ब्रह्माँड के रहस्य -44 यज्ञ विधि-2

ब्रह्माँड के रहस्य -44 यज्ञ विधि-2

रमेश तिवारी 
सनातन धर्म- विश्व बंधुत्व की कामना करता है। "वसुधैव कुटुम्बकम"। अर्थात् हमारे ऋषि वैज्ञानिकों ने जीवन के महत्व को समझते हुए मनुष्य के आनंदमयी और निरोगी रहने की विधियों का निर्माण किया। ऐसे मार्ग खोजे और यज्ञ के माध्यम से उन वैज्ञानिक सूत्रों का शोध किया, जिससे मनुष्य का लोक तो सुधरे ही, परन्तु लोकान्तर भी सुखद हो।

ग्रंथों में कहा गया है कि सबसे प्रथम, ब्रह्मा जी ने यज्ञ किया। और भी अधिक जानना चाहें तो देखें- यज्ञ का हमारे जीवन में क्या महत्व था? इसका प्रमाण कुरूक्षेत्र (हरियाणा) की पावन भूमि से मिलता है, जहांकि भौमवासी (स्वर्ग वासी, कुरु प्रदेश, ईरान, ईराक, जो तब आर्यायण और अपवर्त कहलाते थे) देवता यज्ञ किया करते थे। देवताओं का एक स्थान निश्चित था। कुरूक्षेत्र।

उल्लेख यह भी मिलता है कि राजा कुरू ने इस 50 गुणा 50 मील के क्षेत्र (खेत) को यज्ञ स्थल ही बना दिया था। जबकि आज की हमारी चर्चा का जो विषय है, वह भी यहीं से प्रारंभ कर सकते हैं। यज्ञ विज्ञान की पहली प्रक्रिया ही सबसे विशाल और स्वच्छ, स्थल के चयन से ही प्रारंभ होती है। जहां यज्ञ करना हो, वह स्थान सबसे ऊंचा हो। यज्ञ स्थल चौसर, भूमि ठोस हो और मैदान का ढ़लान पूर्व की ओर हो। ढ़लान पूर्व की ओर ही क्यों हो! इसका बहुत तार्किक उत्तर यह दिया गया है, क्योंकि हमारे सभी देवता पूर्व दिशा में ही रहते हैं। ऊर्जा के श्रोत और परमात्मा स्वरुप सूर्यदेव भी पूर्व में ही उद्भासित होते हैं। सफल यज्ञ के लिये यह भी आवश्यक है कि यज्ञ स्थल दक्षिण दिशा की ओर से ऊंचा होना चाहिए। क्योंकि दक्षिण की दिशा पितरों की होती है।

यजमान की दीर्घायु के लिए यह चयन आवश्यक होता है। यज्ञ स्थल का चयन यजुःमंत्रों के आधार पर होता है। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि यज्ञ स्थल के पूर्व में स्थल से बडा़ कोई और मैदान न हो, क्योंकि ऐसा होने से यजमान के शत्रु बढ़ जाते हैं। हां, स्थल के पश्चिम में जितनी ज्यादा जगह पडी़ हो, वह ठीक है, क्योंकि इससे यज्ञ की सफलता उतनी ही बढ़ जाती है। फिर यज्ञ करवाने वाले ब्राह्मण भी वेदानुरागी और सांगोपांग वेदाध्यायी हों, तभी यज्ञ सफल हो सकते हैं। ऐसे यज्ञ विज्ञान को जानने वाले ब्राह्मण ही देव यजन को देवों तक पहुँचा सकते हैं। जीबीएस गड़बडा़ने से गाडी़ भी अपनी दिशा तक नहीं पहुंँच पाती है। अब हम "प्राचीनवंश" की बात करते हैं!

अर्थात् उस कुटीर का निर्माण, कैसा हो, क्या सावधानियां बरती जाना चाहिए- जहां कि दीक्षित यजमान को ठहरना है। क्योंकि उसी के कल्याण के लिये तो यज्ञ किया जा रहा है। वह बांस के शहतीरों (दासे) वाली हो। जिसमें यजमान सोये तब उसका सिर पश्चिम की तरफ और पैर पूर्व की ओर न हों। प्राचीनवंश उत्तराभिमुख होती है, क्योंकि उत्तर दिशा मनुष्यों की है। देवता अदृश्य होते हैं। अतः प्राचीनवंश भी घेरकर अदृश्य सा ही बनाया जाता है। प्राचीनवंश में हर कोई प्रवेश नहीं कर सकता। केवल ब्राह्मण, राजन्य अथवा वैश्य ही प्रवेश कर सकता है। इसका कारण मात्र इतना ही है कि यही तीनों वर्ण यज्ञ के अधिकारी हैं। तात्पर्य यह नहीं कि दीगर वर्ण अर्थात् शूद्र और निषाद यज्ञ में भाग नहीं ले सकते। अथर्व वेद में लिखा है कि यह पांँचों वर्ण (वर्ण मात्र चार ही नहीं, पाँच बताये गये हैं) यज्ञ में सम्मिलित होते हैं। और यह भी कि यजमान सामान्य मनुष्य न रहकर अब देवता बन गया है, अतःमात्र ब्राह्मण के माध्यम से ही अपनी बात संप्रेषित कर सकता है।

                                   ब्रह्माँड के रहस्य- 44

यजमान के आहार, वस्त्र और दीक्षित होने आदि की संपूर्ण प्रक्रियाओं पर बाद में बात करेंगे। इन सब वैज्ञानिक विधियों के पूरा करने के बाद ही यजमान अपने दोनों हाथों में अरणियां (काष्ठ) लेकर प्राचीनवंश से बाहर, यज्ञशाला की ओर निकलता है।

मित्रो, यज्ञ कोई सामान्य विज्ञान नहीं है। इसकी पवित्र विधियों का पालन करके ही आत्मा को स्वर्ग अर्थात् विष्णुधाम तक पहुंँचाई जा सकती है।

आप रुचिपूर्वक पढेंगे तो हम उन सब विधियों का तार्किक और प्रामाणिक विज्ञान आपको बताते रहेंगे। सनातन विज्ञान के अपरिमित सत्य को जानकर, संभवतः आपको भी गर्व की अनुभूति हो।

आज बस यहीं तक। तो मिलते हैं| तब तक विदा| 
धन्यवाद|


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