी की सेवा करने का मौका दिया था। यही सेवा आपका कर्तव्य भी थी ।

यदि आप अपना कर्तव्य निभाते हैं तो आपका ध्यान में मन  ज़रूर लगेगा। जो कुछ दिख रहा है वो भगवान का बनाया बगीचा है। यदि बगीचे का आनंद लेना है, तो बगीचे को संवारना और सुधारना सीखें। ” यदि आपका पड़ोसी भूखा सो रहा है, और आप पूजा पाठ करने में मस्त हैं, तो ये मत सोचिए कि आप शुभ कार्य कर रहे हैं| भूखा व्यक्ति उसी की छवि है, जिसे पूजा पाठ करके आप प्रसन्न करना  चाहते हो| क्या वह सर्वच्यापक नहीं है ?

सबक ये है कि अपना कर्तव्य पहले है फिर साधना है| अपने परिवार की देखरेख के साथ परमात्मा की प्रकृति का संरक्षण, सेवा और फिर साधना इसी को अर्थपूर्ण जीवन और कामयाबी कहते हैं |

ATUL VINOD



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