कारसेवकों के संस्मरण भाग – 2

 

MemoirsofKarSevaks - Part 2

कारसेवकों के संस्मरण भाग – 2

प्रभु की कृपा भयऊ सब काजू।
जन्म हमार सुफल भा आजू।।

जिस भव्य मंदिर निर्माण के लिए कई सदियों में लाखों लोगों ने बलिदान दिया, आज उसका भूमिपूजन हुआ। यह देख कर मन बेहद आनंदित है। एक ही बात मन से निकलती है- प्रभु की कृपा भयो सब काजू, जन्म हमार सुफल भा आजू। जो काम कभी असंभव लगता था, कई पीढ़ियों ने इसके लिए संघर्ष किया। आज उस भव्य श्री राम मंदिर का भूमिपूजन देखना परम सौभाग्य है। ईश्वर की विशेष अनुकंपा से यह दिन हमें प्राप्त हुआ है। हम अपने को ईश्वर का विशेष कृपा पात्र मानते हैं, क्योंकि मंदिर निर्माण को लेकर हुए प्रमुख आंदोलन में हम भी से सहभागी बने। 1990 में अयोध्या तक नहीं पहुंच सके। पुलिस की गोलियां खाई, घायल हुए। हमारे कुछ साथी बलिदान हुए पर 1992 में ईश्वर ने हमें बुलाया और अयोध्या पहुंचे। वहां खड़े राष्ट्रीय शर्म का प्रतीक ढांचे को ढहा कर भगवान राम के मंदिर का निर्माण किया। यद्यपि इस बड़े अभियान में कई लोगों की भूमिका रही। हम इस बात से आनंदित हैं कि हमने गिलहरी की तरह अपना सहयोग दिया। यह बात राम मंदिर आंदोलन में कारसेवक रहे बजरंग दल के प्रदेश संयोजक रहे  धर्मेंद्र गुर्जर एडवोकेट, बजरंग वाहिनी के डबरा जिला प्रचारक  राघवेंद्रसिंह राजावत एडवोकेट, चंदेरी तहसील के संयोजक  नारायण यादव जी ने कही।


धर्मेंद्र गुर्जर जी ने बताया कि 1986 में जयभान सिंह पवैया जी से जुड़कर मैं बजरंग वाहिनी से जुड़ा। उसके बाद जिला संयोजक, संभागीय संयोजक से प्रदेश संयोजक बना। जब जन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर था तो युवाओं को जोड़ा। 1990 में हम लोग संगठन की दृष्टि से ग्वालियर ग्रामीण जिले के करीब 1000 कार्यकर्ता अयोध्या के लिए निकले तय कार्यक्रम के अनुसार हम झांसी पहुंचे वहां हम को पुलिस ने गिरफ्तार कर लक्ष्मी व्यायाम शाला में रखा करीब 23 दिन हम लोगों को बंद रखा गया। यहां हुए गोलीकांड में हमारे कई साथी घायल हुए अन्य प्रांतों के कुछ साथी बलिदान भी हुए गोलियों के कुछ छर्रे मुझे भी लगे। संगठन द्वारा कार सेवा समाप्ति की घोषणा के पश्चात हम अपने गृह नगर लौट कर आए। कुछ दिन इलाज कराने के बाद स्वस्थ होकर फिर से संगठन का काम शुरू कर दिया मन में मलाल था कि अयोध्या नहीं पहुंच सके। पिछोर के कुछ कार्यकर्ता गोंडा तक पहुंचे। जो निश्चित रूप से उनकी महानता और ईश्वर की इच्छा से संभव हो पाया। 1992 में जैसे ईश्वर ने हमारी फरियाद सुन ली। मुझे प्रदेश के 385 कार्यकर्ताओं का नेतृत्व करने का अवसर मिला। जब कार सेवा शुरू हुई तो हम लोग ढांचे के पीछे वाले हिस्से पर पहुंच गए थे जहां पुलिस और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक दोहरा घेरा बनाकर सुरक्षा कर रहे थे। रामभक्त कारसेवकों के हुजूम के आगे यह सुरक्षा घेरा बोना साबित हुआ और हम इस को तोड़ते हुए ढांचे पर चढ़ गए इसके बाद जो कुछ हुआ जो सबके सामने है। इस बीच हमारे  पुत्तूबाबा दीवार के नीचे आने से बलिदान हो गए। हालांकि मैं उनको कई बार कह चुका था के बाबा आप बाहर निकल जाओ, यह दीवार आप पर गिर सकती है। बाबा ने मुझे हर बार यह कह कर भगा दिया की मोड़ा तें मोह राम को काम नहीं करने दे रहो, भाग जा जहां से। अपने आप रामजी देखेंगे। जहां मरउ गये तो जा से बड़ो सौभाग्य और का होइगो। मेरे देखते देखते ही ऊपर से दीवार का बड़ा हिस्सा गिरा, जिसमें मैं और कुछ कार्यकर्ता दूसरी ओर हो गए।हमने बाबा जी को खींचने का प्रयास किया लेकिन दीवार उनके पेट पर आकर गिरी। काफी देर प्रयास के बाद हम उन्हें निकाल सके, लेकिन तब तक बाबा हमको छोड़कर राम जी के पास जा चुके थे।


निश्चित रूप से रामजी की इच्छा से हनुमान जी के बल से यह कार्य संभव हो सका। देश के 49 लोगों पर ढांचा तोड़ने के आरोप तय हुए उसमें मैं भी हूं। आज ऐसा लग रहा है जैसे ईश्वर ने मुझ पर विशेष कृपा की हो जो भगवान राम मंदिर के भूमिपूजन का मैं साक्षी बना। आंदोलन को लेकर जीवन में क्या उतार-चढ़ाव आए? इस संबंध में  धर्मेंद्रजी ने बताया कि जब आंदोलन से जुड़े थे तब और आज एक ही बात मन में रहती है कि राम जी का काम कर रहे हैं, उनके आशीर्वाद से आज स्वस्थ हैं। जीवन में उतार चढ़ाव आते रहते हैं। मंदिर को बनते हुए देख रहे हैं, यह अविस्मरणीय है, सभी कष्टों को भुला देने वाला है। इस समय में एक ही बात कहूंगा-

सो सब तव प्रताप रघुराई नाथ कछू मोरि प्रभुताई।

 राघवेंद्र सिंह जी ने बताया कि 1992 में ढांचे को तोड़ने, मंदिर की दीवारें बनाने और  सत्यनारायण मौर्य के साथ रामलला को विराजमान कर बैनरों के कपड़े से उनके ऊपर छांव करने में चींटी के बराबर ही सही पर योगदान दिया। 1990 में कार सेवा के दौरान अयोध्या में गोलियां चलने से हमारे साथी बलिदान हो गए थे। 92 में अयोध्या पहुंचकर, 6 दिसंबर को हमने एक सामूहिक फोटो निलवाया। फोटो निकालने वाले अपने साथी से कहा कि यदि हम जीवित घर ना पहुंच पाएं तो इस फोटो को अंतिम निशानी के तौर पर घर पहुंचा देना। इसमें मेरे साथ  धर्मेंद्रजी के साथ अन्य कारसेवक भी हैं। इसके बाद दो बार अयोध्या जाना हुआ। पहली बार गए थे तो रामलला छोटे से टीन शेड के नीचे विराजमान थे। दूसरी बार जाने पर वहां वाटरप्रूफ पंडाल लगा मिला। मन में एक टीस होती थी कि हम पक्के मकानों में रह रहे हैं और रामलला इस पंडाल में विराजमान हैं। कब वह समय आएगा, जब भगवान भव्य मंदिर में विराजमान होंगे। लगता है ईश्वर ने विशेष अनुकंपा कर हमें यह दिन देखने के लिए इस धरती पर जन्म दिया। इसे देखकर एक ही चौपाई याद आती है- 


पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता, लोचन नीर पुलक अति गाता। यथाशीघ्र अपने साथियों के साथ अयोध्या दर्शन के लिए एक बार फिर से जाएंगे। जो सहयोग होगा वह करेंगे।नारायण यादव जी ने बताया कि 1990 में गुना अविभाजित जिला था संगठन की दृष्टि से अशोकनगर भी जिला हुआ करता था राधेश्याम पारीक जी हमारे जिला प्रचारक से तब करीब 1000 से अधिक कारसेवक अयोध्या जाने के लिए चंदेरी के रास्ते निकले राजघाट पर उत्तर प्रदेश की सीमा पर पहुंचे। पुलिस ने बैरिकेड लगाकर और दीवाल से रास्ता बंद कर रखा था। बजरंग दल तहसील संयोजक होने और मेरा क्षेत्र था इसलिए जत्थे की अगुवाई में ही कर रहा था। सभी राजघाट पर उप्र में प्रवेश करने के दौरान पुलिस ने सीधी फायरिंग शुरू कर दी। पहला फायर मिस हुआ, दूसरी गोली मेरे पैर में लगी। इसके बाद करीब 25 से 30 गोलियां चली लेकिन रावदेशराज सिंह, उत्तम सिंह खानपुर वाले सहित कई कारसेवक बेरिकेड्स तोड़ते हुए उत्तर प्रदेश की सीमा में प्रवेश कर गए। यहां से मुझे घायल अवस्था में गुना जिला अस्पताल लाया गया, जहां गंभीर हालत देखते हुए ग्वालियर के अस्पताल भेजा गया। 28 अक्टूबर 1990 को डॉक्टरों ने मेरा एक पैर काट दिया। उसी समय झांसी की रायम शाला में भी गोली चली थी उसके घायल कारसेवक भी अस्पताल में पहुंचे। कुछ दिनों बाद  राजमाता विजयराजे सिंधिया, मामा  ध्यानेंद्र सिंह,  जयभान सिंह पवैया जी सहित अन्य वरिष्ठ जन हमारा हाल-चाल जानने के लिए पहुंचे। हालांकि हमारे इलाज की भी व्यवस्था भी इन्होंने ही की। इसके बाद अस्पताल से छुट्टी होने के पर हम चंदेरी आए। 1990 में पैर भी कटने के बाद 1992 में जब कार सेवा हुई तो फिर जोश भर आया। हम अयोध्या के लिए निकल पड़े। मुंगावली रेलवे स्टेशन पर मैं भी ट्रेन में चढ़ गया लेकिन  रावदेशराज सिंह जी ने मेरे स्वास्थ्य को देखते हुए मुझे डब्बे से उतरवा दिया। इसके बाद सुन्दकाण्ड की चोपाई- राम कृपा बल पाई कपिंदा, भए पच्छजुत मनहु गिरिंदा।

याद आई, कि जब राम जी की कृपा से बंदर भालू पंख वाले बड़े पर्वत से हो गए तो राम जी मुझ पर कृपा करेंगे, स्वयं रक्षा करेंगे। यह विचार करके मैं दूसरे डब्बे में चल गया, फिर हम अयोध्या पहुंचे। वहां मणिराम छावनी में हमारा विश्राम हुआ। जहां जयभान सिंह पवैया जी से मुलाकात हुई। चंदेरी से हमारे साथ  महेश योगी,  अशोक सरपंच,  अशोक गुप्ता जी,  निरुपम सिहारे,  शेर सिंह वैश्य,  महेंद्र बंसल साथ गए थे। वहां से ढांचे की ईंट भी साथ लेकर आये थे। लौटने पर विपक्षी दलों ने कई झूठे केस दर्ज कराए। चरित्र हनन भी किया। हालांकि यह राज राजनीतिक षड्यंत्र हैं जो चलते रहेंगे। हमें राम जी का कार्य करना था वह हम करके आए। यह दिन देखने के लिए जीवित रहे, यह बड़ी बात है।
अनुज शर्मा

 


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