ब्रह्माँड के रहस्य -65 देवताओं का संघ -1

संगठन में शक्ति का विज्ञान
                                                    ब्रह्माँड के रहस्य -65 
देवताओं का संघ -1

रमेश तिवारी

संकल्प क्या है। सौगंध क्यों नहीं लेना चाहिए। झूठे वादे और कसमों से प्राणों पर कैसे विपरीत असर पड़ता है आत्मा का क्षरण कैसे होता है। इन सब का विज्ञान से क्या संबंध है? इन सब बातों पर हम बहुत ही प्रामाणिक और रोचक चर्चा करेंगे। कथा देवताओं के विग्रह से प्रारंभ करेंगे चूंकि विवाद सोम के कारण शुरू हुआ। फिर सोम की मध्यस्ता से ही समाप्त भी हुआ।

पहले सभी देवता मिलित रूप में रहते थे। किंतु आपस में कलह के कारण जैसे ही वे अलग हुए कि परेशानी में पड़ गये। इस कथा में देखेंगे कि क्रंदसी (तीनों लोक) में विश्व देव कौन हैं। वृहस्पति का क्या स्थान है सोम (आक्सीजन) की क्या भूमिका है। 

इस कथा में आध्यात्म भी है और दर्शन भी है। ब्रह्माँड और पिंड में स्थित देवताओं की व्यथा भी है और सीख भी।हम कई बार ब्रह्माँड और शरीर में स्थित 33 देवताओं की बात कर चुके हैं। एक बार फिर से समझ लें कि यह 33 देवता रहते कहाँ हैं- ब्रह्माँड में तो इनका निवास पृथ्वी के माप से आकाश में उत्तर ध्रुव तक लगी (समझो) 33 मंजिला सीढी़ तक रहते हैं।

सत्रहवीं सीढी़ पर स्वर्ग और 21वीं सीढी़ (विषुवत वृत्त) पर विष्णु, सूर्य अथवा इंद्र रहते हैं। जबकि मनुष्य के शरीर में गुदा से लेकर नाभि तक, नाभि से लेकर पेट तक, पेट से कंठ तक 33 देवता रहते हैं। हमारे शरीर में स्थित ह्रदय, विष्णु का स्थान है।


यह देखना महत्वपूर्ण है कि इनमें झगडा़ कैसे हुआ और यह अलग अलग कैसे हो गये। इसका सहज उत्तर है- कि घर में किसी एक का मुखिया न होना। देवता अग्नि के प्रतीक हैं। प्रतीक ही क्यों अग्नि मय ही हैं। सर्व प्रथम यह देवता एक थे- कैसे? क्योंकि यह सब अग्नि के संपर्क में नहीं आये थे। नाभि के नीचे जो अग्नि है उसकी वजह से पहले तो यह 3 हुए- अग्नि की तीन अवस्थायें हैं- घन, तरल और विरल। 

नाभि के नीचे जो अग्नि (पाचक) है वह घन है ठोस है। वह जलती है तो, जो लपटें (अन्न की) निकलती हैं वे तरल( डकार, गैस ऐसिडिटी ज्वाला) हो जातीं हैं। फिर आगे चलने पर यही ज्वालायें वायु रूप में विरल (ह्रदय से कंठ तक) हो जातीं हैं। पृथ्वी लोक (नाभि में) ठोस अग्नि के 8 रूप हैं। जिनको वसु कहते हैं। 

नाभि से पेट तक (अंतरिक्ष) जो 11 देवता हैं, वे रुद्र कहलाते हैं। यही रुद्र पेट में उत्पात मचाते रहते हैं। फिर पेट से कंठ तक जो 12, देवता हैं वे आदित्य कहलाते हैं। शेष दो देवता अश्विनी कुमार, जोड़ का काम करते हैं। 8 के बाद 1 अश्विनी कुमार और फिर 11 और 12 देवताओं को जोड़ने वाले दूसरे अश्विनी कुमार। सोम जो पवमान वायु है। इसी को आक्सीजन कहते हैं। इसी प्राणवायु ने सबको अलग कर दिया। 

अग्नि रूप में तो यह 33 देवता एक ही थे। और तीन थोक थे इनके। अब आप गंभीरता से मनन करें। सोम बिना जीवन संभव नहीं है। और यह सोम संपूर्ण ब्रह्माँड में व्याप्त है। इसी प्रकार से मनुष्य के शरीर में भी नख से शिख तक सोम है। तो सोम रुपी प्राण वायु के संपर्क में आते ही यह सब अलग हो गये। प्रत्येक देवता तक सोम (प्राण) पहुंच गये।

पहले यह देवता एक दूसरे से बद्ध थे। मातहत थे। किंतु सोम रूपी प्राण वायु के संपर्क में क्या आये, मानो इनके पर ही उग आये। सब स्वतंत्र हो गये। किंतु इनकी यह स्वतंत्रता ज्यादा दिनों तक चली नहीं। कारण यह कि इनके संधि स्थानों (जोड़ भागों) में असुर घुस गये और मार मार कर इनकी तबियत हरी कर दी। अंधकार का नाम ही असुर है। जहां संध मिली कि असुर घुस पड़ते हैं। प्राकृत में देवता तो 33 ही हैं परन्तु असुर इनसे 3 गुना अधिक हैं। वे 99 हैं। 

प्रश्न यह है कि फिर इन देवताओं की अक्ल ठिकाने पर लौटी तो लौटी कैसे? सोम की वजह से तो यह सब फुट फैल हो गये थे। और क्या अब वही सोम इनको फिर से जोड़ने वाला है। कथा में इंद्र, वरूण और अग्नि की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहने वाली है, किंतु यह सब आगे जानेंगें। 

आज की कथा यहीं तक।  तो मिलते हैं। तब तक विदा।
                            धन्यवाद। 

                                                                    

Priyam Mishra



हमारे बारे में

न्‍यूज़ पुराण (PURAN MEDIA GROUP)एक कोशिश है सत्‍य को तथ्‍य के साथ रखने की | आपके जीवन में ज्ञान ,विज्ञान, प्रेरणा , धर्म और आध्‍यात्‍म के प्रकाश के विस्‍तार की |
News Puran is a humble attempt to present the truth with facts. To spread the light of knowledge, promote scientific temper, inspiration, religion and spirituality in your life.


संपर्क करें

0755-3550446 / 9685590481



न्‍यूज़ पुराण



समाचार पत्रिका


श्रेणियाँ