मूलाधार चक्र – Muladhara Chakra – स्वामी सत्यानंद सरस्वती

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मूलाधार चक्र Muladhara Chakra

संस्कृत के शब्द मूल का अर्थ होता है आधार, जड़, नीवं । और यही इस चक्र की महता है, एक ऐसा चक्र जो बाकी सभी चक्रो का आधार है, मूलाधार । मूलाधार हमारे सभी चक्रों की जड़ है और यह चक्र हमारे जीवन के सभी आधारभूत बातों को प्रभावित करता है ।

mula = root , adhara = base, foundation

The Muladhara Chakra is situated at the base of the coccyx, it is the first of the human Chakras. Its corresponding Mantra is LAM. The Muladhara Chakra forms the border between animal and human consciousness.

मूलाधार हमारे शरीर मे कुंडलिनि शक्ती का स्थान है, एक ऐसी आधारभूत सम्भावना जिससे हमारा जीवन जमीन से आकाश को छू सकता है । यह कुंडलिनि शक्ती सोए हुए सर्प के रूप मे हमारे मूलाधार चक्र मे स्थित है । जाग जाने पर यह शक्ती ऊपर का रूख़ करते हुए रीढ़ की हड्डी से सुषमना नाडि मार्ग के द्वारा सहस्त्रदार चक्र मे पहुचती है जहा अन्तिम रूप से आत्मा परमात्मा मे विलिन हो जाती है । इसलिये मूलाधार चक्र के जागरण को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है ।

Kundalinī Shakti (spiritual energy) has its roots in the Muladhara Chakra, but it is in a deep, motionless sleep. When we awaken this slumbering potential that lies within the Muladhara Chakra we are able to work our way towards the light of knowledge and attain the fruit of Self-Realisation.

बहुत से साधक अपनी ध्यान अवस्था मे अपनी रीढ़ की हड्डी मे नीचे से ऊपर की और उर्जा को उठता हुआ महसूस करते है हालांकि बहुत से मामलों मे यह कुंडलिनि जागरण नही होता अपितु एक छोटे स्तर का उर्ज़ा का जागरण होता है जिसको प्राण का उत्थान बोला जाता है । उर्ज़ा की यह प्रारम्भिक जागृति जब ऊपर की और उठती है तो पिंगला नाडि से होती हुई यह मस्तिष्क तक जाकर छितर जाती है इस प्रक्रिया मे मार्ग मे पडने वाले सभी चक्र आंशिक रूप से ही शुद्ध हो पाते है । इस प्रकार के अनुभव मे हालाकि शक्ती का जागरण स्थाई नही होता है किन्तु फिर भी यह अनुभव साधक को बड़े व स्थाई शक्ती के जागरण के लिये तैयार करता है । 


कुंडलिनि जागरण के बाद साधक फिर से कभी भी पहले जैसा नही रहता है । यह जाग्रति सिद्धियों को प्रदान करने वाली होती है जो साधक को हमेशा के लिये उप्लब्ध हो जाती है, हालाकि यहा पर साधक का पतन भी हो सकता है लेकीन उसके वापिस आ जाने की सम्भावनाएँ भी बनी रहती है ।

मूलाधार चक्र बहुत महत्वपूर्ण है क्युकी एक तो यह कुंडलिनि शक्ती का स्थान है और दूसरा इस स्थान पर हमारे जन्मों जन्मों के भाव भी संग्रहीत है । हमारी बहुत सी नकरात्मक भावनाये यहा दबी हुई है । हमारे सभी अपराधिक भाव, हीनता, निराशा आदि की जड़ें यही पर है । वह सभी तरह के लोग जो किसी ना किसी तरह की भावनात्मक ग्रंथि से पीडित है उसका कारण है की वो मूलाधार से उर्ज़ा का प्रवाह नही कर पाये जिस कारण उनका जीवन असंतुलित हो जाता है । इस चक्र की जाग्रति से सभी प्रकार की मानसिक व भावनात्मक विकृतियों से छुटकारा मिल जाता है ।

जब तक मूलाधार चक्र शुद्ध नही हो जाता तब तक मस्तिष्क मे इस चक्र से जुड़े हिस्से जागृत नही होगे, अतः तब तक व्यक्तितव संतुलित नही होगा ।

जब मूलाधार चक्र जागृत होता है तो बहुत तरह की अनुभूतियाँ होती है, जैसे अधिकतर साधकों को शरीर के हवा मे उठ जाने का अनुभव होगा, उनको अपना शरीर ऊपर अंतरिक्ष मे जाता मालुम होगा, इसका कारण होता है मूलाधार से उर्ज़ा का प्रवाह, इस उर्ज़ा प्रवाह के कारण ही स्थूल शरीर का भान न्यूनतम व सूक्ष्म शरीर का भान अधिकतम होने लगता है ।

स्वामी सत्यानंद सरस्वती ।


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