कौतूहल का विषय बनीं बीजेपी की सियासी मुलाकातें! …कृष्णमोहन झा

कौतूहल का विषय बनीं बीजेपी की सियासी मुलाकातें! …कृष्णमोहन झा
सत्ता समीकरण बदलने का संकेत देतीं सियासी मुलाकातें!

कृष्णमोहन झा



विगत कुछ दिनों से देश के दो भाजपा शासित राज्यों में सत्ता के गलियारों में तेज राजनीतिक हलचल दिखाई दे रही है। ये दो राज्य हैं उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश । उत्तर प्रदेश में 2017 में संपन्न विधानसभा चुनावों में प्रचंड बहुमत हासिल कर के भाजपा ने दो दशकों के बाद सत्ता में वापसी की थी जबकि मध्य प्रदेश में 2018 में संपन्न विधानसभा चुनावों ने उसे डेढ़ दशकों के बाद सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया था परंतु सवा साल के अंतराल के बाद जब ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके गुट के 22 कांग्रेस विधायकों ने भाजपा में शामिल होने का फैसला किया तो राज्य में पुनः भाजपा सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त हो गया और राज्य में चौथी बार शिवराज सिंह चौहान के पास सत्ता की बागडोर आ गई।

उत्तर प्रदेश में लगभग आठ माह बाद विधानसभा चुनाव होने हैं इसलिए अगर वहां अगर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के प्रति निधि बीएल संतोष और पार्टी के प्रदेश प्रभारी राधामोहन सिंह लगातार तीन दिनों तक योगी मंत्रिमंडल के सदस्यों, पार्टी विधायकों और संगठन के नेताओं से गहन यंत्रणाएं करें तो यह माना जा सकता है कि ये मंत्रणाएं राज्य विधानसभा के आगामी चुनावों में पार्टी की शानदार जीत का पांच साल पुराना इतिहास दोहराने की रणनीति का एक हिस्सा हैं परंतु अगर मध्यप्रदेश में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच अचानक ही मेल-मुलाकातों का दौर शुरू हो जाए तो निःसंदेह यह आश्चर्य का विषय है । शायद इसीलिए इन मेल मुलाकातों के निहितार्थों के बारे में तरह तरह की अटकलें भी लगाई जाने लगी हैं । यहां गौरतलब बात यह भी है कि मध्यप्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों के लिए अभी ढाई साल का लंबा समय बाकी है। इसलिए इन मेल मुलाकातों को राज्य विधानसभा के आगामी चुनावों से जोड़ कर देखना तो उचित नहीं होगा परंतु यह सवाल तो स्वाभाविक है कि जिन मुलाकातों को सौजन्य - भेंट का नाम दिया जा रहा है वह राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के मध्य प्रदेश लौटते ही क्यों शुरू हुई हैं।

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उल्लेखनीय है कि कैलाश विजयवर्गीय पिछले कुछ सालों से पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति में इतने व्यस्त थे कि उन्हें अपने गृह राज्य की राजनीति विशेष दिलचस्पी ‌ही नहीं रह गई थी। पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद जब कैलाश विजयवर्गीय ने अपने गृह राज्य लौटे तभी प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठने लगे थे कि प्रदेश में सत्तारूढ़ दल के कद्दावर नेता कैलाश विजयवर्गीय क्या फिलहाल तटस्थ बने रहना‌ करेंगे अथवा मध्यप्रदेश में उनके स्वर्णिम अतीत की मधुर स्मृतियां उन्हें एक बार फिर से राज्य की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए विवश कर देंगी। सत्तारूढ़ दल के दिग्गज नेताओं के बीच प्रारंभ सौजन्य भेंटों का यह सिलसिला दूसरी स्थिति की ओर इशारा कर रहा है‌ लेकिन इतना तो तय है कि मध्यप्रदेश से लेकर नईदिल्ली तो होने वाली सौजन्य भेंटों का यह सिलसिला निःसंदेह कौतूहल का विषय बन गया है।भाजपा के दिग्गज नेताओं के बीच मेल मुलाकातों में अचानक आई तेजी का असर सत्ता के गलियारों में भी दिखाई देने लगा है।

शिवराज सरकार में नंबर दो की हैसियत रखने वाले गृह मंत्री डा नरोत्तम मिश्रा से भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की सौजन्य भेंट के भी निहितार्थ खोजे जा रहे हैं। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि प्रदेश की राजनीति में डा नरोत्तम मिश्रा अब इतने कद्दावर नेता बन चुके हैं कि सत्ता के गलियारों की राजनीति अब उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है। यह हकीकत भी अब जगजाहिर है कि मध्यप्रदेश में सवा साल पहले हुए सत्ता परिवर्तन में डा नरोत्तम मिश्रा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उसके बाद गठित शिवराज सरकार में उन्हें उपमुख्यमंत्री पद का सबसे सशक्त दावेदार भी माना जा जा रहा था।

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भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह डा नरोत्तम मिश्रा की कार्यशैली , अनूठे सांगठनिक कौशल और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच उनकी लोकप्रियता से बहुत प्रभावित बताए जाते हैं। उनकी कार्य क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए ही उन्हें उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में महत्वपूर्ण सीटों पर पार्टी की विजय सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी और वे पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरे। उन्हें शिवराज सरकार में अभी तक हमेशा ही महत्वपूर्ण मंत्रालयों का प्रभार सौंपा गया है। कोरोना की कठिन चुनौती से निपटने के लिए सरकार ने जो कारगर रणनीति बनाई थी उसमें वे मुख्यमंत्री के प्रमुख सलाहकार रहे हैं। विगत दिनों जब दमोह विधानसभा सीट के उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी को अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा था तब उन्होंने इस हार के लिए पूरी निर्भीकता के साथ कुछ जयचंदों को जिम्मेदार ठहराने वाली जो टिप्पणी की थी उसने राजनीतिक पंडितों का भी ध्यान आकर्षित कर लिया था।

राज्य के पूर्व मंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने विगत दिनों डा नरोत्तम मिश्रा से सौजन्य भेंट के बाद अपने ट्वीट में उन्हें अपना मित्र और धाकड़ नेता बताया था। मध्यप्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा एवं संघ की दिग्गज हस्ती सुरेश सोनी की भी नरोत्तम मिश्रा के साथ हुई मुलाकात के भी राजनीतिक गलियारों में निहितार्थ खोजे जा रहे हैं। इसी बीच कैलाश विजयवर्गीय ने जब मध्यप्रदेश के सांसद और केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल से नई दिल्ली में उनके निवास पर जाकर उनके साथ भोजन किया तो प्रहलाद पटेल ने कहा था कि वे इस भेंट से अभिभूत हैं। यहां यह भी विशेष उल्लेखनीय है कि केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल के साथ हाल में ही न ई दिल्ली में मध्यप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष वी डी शर्मा, संगठन महासचिव सुहास भगत और सहसंगठन मंत्री हितानंद शर्मा भी‌ ‌मुलाकात कर चुके हैं। मेल मुलाकातों का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा । शिवराज सरकार के वरिष्ठ मंत्री भूपेंद्र सिंह की मुख्यमंत्री से भेंट के बाद गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा से मुलाकात और उसके बाद सहकारिता मंत्री अरविंद भदौरिया की भूपेंद्र सिंह से भेंट को भले ही पार्टी ने केवल सामान्य मुलाकात बताया हो परंतु इन मुलाकातों ने कई तरह की अटकलों को जन्म दिया है।

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पार्टी सूत्रों के अनुसार राष्ट्रीय नेतृत्व ने प्रदेश का जो फीडबैक मांगा है उसके बारे में जानकारी जुटाना ही इन सियासी मुलाकातों का मुख्य उद्देश्य था परंतु मुख्यमंत्री का इन मुलाकातों में सम्मिलित न होना अवश्य ही कौतूहल का विषय बना है।राजनीतिक पंडितों का मानना है कि मध्यप्रदेश में सत्तारूढ़ पार्टी के दिग्गज नेताओं के बीच सौजन्य भेंट का यह अप्रत्याशित सिलसिला अगर यूं ही चलता रहा तो आगे चलकर राज्य में सत्ता के नए समीकरण भी तैयार होने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। लगभग साल पहले हुए सत्ता परिवर्तन के बाद जब चौथी बार मुख्यमंत्री पद की बागडोर शिवराज सिंह चौहान को सौंपी गई थी तब से अब तक वे पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व और प्रधानमंत्री मोदी के विश्वासपात्र बने हुए हैं और उन्हें इस बात का पूरा भरोसा है कि जब तक प्रधानमंत्री मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सहित पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व का वरद हस्त उन्हें प्राप्त है तब तक वे प्रदेश के मुख्यमंत्री बने रहेंगे ।

प्रदेश में कोरोना की दूसरी लहर की शुरुआत में यद्यपि आक्सीजन की और रेमेडेसिवर इंजेक्शन की कभी और कालाबाजारी के आरोपों ने उन्हें असहज स्थिति का सामना का करने के लिए विवश कर दिया था परन्तु अब उनका पुराना आत्मविश्वास वापस आ चुका है । राजनीतिक मोर्चे पर मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को दमोह विधानसभा सीट के उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी की करारी हार ने अवश्य विचलित कर दिया था जिसके लिए भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने उनकी ही सरकार के पूर्व मंत्री जयंत मलैया और उनके पुत्र के विरुद्ध तत्परता से अनुशासनात्मक कार्रवाई करके मुख्यमंत्री की लोकप्रियता में गिरावट के आरोपों को खारिज कर दिया है । परंतु राज्य में अभी एक लोकसभा सीट और तीन विधानसभा सीटों के लिए जो उपचुनाव होना हैं उनमें भाजपा की प्रतिष्ठा को बचाना उनके लिए किसी कड़ी चुनौती से कम नहीं होगा। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि गत वर्ष सिंधिया गुट के जिन 22 विधायकों को संवैधानिक बाध्यता के कारण उपचुनावों का सामना करना पड़ा था उनमें से 5 सीटों पर भाजपा को पराजय का सामना करना पड़ा था।

सिंधिया के वफादार प्रायः सभी विधायकों को भले ही शिवराज सरकार में मंत्री पद से नवाज दिया गया हो परंतु उनमें से भी कुछ मंत्रियों को सरकार में पर्याप्त महत्व न मिलने की पीड़ा सता रही है। स्वयं ज्योतिरादित्य सिंधिया भी भाजपा में आने के बाद अपने लिए राज्यसभा की सदस्यता से अधिक कुछ हासिल नहीं कर पाए हैं। अगर उन्हें केंद्र में मंत्री पद के और लंबा इंतजार करना पड़ा तो उनके मस्तिष्क में यह प्रश्न भी कौंध सकता है कि क्या कांग्रेस में उन्हें अपनी बात कहने की आज से अधिक आजादी थी। वास्तविकता चाहे जो हो लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया का मौन निःसंदेह आश्चर्यजनक प्रतीत होता है। इसके अलावा सवाल भी स्वाभाविक है कि क्या सिंधिया का मौन शिवराज सरकार में शामिल उनके गुट के मंत्रियों को हतोत्साहित नहीं कर रहा है। सवाल तो और भी उठ रहे हैं और उन सवालों के बीच सियासी मुलाकातों से सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ये मुलाकातें अगले कुछ महीनों में प्रदेश में सत्ता समीकरण बदलने के पहले की कवायद का कोई हिस्सा हैं।

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