नवरात्र विशेष 8 : शक्ति की उपासना

शक्ति की उपासना

निगम एवं आगम के तत्ववेत्ता ऋषियों के अनुसार वह परमतत्व आदि, मध्य एवं अंत से हीन है। वह निराकार, निर्भय, निरुपाधि निरंजन, नित्य, शुद्ध एवं बुद्ध है। वह एक है, विभु है, चिदानन्द है, अद्भुत है, सबका स्वामी एवं सर्वत्र है। फिर भी वह लीला के लिए अनेक रूपों में अवतरित होकर लोक कल्याण करता है।

शक्तित्व :

देवी भागवत के अनुसार एक बार देवताओं ने भगवती से पूछा -'कासि त्वं महादेवि - हे महादेवी, आप कौन हैं ? तब देवी ने उत्तर दिया- मैं और ब्रह्म हम दोनों सदैव शाश्वत एकत्व हैं। जो वह है, सो मैं हूं और जो मैं हूं, सो वह है। हममें भेद मानना मतिभ्रम है।

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शक्ति की उपासना का प्रयोजन :

संसार का प्रत्येक प्राणी भय, भ्रांति एवं अभाव से किसी मात्रा में ग्रस्त रहता है। परिणामस्वरूप वह संसार में घात-प्रतिघात से त्रस्त रहता है। शक्ति गमों के अनुसार शक्ति सांसरिक दुःखों के दलदल में फंसे व्यक्ति का कल्याण करने के लिए कभी महालक्ष्मी, महाकाली या महासरस्वती के रूप में अवतरित होती है तो कभी काली, तारा, षोडशी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बंगलामुखी, मातंगी, भुवनेश्वरी एवं कमला - इन दशमहाविद्याओं के रूप में वरदायिनी होती है और वही आद्या शक्ति अपने उपासकों की मनोकामना पूर्ति के लिए शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी एवं सिद्धिदात्री इन नवदुर्गाओं के रूप में प्रकट होती है। वस्तुतः इस जगत का सृजन, पालन एवं संहार करने वाली वह आद्यशक्ति एक ही है। उसके लोककल्याणकारी रूप को दुर्गा कहते हैं। तंत्रागम के अनुसार वह संसार के प्राणियों को दुर्गति से निकालती है, अतः दुर्गा' कहलाती है। मंत्र, तंत्र एवं यंत्रों के माध्यम से उस शक्ति तत्व की साधना के रहस्यों का उद्घाटन करने वाले ऋषियों का मत है कि उसकी उपासना से भक्त को पुत्र, विद्या, धन तथा मोक्ष मिलता है।

शक्ति उपासना का काल :

नवरात्रि की मूल संकल्पना एवं आधारभूत सिद्धांतों का प्रतिपादन करने वाले वैदिक ज्योतिष के प्रणेताओं ने हमारे एक वर्ष को देवी देवताओं का एक 'अहोरात्र' (दिन-रात) माना है। ज्योतिष शास्त्र के कालगणना के नियमों के अनुसार मेष संक्राति को देवी-देवताओं का प्रातःकाल, कर्क संक्राति को उनका मध्य काल, तुला संक्राति को उनका सायंकाल तथा मकर संक्राति को उनका निशीथ काल माना जाता है। इसी आधार पर शाक्त तंत्र ने मेष संक्राति के आसपास आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से बसंतकालिक नवरात्रि और मकर संक्राति के आसपास, आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शारदीय नवरात्रि और मकर संक्राति के आसपास, आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से गुप्त नवरात्रि और मकर संक्राति के आसपास माघ शुक्ल प्रतिपदा से पुनः गुप्त नवरात्रि का निर्धारण किया गया है। इन नवरात्रि को शक्ति की उपासना के लिए महत्वपूर्ण माना गया है इन चारों नवरात्रि में आद्यशक्ति की साधना एवं उपासना की महिमा अपरम्पार है। यही कारण है कि असम, बंगाल एवं बिहार से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक पूरे पूर्वी भारत में इन दिनों दुर्गापूजा' का महोत्सव पूरी श्रद्धा, भक्ति एवं धूमधाम से मनाया जाता है।

नवरात्रि में शक्ति उपासना का फल :

शारदीय नवरात्रि में दुर्गा पूजा महापूजा कहलाती है इस समय में श्री दुर्गासप्तशती का पाठ, मंत्र का जप, दशमहाविद्याओं की साधना, ललिता सहस्रनाम या दुर्गा सहस्रनाम का पाठ, नवरात्रि का व्रत, दुर्गा पूजा एवं कन्यापूजन करने से मनुष्य सभी बाधाओं से मुक्त होकर धन-धान्य एवं पुत्र-पौत्र का सुख प्राप्त करते हैं।

विसर्जन में रखें ध्यान:

विसर्जन पूजन करने के पश्चात प्रवाहित करने के लिए कलश को मस्तक पर रख कर किसी नदी, तालाब, बावड़ी, अथवा कुंड तक जाएं। प्रतिमा की स्थापना यदि घर में कर रहें हैं तो छोटी प्रतिमा भी सिर पर रख कर ही विसर्जन के लिए ले जाएं। पूजा पंडाल में बड़ी प्रतिमा होने पर भी कंधे पर उठा कर ले जाने का विधान है। विसर्जन यात्रा के दौरान मंगल ध्वनि का विधान है। इसके लिए बंगीय समाज में मुख से ध्वनि निकालने और डाक बजाने को श्रेष्ठ माना गया है। इसके अतिरिक्त शंख, घंटा-घड़ियाल का प्रयोग शास्त्रसम्मत है | विधान तो यही कहता है कि सूर्यास्त से पूर्व कलश अथवा प्रतिमा दोनों का ही विसर्जन हो जाना चाहिए। कलश या प्रतिमा जल में आधी डूब जाए तब तक उस पर हाथ रखना चाहिए। जल में गिरा देना गलत है। प्रदूषित जल में विसर्जन निषेध है दैनिक उपयोग में लाए जाने वाले कुंए में भी विसर्जन नहीं किया जा सकता। पर्यावरण की दृष्टि से निर्माल्य (प्रतिमा पर अर्पित फूल-माला-फल आदि) नदी में विसर्जित करने की बजाय मिट्टी में गाड़ दें। शास्त्रों में यही मान्यता है।


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