एमपी: ट्रायल के पहले आरोपी का पक्ष रखने का कानून बने, राज्य विधि आयोग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट में की सिफारिश.. डॉ. नवीन जोशी

एमपी: ट्रायल के पहले आरोपी का पक्ष रखने का कानून बने, राज्य विधि आयोग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट में की सिफारिश.. डॉ. नवीन जोशी
भोपाल: आपराधिक मामलों में आरोपी चार्ज फ्रेम होने के बाद पन्द्रह दिन के अंदर अपना पक्ष रखे कि वह क्यों दोषी नहीं है, इस अवधि में पन्द्रह दिन की ओर वृध्दि करने का भी कानून में प्रावधान हो। यह नवीन सिफारिश राज्य विधि आयोग ने अपनी आठवीं एवं अंतिम रिपोर्ट में राज्य सरकार से की है। इस रिपोर्ट को देने के साथ ही आयोग का तीन वर्षीय कार्यकाल खत्म हो गया है।



आयोग ने अपनी आठवीं रिपोर्ट क्रिमिनल प्रोसेस, नीड टु इनेक्ट फॉरमल लॉ फॉर डिफेन्स डिस्क्लोजर शीर्षक से दी है। इसमें बताया गया है कि अमेरिका, इंग्लैण्ड और आस्ट्रेलिया में ऐसा प्रावधान है कि चार्ज फ्रेम होने के बाद आरोपी से उसका पक्ष जाना जाये। दरअसल भारतवर्ष की न्याय प्रणाली में आरोपी पर अभियोजन का भार नहीं डाला जाता है और पीडि़त पक्ष को ही आरोप सिध्द करने पड़ते हैं। आरोपी को न्यायालय में विचारण के पूर्व आरोपों के संबंध में पूर्ण सभी दस्तावेज प्रदान कर दिये जाते हैं। विचारण के दौरान आरोपी कभी भी अपने पक्ष में नई-नई बातें कहता रहता है। इसीलिये आयोग ने सिफारिश की है कि आरोपी से भी चार्ज फ्रेम होने के बाद उसका पक्ष आना चाहिये।


यह पक्ष चाहे उसे दोषी न ठहराने के संबंध में हो या अन्य किसी विषय में पक्ष के साथ आरोपी को वे साक्ष्य भी डिस्क्लोज करने होंगे जिन्हें वह प्रस्तुत करना चाहता है। इसमें दस्तावेज एवं गवाह दोनों शामिल होंगे। इसके लिये आयोग ने कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर 1973 में धारा 224-ए, 224-बी, 224-सी एवं 224-डी जोडऩे की सिफारिश की है।


नहीं दी है एक्शन टेकन रिपोर्ट :


राज्य विधि आयोग ने अपने तीन साल के कार्यकाल में कुल आठ रिपोर्ट सरकार को प्रस्तुत की हैं। परन्तु इन पर क्या-क्या कार्यवाही की गई है,यह राज्य सरकार ने उसे किसी एक्शन टेकन रिपोर्ट के साथ नहीं बताया है। यही नहीं, आयोग ने करीब 1500 पुराने एवं अनुपयोगी कानूनी प्रावधानों को खत्म करने के लिये भी कहा हुआ है. जिन पर अभी तक एक को भी खत्म नहीं किया गया है। जबकि केंद्र की मोदी सरकार अब तक 4 हजार कानूनी प्रावधानों को अप्रासंगिक एवं अनुपयोगी होने के कारण खत्म कर चुकी है।


आयोग ने बताया कि आपराधिक मामलों में न्यायालय सत्य का शीघ्रता से पता चला सके एवं जल्द निर्णय दे सके, इसके लिये आठवीं एवं अंतिम रिपोर्ट में सिफारिश की गई है। आरोपी से भी चार्ज फ्रेम होने के बाद उसका पक्ष लिया जाना चाहिये।


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