मोबाइल बंद करने का आनंद -दिनेश मालवीय

मोबाइल बंद करने का आनंद

-दिनेश मालवीय

 

बहुत दिनों के बाद रविवार को छत पर कुर्सी डालकर बैठने का मन हुआ. बैठा नहीं, कि अपने  मोबाइल पर फेसबुक खोलकर बैठ गया. इतने मैं ही धर्मपत्नी आ गयी. उसने सामने कुर्सी लगा ली. देखते ही देखते वह भी मोबाइल पर न जाने क्या खोलकर बैठ गयी. इस तरह हम दोनों अपने-अपने मोबाइल में बुरी तरह बिजी हो गये.

लेकिन मेरे अन्दर कोई ऐसा शख्स रहता है, जो मुझे कुछ गलत करने पर लगातार टोंकता रहता है. उसने मुझे झिड़की देते हुए कहा कि यह क्या बेवकूफी है! इतने दिन बाद छत पर आये हो. सामने सैंतीस साल से साथ जीवन बिताने वाली पत्नी बैठी है. आपस में कोई बात करने के बजाय, तुम अपना मोबाइल खोल कर बैठे हो. मुझे यह बात जँची और कुछ शर्मिंदगी भी हुयी.

मैंने पत्नी से मोबाइल बंद करने को नहीं कहा. लेकिन मुझे मोबाइल बंद करते देख उसने भी अपना मोबाइल बंद कर दिया. हम खुले आसमान का सुन्दर दृश्य देखने लगा. चन्द्रमा दिख तो रहा था, लेकिन काफी निस्तेज था, क्योंकि सूरज अभी पूरी तरह डूबा नहीं था. मैं सोचने लगा कि धीरे-धीरे ज्यों-ज्यों अंधेरा बढ़ेगा, चंद्रमा की ज्योत्स्ना अधिकाधिक उज्जवल होती जाएगी. मुझे चंद्रमा के बारे में पढ़ा हुआ न जाने क्या-क्या याद आने लगा. जहाँ कवियों द्वारा चंद्रमा की सुन्दरता के अतिशयोक्तिपूर्ण विवरण याद आये, वहीँ तुलसीदास द्वारा गिनाई गयीं उसकी भी याद आने लगीं. इसके बाद चन्द्रमा पर इंसान के पहुँचने पर दुनिया में हुए जश्न याद आये.

मैं सोचने लगा कि पुराणों,  लोककथाओं और और कविताओं में चन्द्रमा के साथ हमारे कितने भावनात्मक सम्बन्ध रहे हैं. बच्चों का तो वह युगों-युगों से बच्चों का प्यारा मामा ही है. कविगण अपनी प्रेयसी की सुन्दरता की तुलना चन्द्रमा से करते नहीं थकते. पुराणों में चन्द्रमा को लेकर अनेक अच्छी और अच्छी न समझी जाने वाली बातें कही गयी हैं.

Husband Wife (1)
यह भी याद आया कि चंद्रमा को औषधियों से भी परिपूर्ण बताया गया है. वेदों और उपनिषदों  में उल्लेख है कि चन्द्रमा से औषधियों और वनस्पति की वृद्धि होती है. उसे सोलह कलाओं से युक्त मनोमय, अन्नमय, प्राणमय परम पुरुष परमात्मा का ही रूप माना गया है. चंद्रमा को भगवान का मन भी कहा गया है. श्रीकृष्ण ने गीता में स्वयं को नक्षत्रों में चन्द्रमा बताया है. मनुष्य के शरीर में जल की मात्रा अधिक है, इसलिए चंद्रमा का उस पर बहुत अधिक प्रभाव है. पूर्णिमा को चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण मानव के मस्तिष्क में उपस्थित पानी को प्रभावित करता है. इससे कुछ लोगो तर्कहीन और कुछ लोग पागलपन का व्यवहार करने लगते हैं. समुद्र में ज्वार-भाटा चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण के कारण ही आते हैं. पूर्णिमा को भारतीय संस्कृति में बहुत महत्वपूर्ण माना गया है. इसी कारण हमारी संस्कृति में पूर्णिमा को कुछ कार्य करने और कुछ नहीं करने की सीख दी गयी है. अध्ययनों में यह तथ्य सामने आया है कि पूर्णिमा को दुनिया में सबसे अधिक लोग पागल होते हैं. सबसे अधिक अपराध भी इसी दिन होते हैं.  इसलिए पूर्णिमा पर सात्विकता से रहने तथा पूजा-पाठ, ध्यान आदि करने की शिक्षा दी गयीं है. इस दिन सहवास, नशा करने सहित अनेक काम करने की वर्जना की गयी है.

कवियों को तो मानों चंद्रमा को मानो अपनी प्रेयसी के मुख की सुंदरता की तुलना के चंद्रमा के अलावा कोई उपमा ही नहीं मिली. जहाँ चंद्रमा को देवता मानकर उसकी प्रशंसा में अनेक बातें कही गयीं हैं, वहीँ उसकी कमियाँ गिनाने वाले भी कम नहीं रहे. संत तुलसीदास ने तो सीता के सौन्दर्य की चंद्रमा से तुलना करने से यह कह कर साफ़ इंकार कर दिया कि “अवगुण बहुत चंद्रमा तोही”. इसके लिए ज़रा तुलसी के तर्क सुनिए. पहला यह कि चंद्रमा का जन्म समुद्र से हुआ है और विष उसका भाई है. वह दिन में मलिन हो जाता है और कलंकयुक्त है. इसके अलावा, वह घटता-बढ़ता रहता है और विरहियों को दुःख देता है. अपनी संधि में पाकर पर वह राहू को ग्रस लेता है. वह चकोरों को शोक देने वाला और कमल का शत्रु है.

इसके अलावा, चंद्रमा गुरुपत्नीगामी है. पढ़ा है कि इंद्र को अहिल्या के साथ दुराचार करने के लिए चन्द्रमा ही उकसाकर ले गया था. फिर, उसका तेज भी तो सूर्य से उधार का है.

हमारे देश में चंद्रमा के नाम पर चन्द्रवंश ही है. भगवान् श्रीकृष्ण इसी वंश में जन्मे थे. बाल कृष्ण जब माता यशोदा से आकाश में चमकते चन्द्रमा को लाने कि जिद करते हैं, तो यशोदा थाली में पानी भरकर उसमें चंद्रमा कि छवि दिखाकर उन्हें संतुष्ट करती हैं. अब तो यह तथ्य भी सामने आ गया है कि पृथ्वी से सुंदर दिखायी देने वाला चंद्रमा वास्तव में बहुत बदसूरत है.

चंद्रमा को लेकर इतनी भावुक सोच करने के बाद भीतर से फिर एक झिड़की आई कि क्या तुझे और कुछ नहीं दिख रहा? मैंने चन्द्रमा से अपना ध्यान हटाया तो देखा कि पंक्षियों से समूह अपने घरों को लौट रहे हैं. उड़ते हुए वे इतनी सुन्दर आकृतियाँ निर्मित कर रहे थे कि मन आश्चर्य और आनंद से भर उठा.

मैंने पत्नी से कहा कि देखो हम लोग कितने मूर्ख हैं, कि प्रकृति से सुन्दर मनोरम दृश्य प्रत्यक्ष देखने के बजाय अपने मोबाइल में न जाने क्या-क्या देख रहे थे. उसने सहमति जतायी. अँधेरा घिरने लगा और हम दोनों छत से नीचे उतर आये- इस निश्चय के साथ कि जब भी मौका मिलेगा इस आनंद को बार-बार लेंगे.


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