नवरात्रि विशेष 9: ॐ मंगल कामना की नौ रातें

ॐ मंगल कामना की नौ रातें

शारदीय 'नवरात्रि' देवी पूजा के लिए प्रसिद्ध है। ये धर्म,अर्थ, काम एवं मोक्ष चारों पुरुषार्थों को देने वाली है। आज के भौतिकवादी युग में देवी उपासना एवं पूजा के स्वरूप में परिवर्तन हो गया है देवी पूजा के प्रमुख मानकों में घटस्थापना, जवारेरोपण, अखंड दीपसाधना, देवी की मूर्ति अथवा चित्र का पंचोपचार पूजन, अष्टमी-नवमी को कुलदेवी पूजन, कुमारी पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ, नवार्ण मंत्र जप साधना एवं देवी स्तोत्र का पाठ आदि प्रमुख हैं। पूजा विधि प्रारंभ करने से पूर्व जल से शरीर की शुद्धि कर लें। पूजा सामग्री को एक तश्तरी में एकत्रित कर अपने सम्मुख रख लें। एक चौकी या पाट पर देवी की तस्वीर, मूर्ति अथवा जो भी साधना उपलब्ध हो, विराजमान कर दें।



                                  
                                  卐 घटस्थापना 卐

प्रतिपदा को शुभ मुहूर्त में पवित्रतापूर्वक देवी के सम्मुख पाट पर घट (कलश) की स्थापना करें। एक तांबे के पात्र में जल भरकर उसमें आम के पांच हरे पत्ते लगा दें। उस पर श्रीफल रखें| इस चौकी पर धान्य (गेहू) रखकर इसकी गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य से पूजा करें। इसे घटस्थापना कहते हैं। घट को लक्ष्य कहा जाता है। यह पवित्रता एवं समृद्धि का सूचक है।

                                   卐 जवारे रोपण  卐

प्रतिपदा के दिन परिवार की खुशहाली के लिए जवारों को बोते हैं| मिट्टी के एक बड़े दीपक में काली मिट्टी डालकर धान्यों के राजा जौ या गेहूं को बिखेर दें। जल छिड़ककर इनकी पंचोपचार से पूजा करें। जवारे मंगल हरियाली व समृद्धि के सूचक माने जाते हैं।

                                   卐 अखंड दीप साथना 卐

देवी के स्थान पर शुद्ध घी अथवा तेल के एक बड़े दीपक में कपास की बड़ी बत्ती बनाकर उसे प्रज्ज्वलित कर सुरक्षित स्थान पर रख दें। दीप ऐश्वर्य, सुख, समृद्धि का प्रतीक हैं।

                                   卐 देवी पूजा 卐

देवी की मूर्ति अथवा चित्र को शुद्ध जल से स्नान कराकर चौकी के मध्य स्थापित करें । सर्वप्रथम अनामिका उंगली से देवी के मस्तक, हृदय, भुजाओं और चरणों में गंध लगाएं। फिर देवी को रक्त पुष्प समर्पित करें। दीपक का पूजन करें और नैवेद्य समर्पित कर पूजन विधि संपन्न करें। यह हुई पंचोपचार देवी पूजा। इस पूजा से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती हैं ।

                                   卐 कुलदेवी पूजन 卐

अपनी कुल परंपरा अनुसार दुर्गा अष्टमी अथवा नवमी को कुलदेवी पूजन का भी विधान होता है। यदि हम पूरे नौ दिन देवी की पूजा नहीं कर सकें तो अष्टमी या नवमी को पूरे परिवार के साथ महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती और भैरव पूजन के साथ बटुक व कुमारीपूजन कर सकते हैं।

                                   卐 कुमारी पूजन 卐

नवरात्रि में दो से दस वर्ष की कुमारी के पूजन का विधान होता है यदि प्रतिपदा से नवमी तक दो वर्ष से दस वर्ष की कन्याओं का पूजन किया जाए तो अति उत्तम है। यदि संभव न हो तो नवमी को एक साथ नवदुर्गा स्वरूपकुमारी, पूजन से ऐश्वर्य, भोग, चारों पुरुषार्थों, श्री और संपदा की प्राप्ति होती है।

                                     देवी स्तवन 卐

प्रतिपदा से नवमी पर्यन्त दुर्गा सप्तशती का पाठ भी किया जा सकता है यह दुर्गा पूजा एक विशेष अंग माना जा सकता है। दुर्गा सप्तशती में तेरह अध्याय होते हैं, जो तीन चरित्रों में विभक्त हैं। पहले, दूसरे और तीसरे चरित्र का प्रतिपदा, द्वितीया और तृतीया में पठन कर सकते हैं। अथवा नौ दिनों में भी इसका पारायण किया जा सकता है। यदि यह भी संभव न हो तो नवार्ण मंत्र "ओम ऐं हीं क्लीं चामुंडायै विच्चै" इस मंत्र का भी प्रतिदिन पाठ करने का विधान है। इस महामंत्र का जाप भी इच्छानुसार करें। इससे देवी को प्रसन्नता प्राप्त होती है। इस प्रकार नवरात्रि में उपर्युक्त साधनों में से कोई भी एक उपासना या साधना का समय अपनी सुविधानुसार, और संपूर्ण अनुष्ठान के साथ करना चाहिए। ये सभी साधन सामान्य एवं सर्वसुलभ और उपयोगी भी हैं।

माँ दुर्गा के मंत्र

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः। 

नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्मताम्।।

या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः । 

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।। 

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः । 

जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नामोऽस्तुते।। 

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि में परमं सुखम।

रूपं देहि जयं देहि यशोदेहि द्विषो जहि।। 

सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।

शरण्ये त्रयम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते।। 

सर्वबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः ।

मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः । 

शरणागत दीनार्त परित्राणपरायणे।

सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते। 

सर्वबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।

एवमेव त्वया कार्य मस्माद्वैरि विनाशनम्।।


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