संवत्सर क्या होता है?

ब्रह्माँड के रहस्य-31              प्राण -6
रमेश तिवारी
संवत्सर क्या होता है- हम अनेक बार चर्चा कर चुके हैं। यज्ञ की वैज्ञानिक प्रक्रिया के संदर्भ में संवत्सर का ही महत्त्व है, अतः आगे और भी सूक्ष्म से सूक्ष्म व्याख्या करेंगे। किंतु अभी तो हम प्राण व्यापार का ऐसा सजीव चित्रण करने जा रहे हैं, जिससे आप ऋषियों के अद्भुत वैज्ञानिक शोध के आगे नतमस्तक हो जाएंगे।

चलिये अपने नेत्रों को तैयार रखिये। दृश्य..! अब आप जिस पूरे ब्रह्माँड को देख रहे हैं| दसों दिशाओं में देखो। प्राणों का व्यापार बहुत शांति पूर्वक चल रहा है। सभी दिशाओं का ट्रैफिक खुला है। लेकिंन ईश्वरीय शासन में भ्रष्टाचार न होने से किसी भी कण को या प्राण को रोका नहीं जा रहा है। देखो न ..! अपनी आंखों से देख लो। किंतु आपको अपने ज्ञान नेत्र खोलने होंगे। अंतर्मन को। ह्रदय चक्षुओं को। 

चंद्रमात्मक यज्ञ के कारण ब्रह्माँड में राशि अनुसार 12 खंड बने दिख रहे हैं न। यह सभी खंड पशुओं के आकार के हैं। अरे भाई राशियां भी तो पशुओं के नामों पर ही रखी गईं हैं। एक भी खंड खाली नहीं है। ब्रह्माँड अटा पडा़ है। कण, कण में ईश्वर (भगवान )हैं| यह बात तो सभी लोग मानते हैं। कण कण में व्याप्त इन प्राणों के आने और जाने की गति बहुत तेज है। लेकिंन शांत और सहज है। दृश्य प्रत्येक राशि खंड से अनगिनत प्राण जा रहे हैं, शायद मांग कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। किंतु देखो तो उस तरफ भी तो देखो! मांग से ज्यादा प्राण तो लौट कर आ भी रहे हैं। किंतु न तो शोरगुल है और न ही चिल्लम चिल्मी । "प्राणों का व्यापार किंतना मौन है। कहते भी हैं कि पुहुप वास (पुष्प की सुगंध) से पातरो (पतला) ऐसो राम (ईश्वर) हमार...! 

                                  ब्रह्माँड के रहस्य-31  

देख ही नहीं सकते -सुगंध से भी पतली चीज को कोई देख सकता है? लेकिंन यह तो सोच ही सकते हैं कि इतनी महीन अनुभूति (प्राण) का उद्गम क्या है? यह प्राण किस माध्यम से यातायात कर रहे हैं। यह प्रश्न सत्य और सार्थक भी है। हम इसका उत्तर जानने के लिये असहनीय ताप वाले मार्तंड की ओर चलते हैं। खैर, जिस सूर्य की ओर हम देख ही नहीं सकते, तो चलेंगे कैसे?

मित्रो सभी को पता है कि ब्रह्मांड में मात्र तीन -स्वर्ग, वायु और पृथ्वी लोक ही हैं। लेकिंन हमारे ऋषियों ने तो ब्रह्माँड में 9 लोक प्रमाणित किये हैं । उक्त तीन लोकों सहित यह सात लोक -भुः, भुवः, स्वः महः, जनः तपः और सत्यम् तो सूर्य तक हैैं। जबकि दो लोक स्वयंभू मंडल और शिवलोक सूर्य के ऊपर स्थित हैं। ऋषियों ने सूर्य के ऊपर की स्टडी की। डंके की चोट पर और हम उनकी संतान सूर्य की ओर देख भी नहीं सकते| वाह भाई.! मौन रहना ही ठीक है।

गांवों में गाये जाने वाले एक दार्शनिक भजन की पंक्ति हैं। -" पत्ते, पत्ते की कतर निराली, तेरे हाथ कतरनी कहूंँ नहीं। और आगे देखें -तू सारे जग का न्याय करे, तेरी लगी अदालत कहूंँ नहीं। "। इतने सूक्ष्म हैं प्राण। हम बहुत विस्तार से बता आये हैं कि, सूर्य( सविता) की किरणें किस प्रकार पृथ्वी पर पड़तीं हैं। फिर पृथ्वी के चारों ओर लपटी 42 कोस मोटी आक्सीजन परत (बाराह भगवान) से छाया रुप (एक्सरे की तरह) पृथ्वी पर आतीं हैं। यह भी बता चुके हैं कि सूर्य किरणों के प्राण बनने तक कितने प्रोसेसिंग यूनिट लगे हैं। 

"सावित्री,गायत्री प्रभाग में अवश्य ही पढि़ये

इतने सूक्ष्म हैं प्राण। इन प्राणों का व्यापार सूर्य किरणों के पृथ्वी पर आने और पृथ्वी की काली किरणों के निरंतर ऊपर जाने की सनातन,प्रक्रिया का परिणाम है। इसी पद्धति से ऋषि वैज्ञानिकों ने यज्ञ का प्रावधान किया और ज्योतिषीय आधार पर विष्णु हरि तक पहुंँचाने के लिए जीबीएस सिस्टम लगा दिया। इस विषय पर हम "संवत्सर " प्रकरण में चर्चा करेंगेे। किंतु अभी तो आगे हम ऐसे मनोरंजक प्राण व्यापार की बात करेंगें जिससे ज्ञात होगा कि हाथी और मनुष्य एक ही मांस से कैसे बने हैं। प्रत्येक कण में प्राण हैं। गाय, अश्व, बकरी, अवि में कौन कौन से प्राण हैं। 

धन्यवाद।


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