ब्रह्माँड के रहस्य-9 ब्रह्माँड का संचालन:

ब्रह्माँड का संचालन ..........................ब्रह्माँड के रहस्य-9 

रमेश तिवारी 

आज की चर्चा हम प्रारंभ तो मनुष्य के प्रारंभिक काल की मूलभूत बातों से करेंगे। परन्तु उल्लेख तो उन महान साध्य ब्राह्मण वैज्ञानिक महोदय का भी होगा, जिन्होंने कि अहंकारी और नास्तिक अन्य गुटबाज ,साध्य ब्राह्मण वैज्ञानिकों को ब्रह्म सत्ता का मार्ग दिखाया। ब्रह्माँड क्या है..! और ईश्वर का स्वरूप कैसा है। ब्रह्माँड में मनुष्य का अस्तित्व है...! तो क्यों है..? और यदि कोई ब्रह्माँड का संचालन करता भी है... तो, वह शक्ति आखिर है कहांँ। सही मायनों में मनुष्य को मनुष्य बनाने वाले उस महान पुरुष पर बातचीत करना लाजमी है। जैसे प्रत्येक व्यक्ति की उत्कट अभिलाषा होती है कि वह अपना "मूल "जाने। उसका सज़रा आखिरकार है क्या..! रक्त का उत्स (श्रोत) क्या है ..? जैसे राजस्व रिकार्ड में हमारी सँपत्ति का संपूर्ण ब्यौरा दर्ज होता रहता है। ठीक वैसे ही हमारे प्राचीन से प्राचीन ग्रंथों में, शास्त्रों और पुराणों में विश्व स्तरीय जानकारी दर्ज है। जिसको बाजारू भाषा में हम "नोइयत"भी कहते हैं।

एक बात और...! ताकि हमारे पाठक ठीक से समझ लें। हम अपने घरों,परिवारों और समाज में ऐसे बहुत से लोगों को देखते हैं, जो बिना मांगे हुए ही अपनी सलाह देते रहते हैं। क्षींक आने पर कंडी जलाकर उसमें शकर डालकर सूंघने को कहते दिखते हैं। आपसी विवादों में कभी एक तो कभी दूसरे पक्ष को समझाते भी दिखाई देते हैं। यद्यपि उनसे किसी ने कभी न तो कुछ पूछा था और न ही कभी किसी ने कुछ सलाह मांगी भी थी। लेकिंन स्वभाव गत कुछ लोग होते हैं जो कि( समझदार और बुद्धिमान बनकर )ऐसे परामर्श देते ही रहते हैं। मजेदार बात तो यह भी है कि फिर समाज भी उनको वैसी ही उपाधियों से भी विभूषित करने लगता है। देखें.. बिना पूछे औषधि बताने वालों को डाक्टर अथवा कम्पाउंडर साहब, सलाह देने वाले को वकील साहब, समझौतों की शिक्षा देने वालों को जज साहब और चलते फिरते ज्ञान देने वाले व्यक्ति को पंडित जी के संबोधन से पुकारने लगते हैं। 

                                            ब्रह्माँड के रहस्य-9

एक संबोधन और है जिसका उल्लेख किया जा सकता है। हां, मनोरंजन के लिए ही सही। किंतु सत्य भी तो है - "लगा लूथरा"अथवा "लगी लूथरी "इधर की उधर लगाने वाले / वाली (मंथरा) को ऐसे ही संबोधित किया जाने लगता है। ऐसे लोग इन्हीं विभूषणों से इतने प्रसिद्ध हो जाते हैं कि वर्षों तक हम उनका वास्तविक नाम भी नहीं जान पाते। ऐसी पदवियों को "यशोनाम"कहा जाता है। यशोनाम पड़ गया सो पड़ गया। हमारे महान वैज्ञानिक उन साध्य ब्राह्मण महोदय का भी एक "यशोनाम "था। था क्या,अभी भी है और आगे एक और खुलासा होने के पश्चात आप भी सौ टका सहमत होंगे कि जब तक मनुष्य का अस्तित्व रहेगा,उनका प्रचलित यशोनाम तो रहेगा। असली नाम तो कोई जानता नहीं। यदि हम उस नाम के थोड़ा आसपास भी पहुंच गये तो धन्य होंगे। प्रयास तो करते ही रहना चाहिए। जाता क्या है।

यशोनाम के हटकर अब बहुत गंभीर स्तर की चर्चा कर लेते हैं। प्रकृति और मनुष्य के शरीर का कितना सुन्दर सामजस्य किया है उन वैज्ञानिक महोदय ने। व्यक्ति का आधार है, उसके शरीर का मेरूदंड। अर्थात् "सुषुुम्णा" ।सामान्य भाषा में जिसको हम "रीढ़ "की हड्डी व्यवह्रत करते हैं। रीढ़ अर्थात आधार। घरों, परिवारों में भी एकाध व्यक्ति ऐसा होता ही है। जिस पर पर परिवार का भार लद जाता है। शुषुम्णा पर हमारा शरीर अवलंबित होता है। इसी रीढ़ से शरीर के सभी चक्र जुड़े रहते हैं घर का ऐसा व्यक्ति मर खप कर भी सभी को जोड़े रखता है। शरीर के सभी चक्र "मूलाधार से लेकर सहस्रार चक्र "तक रीढ़ से जुडे़ रहते हैं।

इसी प्रकार हमारी पृथ्वी की भी मेरू है। वैदिक भाषा में यह मेरू अग्नि का है। जो कि मेरू और कुमेरू से जुडा़ हुआ है। मेरू का मष्तक यदि सुमेरू है तो पांव तरफ कुमेरू। हम उत्तर की ओर मुंह करके नहीं सोते।उत्तर से शीत (ठंडी हवा) आती है। जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। पूर्व की ओर सिर करके सोने का वैज्ञानिक महत्व है। पूर्व से सूर्य उगता है। सूर्य से ऊर्जा और गर्मी मिलती है। जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। दक्षिण की ओर सिर करके क्यों नहीं सोना चाहिये। और यशोनाम का खुलासा भी आगे करेंगे। 


धन्यवाद


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