मीडिया मंत्रीमंडल विस्तार और जाती : जातिवाद का यह ज़हर कब जायगा देश से : -दिनेश मालवीय

जातिवाद का यह ज़हर कब जायगा देश से

बहुसंख्यकों में आ रही कट्टरता के लिए कौन जिम्मेदार

-दिनेश मालवीय
dineshसात जुलाई को केंद्रीय मंत्रिमंडल का पुनर्गठन हुआ. इसमें कोई अनूठी बात नहीं थी. यह एक सामान्य प्रक्रिया है, जो अक्सर होती ही रहती है. किसी भी दल की सरकार हो और  कोई भी प्रधानमंत्री हो, वह समय-समय पर अपनी सोच-समझ और आवश्यकता के अनुसार र अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल करता ही है.

लेकिन इस मंत्रिमंडल के फेरबदल में जिस बात ने मुझे बहुत शर्मसार और चिंताग्रस्त किया, वह थी इसमें जातिवाद का बोलबाला. 

देश की आजादी  के बाद से ही सत्ताधारी दल और दूसरे राजनैतिक दलों ने सियासी फायदे के लिए ऐसे कदम उठाये, जिससे जातिवाद का ज़हर ख़त्म होने की जगह बढ़ता ही चला गया. मसलन, जिस चुनाव क्षेत्र में जिस जाति के मतदाता हों, वहाँ उसी जाति का उम्मीदवार खड़ा करना. चुनावी रणनीति में जातिगत समीकरण को सबसे अधिक महत्त्व देना आदि ऐसे दो बड़े तथ्य हैं, जिसने इस देश और समाज से जातिवाद को कभी ख़त्म नहीं होने दिया.

मुक्ति के लिये दो घड़ी भी पर्याप्त, जानिए राजा खटवांग की दो घड़ी मे मुक्ति का रहस्य.. दिनेश मालवीय

कल टेलीविजन पर जब ने मंत्रिमंडल का शपथ ग्रहण समारोह दिखाया जा रहा था, तो हर मंत्री के परिचय में उसके अन्य विवरण के साथ उसकी जाति को प्रमुखता से बताया गया. यह सही है कि मंत्री पद के लिए चयन करने में जाति एक बहुत बड़ा, बल्कि कुछ मामलों में तो एक मात्र फैक्टर रहा. लेकिन उसे टेलीविजन पर इतनी प्रमुखता से दिखाया जाना मुझे बहुत बुरा लगा. हालांकि इसमें टेलीविजन वालों की कोई गलती नहीं थी, क्योंकि इस फेरबदल में जातिगत समीकरण सबसे बड़ा फैक्टर था. लेकिन मुझे न जाने क्यों यह बुरा लगा.

Modi-Cabinet
जातिवाद क्यों बढ़ा

यदि हम इस बुराई की जड़ में जाएँ तो देखेंगे कि आज़ादी की लड़ाई में पूरा देश जाति, धर्म और समुदाय के भेदभाव को भुलाकर कंधे से कंधा मिलाकर लड़ा था. जंगे-आज़ादी में किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं था. अंग्रेजों की गुलामी से देश को आज़ाद कराना ही सबका एक मात्र  उद्देश्य था.

देश आज़ाद होने के कुछ वर्ष बाद तक तो यह सामाजिक एकता का भाव बना रहा,लेकिन कुछ ही वर्षों में सत्ता का खेल शुरू होने पर चुनावी फायदे के लिए समाज में विभाजन का खेल शुरू हो गया. समुदायों और जातियों को आपस में बाँट दिया गया. एक समुदाय को दूसरे समुदाय से डराया गया. एक जाति को दूसरी जाति से भयभीत करने का घिनौना खेल खेला गया.

धर्म के लिए किसी को भी छोड़ा जा सकता है, लेकिन किसी के लिये भी धर्म को नहीं.. दिनेश मालवीय

इस पूरे खेल में एक बहुत बड़ा हथकंडा यह अपनाया गया कि पिछली सदियों में जो कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं हुयीं, उन्हें लोगों के मन से निकालने के बजाय,उन्हें बहुत अधिक पमुखता से प्रचारित किया गया. इसमें भी दोगली नीति अपनाई गयी. इस बात को कौन नकार सकता है कि मध्यकाल में हिन्दू समाज कि कतिपय कथित निचली जातियों के साथ कुछ लोगों ने अन्यायपूर्ण व्यवहार किया. यह एक ज्ञात तथ्य है. लेकिन इसे इतना बढ़ा-चढ़ा कर प्रचारित किया गया कि कथित निचली जातियों मन में अपने ही धर्म के कुछ वर्गों के लिए बहुत दुर्भावना व्याप्त हो गयी. प्रगतिशीलता का दावा करने वालों ने इस साजिश में बहुत बड़ी भूमिका निभाई. यह सब सिर्फ इन जातियों के थोक में वोट पाने के लिए किया गया. यह मर्ज़ इतना बढ़ता चला गया कि आज हिन्दू समाज में भारी टूटन की स्थिति बनी हुयी है. इस वर्ग के लोगों को पिछली सदियों में उनके पूर्वजों पर कथित अन्याय और अत्याचारों की योजनाबद्ध तरीके से याद दिलाया जा रहा है, जिसमें बहुत अधिक अतिरंजना भी है.

Casteism
दोगलापन

इस वर्ग के लोगों से अतीत को याद रखने के लिए कहा जा रहा है. इसके विपरीत मध्यकाल में सल्तनत काल और मध्यकाल में मुस्लिमों द्वारा जो ज्यादतियां की गयीं, उन्हें भूल जाने को कहा जा रहा है. कहा जा रहा है कि “छोडो कल की बातें, कल की बात पुरानी”. यह अजीब दोगलापन है. यदि दलित वर्ग को अतीत याद करने को कहा जा रहा है, तो मुस्लिम शासकों  द्वारा मध्यकाल में किये. ये अत्याचारों को भुलाने को क्यों कहा जा रहा है. इस तथ्य को इतिहास की किताबों में बहुत साजिशन तरीके से गोल कर दिया गया है. हमारे देश के वीरों, राजाओं और उनकी उपलब्धियों को किताबों में जगह नहीं दी गयी या बिलकुल कम करके बताया गया.इसके विपरीत उन लोगों को महिमामंडित किया गया, जिन्होंने इस देश की संस्कृति को नेस्तोनाबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. इस देश की प्राचीन समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की कीमत पर आक्रान्ताओं को महिमामंडित किया गया.

अनावश्यक शक्ति प्रदर्शन नहीं करना चाहिए, हनुमानजी का शक्ति भूल जाने वाला रहस्य.. दिनेश मालवीय

इसके अलावा, कुछ राजनैतिक दलों द्वारा देश के अल्पसंख्यकों के मन में कुछ संगठनों का डर बहुत गहरे से बैठा दिया गया, ताकि वे अपने जानमाल की सुरक्षा के लिए उन्हें थोक में वोट देते रहें.

हालत यहाँ तक पहुँच गए हैं कि हर घटना और विषय को जाति और समुदाय के नज़रिए से देखा जाने लगा है.

बुद्धिजीवियों का दोगलापन

आज देश के बहुसंख्यक लोगों के मन में जो थोड़ी बहुत कट्टरता आ रही है, उसके लिए हमारे अधिकांश बुद्धिजीवियों का दोगलापन काफी हद तक जिम्मेदार है. किसी ख़ास वर्ग या जाति के व्यक्ति के साथ कुछ गलत होने पर वे एकदम से सामने आकर मुखर हो जाते हैं, जबकि वही घटना किसी दूसरे समुदाय या जाति के व्यक्ति के साथ हो जाए, तो वे न जाने किस पोल में घुस जाते हैं. इन बुद्धिजीवियों में बड़ी संख्या में पत्रकार भी शामिल हैं. बहुसंख्यक समाज को सहनशीलता का पाठ पढ़ाया जाता है, जबकि वह पहले से ही दब्बूपन की हद तक सहनशील रहा है. लेकिन चंदन की लकड़ी को भी बहुत रगड़ा जाए तो उसमें से चिंगारी निकलने लगती है. बुद्धिजीवियों के इस दोगलेपन के कारण बहुसंख्यक लोगों में कुछ कट्टरता आ रही है, जो स्वाभाविक है.


दुष्प्रचार

इन दोगले बुद्धिजीवियों ने अनेक बहुत महत्पूर्ण मुद्दों पर अल्पसंख्यकों के मन में गलतफहमियां पैदा कर उन्हें सरकार के खिलाफ भड़काया. नागरिकता संशोधन क़ानून, यानी सीएए इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. इसका भारत के मुस्लिम नागरिकों से कोई लेनादेना नहीं है. लेकिन उनके बीच यह प्रचारित कर दिया गया कि यह उन्हें देश से बाहर निकालने के लिए लाया गया है. बे-पढ़े लिखे और कम पढ़े लिखे मुस्लिम इसे सच मान बैठे और पूरे देश में आन्दोलन होने लगे. अनेक पढ़े लिखे लोगों  ने भी इसे सच मान लिया. कई जगह तो आन्दोलनों ने  हिंसक रूप  ले लिया.,सरकार द्वारा बार बार स्पष्ट करने पर भी साजिशन इस भ्रम को कायम रखा गया. इन आन्दोलनकारियों को इन षड्यंत्रकारियों  का पूरा समर्थन और सहयोग मिला.

ग्रंथों के साथ छेड़खानी सदियों से हो रही है, रामायण के बारे में कवि कुमार विश्वास बिलकुल सही कहते हैं -दिनेश मालवीय

समाधान

इन सारी विषम परिस्थितियों में आज देश कोई उपयुक्त समाधान तलाश रहा है. इसका एक ही समाधान है कि हर समुदाय , जाति और धर्म के व्यक्ति व्यक्ति इन साजिशों और साजिश करने वालों को अलग-थलग कर दे. उनकी पहचान में तो को कठिनाई नहीं है. वे सबके सामने हैं. यह देश सभीका है और सब लोग यहाँ शांतिपूर्वक रहना चाहते हैं. लेकिन शान्ति होने से इन साजिशी और सियासी लोगों का तो अस्तित्व ही संकट में आ जाएगा. वे देश में हमेशा किसी न किसी तरह अशांति और अराजकता ही कायम रखना चाहते हैं.

हर नागरिक को आज इन लोगों को दुत्कारकर आपस में मिलकर रहने की ज़रूरत है. यही इसका समाधान है.

पुनर्जन्म का इससे अधिक और क्या ठोस प्रमाण है! -दिनेश मालवीय


हमारे बारे में

न्‍यूज़ पुराण (PURAN MEDIA GROUP)एक कोशिश है सत्‍य को तथ्‍य के साथ रखने की | आपके जीवन में ज्ञान ,विज्ञान, प्रेरणा , धर्म और आध्‍यात्‍म के प्रकाश के विस्‍तार की |
News Puran is a humble attempt to present the truth with facts. To spread the light of knowledge, promote scientific temper, inspiration, religion and spirituality in your life.


संपर्क करें

0755-3550446 / 9685590481



न्‍यूज़ पुराण



समाचार पत्रिका


श्रेणियाँ