आधुनिक भीमसेन दारासिंह ने कभी ड्रम बनाने के कारखाने में किया था काम -दिनेश मालवीय

आधुनिक भीमसेन दारासिंह ने कभी ड्रम बनाने के कारखाने में किया था काम

दिनेश मालवीय

भारत की वर्तमान पीढ़ी के लोगों ने महाबली पहलवान दारासिंह को ‘रामायण’ धारावाहिक में वीर हनुमान के रूप में ही देखा है| इस भूमिका में उन्होंने बहुत यादगार अभिनय भी किया| इसके अलावा उन्होंने दारासिंह को ‘संडे हो या मंडे, रोज़ खाओ अंडे’ वाले विज्ञापन में देखा| युवाओं को उनके बारे में इससे ज्यादा कुछ और शायद ही पता हो| दारासिंह को देश में बल और कुश्ती का पर्याय माने जाते रहें हैं|

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दारासिंह 1948 में सिंगापुर गये| उस वक्त उनकी उम्र 20 साल थी| वहाँ उन्होंने ड्रम बनाने वाली एक मिल में काम किया| लेकिन उनका जन्म तो महाबली पहलवान बनने के लिए हुआ था| उन्होंने सिंगापुर में काम के दौरान ही हरमान सिंह से कुश्ती की ट्रेनिंग ली| इस प्रकार वो ही उनके गुरु थे|

दारासिंह का जन्म 19 नवम्बर 1928 को और मृत्यु 12 जुलाई 2012 को हुई| युवाओं को इस बात पर मुश्किल से भरोसा होगा कि वह भारत के ऐसे फ्री स्टाइल रेसलर थे, जिन्होंने 500 से ज्यादा कुश्तियां लडीं और कभी हार का मुँह नहीं देखा| दुनिया के नामी पहलवानों को धूल चटाकर वह फ्री स्टाइल के शहंशाह यानी वर्ल्ड चेम्पियन बने|

पंजाब के धरमचूक गाँव में जन्में दारासिंह का पूरा नाम दीदार सिंह रंधावा था| बहुत कम उम्र से ही गाँव और शहरों के दंगलों में अनेक पहलवानों को दिन में तारे दिखाने के बाद उन्होंने प्रोफेशनल रेसलिंग शुरू की| उन्होंने पचपन साल तक बिंदास पहलवानी की| 1960 के दशक में दारासिंह का बोलबाला रहा| वह ताकत के पर्याय बन गए| कोई अगर अपनी ताकत का बखान करता था, तो लोग व्यंग्य से कहते थे कि तुम आये बड़े दारा सिंह| ऐसा हो भी क्यों नहीं| वह थे ही ऐसे|

जब 200 किलो के पहलवान को दारा सिंह ने उठाकर पटक दिया
दारासिंह की हाइट 6 फुट 2 इंच और वजन 130 केजी था| उनकी छाती 54 इंच की थी| उनकी ताक़त का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि उन्होंने अपने ज़माने के खूंखार पहलवान आस्ट्रेलिया के 200 किलो वजन के किंगकोन्ग को उठाकर एरीना से बाहर फेंक दिया था| इस कुश्ती के लिए किंगकोन्ग ने उन्हें चैलेंज किया था| यह कुश्ती नवम्बर 1962 में रांची में हुई थी| इसमें दारासिंह की चुस्ती-फुर्ती, बल और कौशल को देखकर लोगों ने दांतों तले उंगली दवा ली थी| इससे पहले उन्होंने कुआलालम्पुर में तरलोक सिंह को हराया था, जो अपने ज़माने के बहुत बड़े पहलवान थे|

दारा सिंह और भारत के लिए सबसे प्राइड मोमेन्ट वह था जब वह 1968 में अमेरिका के वर्ल्ड चेम्पियन लाऊ थेज को हाराकर फ्रीस्टाइल कुश्ती में "रुस्तमे-जमा यानी वर्ल्ड चेम्पियन" बने|

इससे पहले 1959 में उन्होंने पूर्व वर्ल्ड चेम्पियन जार्ज गारडीयान्का को हराकर कॉमन वेल्थ की वर्ल्ड चैम्पियनशिप जीती थी| दारासिंह ने 55 साल तक पहलवानी की और किसी से नहीं हारे| पहलवानी के दौरान ही दारासिंह 1952 में फिल्मों में आ गये| उनकी पहली फिल्म “संगदिल” थी, जिसमें जिसके हीरो दिलीपकुमार और हेरोइन मधुवाला थीं| उनकी आखिरी फिल्म “जब वी मेट” थी|

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दारासिंह को “जग्गा” फिल्म के लिए बेस्ट एक्टर अवार्ड मिला| उन्होंने हिन्दी और पंजाबी की 146 फिल्मों में काम किया| एक ज़माना था जब लोग दारासिंह की फिल्मों के दीवाने थे| इन फिल्मों का सबसे बड़ा आकर्षण यह था कि हर फिल्म में उनकी एक न एक कुश्ती ज़रूर होती थी| बाबूभाई मिस्त्री की फिल्म “किंगकोन्ग” उनकी जबरदस्त हिट फिल्मों में शामिल है| अन्य बहुत हिट फिल्मों में ‘हरकुलिस’, ‘लुटेरा’, ‘रुस्तम’, ‘सिकंदरे आज़म’, ‘फौलाद’, ‘सेमसन’ आदि का नाम प्रमुखता से लिया जाता है|

दारासिंह ने अमिताभ बच्चन की महशूर फिल्म “मर्द” में उनके पिता की भूमिका अदा की थी जिसे आज भी याद किया जाता है| उनकी प्रमुख अभिनेत्रियों में मुमताज,अंजना और निशी थीं| उन्होंने कई फिल्मों में रामभक्त हनुमान की भूमिका निभाई| रामानंद सागर के ‘रामायण’ सीरयल में तो उन्होंने इस भूमिका को इतने प्रभावी ढंग से निभाया कि, लोग उन्हें कभी नहीं भूल सकते|

दारासिंह सिर्फ एक पहलवान और एक्टर ही नहीं, बल्कि लेखक और निर्माता-निर्देशक भी थे| उन्होंने 7 फिल्मों की कहानी लिखी और कुछ फिल्मों का निर्देशन भी किया| उन्होंने अपनी आत्मकथा पंजाबी भाषा में लिखी|

दारासिंह ने राजनीति में भी भाग लिया| अटलजी ने उन्हने 2003 में राज्यसभा में मनोनीत किया और वह 2009 तक राज्यसभा सांसद रहे| फ्रीस्टाइल कुश्ती में करीब पचपन साल के शानदार करियर के बाद उन्होंने 1983 में कुश्ती को अलविदा कह दिया| मान, प्रतिष्ठा, समृद्धि से भरपूर एक सार्थक जीवन जीने के बाद महाबली दारासिंह ने 2012 में इस फानी दुनिया को अलविदा कहा| उनका नाम फ्री स्टाइल कुश्ती के साथ ही फिल्मी दुनिया में भी सदा बहुत आदर के साथ लिया जाता रहेगा|
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