गुजरात के सीढ़ीदार कुओं का चमत्कारी वास्तशिल्प

गुजरात के सीढ़ीदार कुओं का चमत्कारी वास्तशिल्प

सदियों तक आम जनता के रोजमर्रा जीवन का अभिन्न अंग रहे। गुजरात के सीढ़ीदार कुएं (स्टेपवेल या गुजराती में वा) मध्यकालीन भारत की वास्तुशास्त्र आधारित स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने हैं। यहां कदम-कदम पर भारतीय और इस्लामी स्थापत्य कला के मिश्रण से बने सीढ़ीदार कुओं के तमाम खंडहर फैले हुए हैं। इनमें बाई हरीर वा, दादा हरी वा, माता भवानी वा, अडालज वा आदि अपनी सुंदर बनावट और पच्चीकारी के लिए विश्व प्रसिद्ध है पुराने जमाने में राजा-महाराजा और धार्मिक व्यक्ति गुजरात की भयानक गर्मी से बचने और पानी की कमी दूर करने के लिए सीढ़ीदार कुएं बनवाया करते थे। बहुत से राजा या सुल्तान युद्ध-शिकार के बाद आराम करने के लिए एकांत जगहों पर भी सीढ़ीदार कुएं बनवाते थे। शाही परिवार के अलावा सिपाही, आम जनता, थके-मादे तीर्थ यात्री, दूरदराज के व्यापारी और मुसाफिर भी इनका इस्तेमाल विश्रामगृहों रूप में करते थे।

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अहमदाबाद से नौ किलोमीटर दूर, करीब 500 साल पुराना, अडालज वा एक अधूरा लेकिन बहुत सुंदर सीढ़ीदार कुआं है। इसके अधूरे निर्माण के पीछे एक अधूरी प्रेम कथा भी जुड़ी हुई है। धनपाई के राजा राणा वीर सिंह मंगेला ने इसका निर्माण शुरू किया था, लेकिन वह एक लड़ाई में महमूद बेगड़ा के हाथों मारा गया। वीर सिंह की खूबसूरत रानी रूरा पर नजर पड़ते ही महमूद बेगड़ा उस पर मोहित हो गया और उसने उससे शादी का प्रस्ताव रखा। राजा की मौत से दुखी रानी ने उससे शादी करने से पहले वीर सिंह द्वारा शुरू कराए पांच मंजिला सीढ़ीदार कुएं को पूरा करवाने की शर्त रख दी। विधवा रानी की सुंदरता पर मोहित महमूद बेगारा ने यह काम फौरन शुरू करवा दिया।

पांचवीं मंजिल पूरी होते ही उसने रूरावा से विवाह का प्रस्ताव पुनः रखा, लेकिन अंदर से दुखी और खामोश रूरावा ने अगले ही दिन अडालज वा में डूब कर जान दे दी। प्रेमाग्नि और क्रोध में जलते महमूद बेगड़ा ने कुएं का निर्माण कार्य तुरंत बंद करा दिया। शायद इसीलिए कुएं के ऊपर गुंबद नहीं बना है, लेकिन आज भी इसकी एक-एक ईंट पर की गई पच्चीकारी महमूद बेगड़ा की प्रेम कहानी कहती है। स्लेटी पत्थरों से बना अडालज वा प्राचीन भारतीय वास्तु शिल्प कला और इस्लामी वास्तु शिल्प का खूबसूरत मिश्रण है। मस्जिद की सादगी और मंदिर की खूबसूरती लिए अडालज वा मध्यकालीन गुजरात के वास्तु शिल्प का श्रेष्ठ नमूना है। इसकी दीवारों पर संस्कृत में इबारतें उकेरी हुई हैं। इसका निर्माण सन् 1455 की माघ पंचमी को शुरू हुआ था और इस पर पांच लाख एक सौ ग्यारह स्वर्ण मुद्राएं खर्च हुई थीं।

चौकोर आकार में बने अडालज वाव में चारों ओर खंभे और मेहराबें हैं। बीच में ठंडे ताजे पानी का कुंड है। भीतरी भाग सात खंडों का है। इसमें तीन प्रवेश द्वार हैं। इसके खंभों और दीवारों पर विभिन्न धार्मिक चिन्ह बने हैं। पांच सदियों से मौसम के थपेड़े झेलते रहने के बाद भी अंडालज वा किसी लोक कथा के नायक की तरह लोगों के दिलों में जगह बनाए हुए है।

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