माफियाओं  के हाथ बहुत लंबे हैं? आखिर करा ही दिया “मैडम” का तबादला- अतुल विनोद

माफियाओं  के हाथ बहुत लंबे हैं? आखिर करा ही दिया “मैडम” का तबादला- अतुल विनोद

 

प्रदेश में माफियाओं के हाथ कितने लंबे हैं इसके लिए डाटा देने की जरूरत नहीं है।

ऐसे एक नहीं अनेक मामले हैं जिनमें ईमानदार अधिकारियों को माफियाओं पर हाथ डालना महंगा पड़ा है।

मुरैना एसडीओ फॉरेस्ट श्रद्धा पन्द्रे को 3 महीने में ही हटना पड़ा।

इसके पीछे खनन माफिया के हाथ होने की कहानी सामने आ रही है।

बताया जाता है कि एसडीओ ने 3 महीने में खनन माफिया के खिलाफ एक के बाद एक ऐसे एक्शन लिए जो उनके धंधे की कमर तोड़ रहे थे।

हैरानी की बात यह है कि 3 महीने में श्रद्धा के ऊपर माफिया ने करीब 15 बार हमले किए और उससे भी ज्यादा बड़ी बात ये है कि श्रद्धा को अपने डिपार्टमेंट, पुलिस और प्रशासन से पर्याप्त सहयोग नहीं मिला।

कहा जा रहा है कि इसके बावजूद भी अवैध रेत परिवहन करने वाले 50 वाहनों को श्रद्धा ने पकड़ा|

कहा जा रहा है कि एसडीओ के एक्शन से पास के एक  विधायक भी खुश नहीं थे।

एसडीओ का ट्रांसफर सोशल-मीडिया, मीडिया और स्थानीय नागरिकों में चर्चा का विषय बन गया है।

श्रद्धा अकेली नहीं है जिन्हें खनन माफिया पर एक्शन लेना भारी पड़ा। एक आईपीएस को तो यहां जान से हाथ धोना पड़ा।

सैकड़ों मामले  जो यह बताते हैं कि ईमानदार अफसरों का फील्ड में काम करना कितना कठिन होता है।

सरकार न चाहते हुए भी कई बार इनका ट्रांसफर करने को मजबूर हो जाती है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह होती है खनन माफियाओं के लंबे हाथ।

इनकी पहुंच शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व तक होती है। वे अपनी इस पहुंच के जरिए शासन प्रशासन पर दबाव बनाने में कामयाब हो जाते हैं।

कई बार स्थानीय नेताओं से अच्छे सम्बंध स्थापित कर लेते हैं। चुनाव में स्थानीय नेता इनका सहयोग लेते हैं और बाद में इनके कहने पर अधिकारियों का ट्रांसफर कराने के लिए अपनी ही सरकार पर दबाव बनाने को मजबूर हो जाते हैं।

राजनेताओं को ऐसे मामलों में  मजबूर होते देखा गया है जब दिल ना चाहते हुए भी  ऐसी सिफारिश करते हैं जो उनकी पहले की करनी का नतीजा होते हैं।

राजनेता चुनाव लड़ते समय नहीं देखते कि वह किस का सहयोग ले रहे हैं। 

गलत का साथ लेकर जीतने के बाद गलत का साथ देना भी पड़ता है।

मध्यप्रदेश में चाहे किसी भी दल की सरकार रही हो खनन माफियाओं में राजनीतिक दलों के नुमाइंदे भी शामिल रहे हैं।

प्रदेश के खनन के अवैध कारोबार में राजनीति की पैठ के प्रमाण बिखरे पड़े हैं।

ऐसे सभी जिलों में जहां पर माइनिंग की संभावनाएं हैं वहां के कुछ स्थानीय नेता, जनप्रतिनिधि पावर में आते ही पैसा बनाने के लिए इस तरह के कारोबार में शामिल हो जाते हैं।

कई बार वो खनन माफियाओं के पीछे खड़े होते हैं और कई बार अपने परिजनों को इस तरह के कामों में लगा देते हैं।

खनन माफियाओं से हफ्ता वसूली में भी यह लोग पीछे नहीं रहे।

सरकारें बदली लेकिन माफियाओं के चेहरे शायद ही बदले। हां इतना जरूर हुआ कि वसूल करने वाले बदल गए।

यदि ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों का इस तरह से तबादला होता रहा तो शायद ही कोई अधिकारी दबंगई से भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की सोचेगा।

दूसरी बड़ी बात अधिकारियों को लेकर भी है 1 जिले में किसी महकमे में यदि 5 अधिकारी तैनात हैं तो 5 में से शायद ही 1,2 होंगे जो भ्रष्टाचार में लिप्त ना हों, जिनका गठजोड़ माफियाओं से ना हो। 

ये चर्चा आम है कि ज्यादातर अधिकारी तो ऐसी जगह पर पोस्टिंग पाने के लिए बड़ी रकम खर्च करते हैं।

ऐसे अधिकारी पोस्टिंग के लिए दिल्ली तक सोर्स लगाने पहुंच जाते हैं।

जो अधिकारी पैसा देकर सोर्स लगाकर पोस्टिंग पाता है उसके खिलाफ कितनी भी शिकायतें हो जाए वह नहीं हटाया जाता।

लेकिन जिसकी पोस्टिंग में कोई सोर्स नहीं है या उसने पैसा खर्च नहीं किया तो शायद लंबे समय तक किसी ऐसे विभाग में ऐसे पद पर कार्य न कर सके जो काली कमाई के धंधे से जुड़ा हुआ है।

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