नवनाथ साक्षात्कार………. साधना विधि

नवनाथ साक्षात्कार (साधना विधि):

यह नवनाथ सिद्ध ॐकार आदिनाथ जी द्वारा प्रतिपादित है। अर्थात एक परम ज्योति प्रकट हुई फिर उससे नवनाथ ज्योति स्वरूप उत्पन्न हुए जो जगत उद्धार के लिये नाथ रूप में अवतरित हुए। नाथ सिद्ध नवनाथ प्राणी मात्र के सभी प्रकार के पापों, संकटों एवं दुखों का नाश करने वाले हैं। अपने भक्तों को ज्ञान प्रदान करके मोक्ष मुक्ति को प्राप्त करवाते हैं। अत: ऐसे नवनाथ सिद्धों की प्राप्ति दर्शन अनुभूति साक्षात्कार एवं कृपाशिर्वाद प्राप्ति के लिये अनेक साधन तथा मार्ग हैं। हमारे नाथ सिद्धों की शाबर मंत्र योग साधना भी एक अत्यंत प्रभावी साधना एवं शीघ्र फल दायक है। जो पूर्वकाल से प्रमाणित तथा पूर्ण अनुभव सिद्धांत।

Shri Navnath Bhaktisar - श्री नवनाथ भक्तिसार - About | Facebookमुख्यतः यह शाबर मंत्र योग साधना दो प्रकार की है। एक सगुण (द्वैत, बहिर्मुखी या दृष्टिगोचर) साधना तथा दूसरी निर्गुण(अद्वैत अन्तर्मुखी या अदृष्टीगोचर) साधना है।

संगीत साधना में- इष्ट की पूजा, पाठ करना, यज्ञ हवन करना, अनुष्ठान, भजन, जागरण इत्यादि करना और इष्ट के प्रति अर्थात गुरू गोरक्षनाथ जी या नवनाथ जी के प्रति भक्ति भाव निर्माण करना, ऐसे भक्ति रस में जब परिपक्व अवस्था आती है तब उस भावातित भक्ति में भक्त पूर्ण पवित्र एवं विशाल अन्तकरण का हो जाता है। हर क्षण हर वस्तु में वह इष्ट का व्यापक अधिष्ठान देखता है। उत्तरोत्तर वह सुख-दुःख, पाप-पुण्य के परे अवस्था में जाते हुए मुक्त मोक्ष को प्राप्त होते हैं, उदा सन्त मीराबाई, कबीर, नानक जी, सूरदास, तुलसीदास, नामदेव, तुकाराम आदि सन्तों ने यह भूमिका निभाई है।

निर्गुण साधना में- साधक मंत्र, जप, इष्ट का ध्यान(चिन्तन, मनन) करना, घण्टों अनुष्ठान करना इष्ट प्राप्ति के हट से हठयोग (खडेश्वरी, त्यागी, तपस्वी, मौनी, इ.) करना इसमें काया, वाचा, मन, सक्षम एवं पवित्रता के लिये योगासन-आसन-प्राणायाम-मुद्रा-बंध-अष्टांग योग इत्यादि करते हैं। उत्तरोत्तर साधक खडदर्शन कुण्डलिनी योग ब्रह्म ग्रंथी द्वारा आत्मानंद, विष्णु ग्रंथी द्वारा परमानंद, एवं रूद्रग्रंथी द्वारा कैवल्यानंद को प्राप्त होते हैं। तथा आगे उनमन अवस्था, नादानुसंधान, शून्य समाधि तथा मुक्त मोक्ष अवस्था, ज्योति स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं। गुरू गोरक्षनाथ जी , नवनाथ सिद्ध, महावीर, गौतम बुद्ध, शंकराचार्य इ. महा साधकों ने यह भूमिका निभाई है। ऐसे अनेकों साधू सन्त योगी एवं महान साधक आगे चलकर जन जनता के मार्ग दर्शक बने, किसी के इष्ट बने, किसी के भगवान बने, किसी के उपदेशक तो किसी ने उन्हें अपने सद्गुरू रूप में अपनाया।

श्री नवनाथ Shri Navnath - फ़ोटो | Facebookसतगुरू : आध्यात्मिक एवं परमार्थिक साधना तथा भक्ति एवं समूचे सत्कर्मों को योग्य मार्गदर्शन तथा सहायता के लिये सतगुरू का होना अत्यावश्यक है। सतगुरु महिमा अपरम्पार है। देवी देवता अर्थात भगवान भक्त को केवल उसके कर्म अनुसार सुख-दुःख देकर उसे भक्त ही बना के रहते हैं। किन्तु सतगुरू अपने शिष्य को पूर्णत्व या परिपूर्ण पात्र बनाकर उसे अपने ही जैसा गुरू बना देते हैं। योग्य सतगुरू मुक्ति मोक्ष दाता होता है। देवी देवता तो प्रालब्ध वश किये कर्मों के फल ही देते हैं, किन्तु सतगुरू अपने आध्यात्मिक ज्ञान एवं शक्ति प्रभाव से तथा मार्गदर्शन एवं सहायता से अपने भक्त, शिष्य को सतकर्म करवा के उसके पूर्व संचित दुष्कर्मों का खण्डन या नाश करवा कर उसे ज्ञान और मुक्ति मोक्ष पथ पर ले जाते हैं। परम, परमात्मा, परमेश्वर, की पहचान सतगुरू ही करवाते हैं। अतः प्रथम प्राधान्य मान सतगुरू को ही दिया जाता है।

सतगुरू अर्थात सत यानी सत्य, "गु" यानी अधंकार (माया) से, "रू "याने प्रकाश (ज्ञान) की तरफ ले जाने वाले व्यक्ति को सतगुरू कहते हैं। सृष्टि में ध्यानी, ज्ञानी, तपस्वी, हठयोगी, कर्मयोगी, तंत्र-मंत्र इत्यादि अनेक प्रकार के सतगुरू विद्यमान हैं। मूलतः सबका ध्येय आखिर मोक्ष मुक्ति ही होता है। जैसे अनेक नदियां जलधारा अन्त में सागर को प्राप्त होती हैं, उसी प्रकार सब कुछ कर करा के उसे त्यागना और इसके उपरान्त मुक्ति को पाना ही सत्य जीवन प्रवाह है। कहते हैं गुरू छान के करो किन्तु ऐसा नहीं है। जो माया जंजाल में फंसा है वह क्या गुरू को छानेगा, इसके लिये व्यक्ति सुपात्र होना चाहिये और सुपात्रता गुरू बिना कैसे होए यह सतगुरू प्रति दृढ़ विश्वास एवं श्रद्धा होना अनिवार्य है। सच्चे सतगुरू की प्राप्ति को तो मनुष्य प्राणी का भाग्य कहाँ है। 

ॐकार आदिनाथ जी सम्पूर्ण प्राणी मात्र के आदि गुरू हैं, "सत्यम् शिवम् सुन्दरम्" जीव-शिव का मिलन ही मोक्ष है। हमारी नाथ समाज प्रमाणित करती है कि नाथ सम्प्रदाय का प्रतिष्ठान शिव आदिनाथ द्वारा प्रारंभ हुआ है। जिन्होंने प्रथम उदयनाथ (पार्वती अवतार) तथा मत्स्येन्द्रनाथ जी (माया अवतार) को सहयोग ज्ञानोपदेश दिया। आगे गुरु गोरक्षनाथ जी को उसका लाभ हुआ फिर नवनाथ सिद्धों को फिर चौरासी सिद्धों को तदनंतर अनन्त कोट सिद्धों को इस नाथ योग ज्ञान होकर अजर अमर हो गये। इस प्रकार गुरू शिष्य परम्परा से यह नाथ सम्प्रदाय चलता आया आज भी विस्तृत रूप में विद्यमान है। ऐसे गुरू शिष्य परम्परा में गुरू शब्द एवं नाद योग साधना को विशेष प्राधान्य गुरू शबद अर्थात गुरू मन्त्र कहा गया है।

सिद्धनाथ औघड़: नवग्रह साबर मंत्रमंत्र एवं उसकी साधना :- गुरु शब्द, मन्त्र योग, साधना नाथ सिद्धों का मूलाधार है। वैसे मन्त्र योग साधना में वैदिक, वेदोक्त मन्त्र, शाबर मन्त्र, कापालिक मन्त्र, कौल या शैव मन्त्र, शक्ति मन्त्र, इत्यादि का समावेश है। अपितु शाबरी मन्त्र साधना नाथ सिद्ध सम्प्रदाय का मूल-महत्तम स्त्रोत है। जो कलियुग में स्वयंसिद्ध, अत्यंत प्रभावी एवं शीघ्र फलदाई होते हैं। अर्थात इसलिए शाबर-साधना के लिये समूल ज्ञाता ऐसे सतगुरू के मार्गदर्शन अत्यावश्यक है।

जप :- जप करने को चिन्तन एवं मनन करना कहा है। अर्थात (सतगुरू) शबद को एवं उसके अर्थ (भावार्थ) = समझते हुए बार-बार उच्चारण करने को मन कहा है। वही शबद को मन्त्र कहा है और यही मन्त्र दृढ़ विश्वास एवं श्र. (भक्ति) से या विशिष्ट उद्देश्य से चिन्तन करने को जप कहा है। अर्थात मन को अन्य विचारों से हटाकर शबद के प्र एकाग्र करना चाहिये।

इस मन की एकाग्रता के लिये कुछ नियमों का पालन करना एकाग्रता के लिये सहायक होता है :- 

१-सच बोलना |

२-सभी प्राणियों के प्रति अहिंसा भावना |

३-दया-क्षमा-शान्ति में रहना |

४-स्वाभिमान ए जैसे: धीरज और धैर्य से रहना |

५-अपनों से एवं स्वयं से प्रामाणिक रहना |

६-मन/चित्त के चेतन, शक्ति को काम, क्रोध, मन मत्सर, ईर्ष्या आदि में खर्च नहीं करना |

७-सहनशीलता और सरलता युक्त जीवन अपनाना |

८-शरीर एवं मन शुद्ध तथ पवित्र रखना, किसी से कुटिल नीति, छल कपट नहीं करना |

९-सन्तुलित आहार या मित्ताहारी रहना |

१०-हर तरह के परिस्थिति में खुश एवं सन्तोष वृत्ति में विचरणा |

११-तपस्या सदृश्य गर्मी-वर्षा दी तथा लाभ-हानि ने स्थिर रहना |

१२-ईश्वर पूजन तथा सतसंग दृढ़शक्ति विश्वास में करना ईश्वर के प्रति अपने को स्थिर रखना |

१३-योग्य पात्र को दान करना |

१४-सतगुरू सेवा करना तथा उनके उपदेश को धारण करना |

ऐसे सदाचार नियमों का पालन करने से बुरे संस्कारों से बचाव होकर मन शरीर को अच्छे संस्कार जागृत होते हैं। अन्यथा ध्यान-धारणा की साधना करते समय पूर्व बुरे संस्कार सामने आकर साधना में व्यत्यय निर्माण करते हैं। आगे साधना में इन अच्छे बुरे संस्कारों को मन/चित्त से हटाने के लिये इन से विरोध कर हट से हठयोग करना होगा।


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