न्यूज़ चैनलों की चले तो आज ही जंग करवा दें-दिनेश मालवीय

न्यूज़ चैनलों की चले तो आज ही जंग करवा दें

-दिनेश मालवीय

अक्सर सोचता हूँ कि मानवता के इतिहास में क्या कभी ऐसा समय आएगा, जब जंग
नहीं होगी. पहले अनेक लोगों ने ऐसा विचार किया और इसके लिए प्रयास भी
किये, लेकिन जंग को कोई रोक नहीं सका. यह किसी न किसी रूप में कहीं न
कहीं चलती ही रही.

पहले जब कबीले थे तो उनके बीच, फिर गाँव बने तो उनके बीच, फिर शहर बने
तो उनके बीच, फिर राज्य बने तो उनके बीच और उसके बाद देश बने तो उनके बीच
जंग चलती चली आ रही है. अब देशों के खेमे बन गये हैं, तो जंग उनके बीच
होगी.

इसीलिए किसीने कहा है कि जिसे हम हम शांतिकाल कहते हैं, वह दरअसल अगली
जंग की तैयारी का समय होता है.  ऐसा लगता है कि मनुष्य का मूल स्वाभाव ही
जंग करने का रहा है. वह अगर कभी हथियारों से जंग नहीं कर रहा होता, तो
किसी और रूप में जंग कर रहा होता है. ऐसा भी लगता है कि दुनिया बनाने
वाले की योजना में जंग एक अभिन्न अंग है. वरना क्या कारण है कि लाख
कोशिशों के बाद भी जंग रोकी नहीं जा सकी हैं. नीत्जे ने कहा था कि उसे
फौजियों की परेड में उनके जूते से जो आवाज निकलती है, वह दुनिया के सबसे
सुरीले संगीत जैसी लगती है. लगता है कि यही लगभग मानव का मूल स्वभाव है.

बेशक आज दुनिया में हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि जल्दी ही बड़ी जंग हो
जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी. खैर, अभी जंग हो या न हो, लेकिन
हमारे न्यूज चैनल तो इस प्रकार की रिपोर्ट्स दिखा रहे हैं, जैसे कि जग बस
अब हुयी कि तब हुयी. रोजाना इन पर आप देखिये कि फलाने देश के पास फलाने
हथियार हैं तो ढिमाके देश के पास ढिमाके हथियार हैं. एक कोई देश ऐसा कर
देगा तो दूसरा देश तबाह हो जाएगा. कोई देश पूरी तरह धरती के नक़्शे से मिट
जाएगा. फलाना देश फलाने देश पर हमले की योजना को अंतिम रूप दे चुका है तो
फलां देश फलां देश पर बस कहर बन कर टूटने ही वाला है.

इस बात में कोई शक नहीं कि इस वक्त दुनिया में हालात अमन के तो नहीं हैं.
कोई किसीको विस्तारवादी बता रहा है, तो कोई किसीको चौधरी बनने का
ख्वाहिशमंद. दनादन एक के बाद एक ऐसे हथियार बन रहे हैं कि जिनसे होने
वाले विनाश का कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता. हमारे मीडिया वाले इन
हथियारों के बारे में जितना जानते हैं, वह वास्तविकता का दस फीसदी भी
नहीं है.

आज के हालात में अगर जंग छिड़ती है तो कोई भी देश तटस्थ नहीं रह पायेगा.
उसे जाने-अनजाने किसी न किसी के पक्ष में लड़ना ही पड़ेगा. दूसरे
विश्वयुद्ध में जापान के नागासाकी और हिरोशिमा में अमेरिका ने जो एटम बम
गिराए थे उनसे करीब 3 लाख लोग मरे थे. लेकिन आज जो बम और अन्य हथियार बन
चुके हैं, उनके बारे में एक सैन्य विशेषज्ञ के अनुसार उनके उपयोग के बाद
धरती पर एक भी आदमी तो आदमी कोई पशु-पक्षी और पेड़-पौधे तक नहीं बच
पाएँगे. बिल्कुल वैसी ही स्थिति पैदा हो जाएगी, जैसी श्रष्टि के निर्माण
के पहले बतायी जाती है.

विभिन्न देशों ने जो हथियार बनाए हैं, उनके उपयोग के लिए यह धरती बहुत
छोटी पड़ जाएगी. अब तो जंग तो अन्तरिक्ष में होगी, जिसका सीधा प्रभाव
पृथ्वी पर होगा. अन्तरिक्ष में ज्यादा से ज्यादा हक़ जमाने की होड़ कोई
वैसे ही थोड़ी लगी है.

आप देश का कोई भी न्यूज चैनल देख लीजिये, बस आपको संभावित जंग के बारे
में बहुत डराने वाली रिपोर्ट्स देखने को मिल जाएँगी. इन्हें देखकर लोगों
के मन में एक अजीब-सा खौफ तारी हो गया है. लोग भी इन रिपोर्ट्स को देखने
में बहुत दिलचस्पी दिखाते हैं, जिसके कारण चैनलों की टीआरपी बढती है. वे
ऎसी और रिपोर्ट्स दिखाने के लिए प्रोत्साहित होते हैं.

आप एक उदाहरण ले लीजिए कि भारत में पाँच राफेल लड़ाकू विमान आने के कितने
दिन पहले से चैनलों ने इनका गाना गाना शुरू कर दिया था. उसकी खूबियों के
बारे में ऐसे बता रहे थे कि ख़ुद राफेल बनाने वालों को भी इन्हें सुनकर ही
पता चली होंगी. ऐसा लगता है, बनाने वालों ने हमारे टीवी चैनलों को बनाने
से पहले ही सबकुछ बता दिया होता और बनने के बाद तो कोई भी बात गोपनीय
नहीं रखी होगी.

यह इस दृष्टि से कुछ हद तक सही ठहराया जा सकता है कि राफेल के प्रचार से
देशवासी देश की सुरक्षा के प्रति बहुत आश्वश्त हो गये. लेकिन यार हर बात
की हद होती है. यह इतना ज्यादा बताया गया कि कोफ़्त होने लगी. पाकिस्तान
को भी कहना पड़ा कि भारत पाँच नहीं पाँच सौ राफेल बुला ले तब भी हम लड़ने
के लिए तैयार है. हालाकि यह खिसियानी बिल्ली के खम्भा नोचने जैसी बात थी,
लेकिन बात तो बुरी थी.

तो मेरे देश के न्यूज चैनलों बरायमेहरबानी जंग की बात इतनी ज्यादा न
फैलाइए कि बिना जंग के ही लोग दहशत में मरने लगें.

-दिनेश मालवीय

अक्सर सोचता हूँ कि मानवता के इतिहास में क्या कभी ऐसा समय आएगा, जब जंग
नहीं होगी. पहले अनेक लोगों ने ऐसा विचार किया और इसके लिए प्रयास भी
किये, लेकिन जंग को कोई रोक नहीं सका. यह किसी न किसी रूप में कहीं न
कहीं चलती ही रही.

पहले जब कबीले थे तो उनके बीच, फिर गाँव बने तो उनके बीच, फिर शहर बने
तो उनके बीच, फिर राज्य बने तो उनके बीच और उसके बाद देश बने तो उनके बीच
जंग चलती चली आ रही है. अब देशों के खेमे बन गये हैं, तो जंग उनके बीच
होगी.

इसीलिए किसीने कहा है कि जिसे हम हम शांतिकाल कहते हैं, वह दरअसल अगली
जंग की तैयारी का समय होता है.  ऐसा लगता है कि मनुष्य का मूल स्वाभाव ही
जंग करने का रहा है. वह अगर कभी हथियारों से जंग नहीं कर रहा होता, तो
किसी और रूप में जंग कर रहा होता है. ऐसा भी लगता है कि दुनिया बनाने
वाले की योजना में जंग एक अभिन्न अंग है. वरना क्या कारण है कि लाख
कोशिशों के बाद भी जंग रोकी नहीं जा सकी हैं. नीत्जे ने कहा था कि उसे
फौजियों की परेड में उनके जूते से जो आवाज निकलती है, वह दुनिया के सबसे
सुरीले संगीत जैसी लगती है. लगता है कि यही लगभग मानव का मूल स्वभाव है.

बेशक आज दुनिया में हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि जल्दी ही बड़ी जंग हो
जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी. खैर, अभी जंग हो या न हो, लेकिन
हमारे न्यूज चैनल तो इस प्रकार की रिपोर्ट्स दिखा रहे हैं, जैसे कि जग बस
अब हुयी कि तब हुयी. रोजाना इन पर आप देखिये कि फलाने देश के पास फलाने
हथियार हैं तो ढिमाके देश के पास ढिमाके हथियार हैं. एक कोई देश ऐसा कर
देगा तो दूसरा देश तबाह हो जाएगा. कोई देश पूरी तरह धरती के नक़्शे से मिट
जाएगा. फलाना देश फलाने देश पर हमले की योजना को अंतिम रूप दे चुका है तो
फलां देश फलां देश पर बस कहर बन कर टूटने ही वाला है.

इस बात में कोई शक नहीं कि इस वक्त दुनिया में हालात अमन के तो नहीं हैं.
कोई किसीको विस्तारवादी बता रहा है, तो कोई किसीको चौधरी बनने का
ख्वाहिशमंद. दनादन एक के बाद एक ऐसे हथियार बन रहे हैं कि जिनसे होने
वाले विनाश का कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता. हमारे मीडिया वाले इन
हथियारों के बारे में जितना जानते हैं, वह वास्तविकता का दस फीसदी भी
नहीं है.

आज के हालात में अगर जंग छिड़ती है तो कोई भी देश तटस्थ नहीं रह पायेगा.
उसे जाने-अनजाने किसी न किसी के पक्ष में लड़ना ही पड़ेगा. दूसरे
विश्वयुद्ध में जापान के नागासाकी और हिरोशिमा में अमेरिका ने जो एटम बम
गिराए थे उनसे करीब 3 लाख लोग मरे थे. लेकिन आज जो बम और अन्य हथियार बन
चुके हैं, उनके बारे में एक सैन्य विशेषज्ञ के अनुसार उनके उपयोग के बाद
धरती पर एक भी आदमी तो आदमी कोई पशु-पक्षी और पेड़-पौधे तक नहीं बच
पाएँगे. बिल्कुल वैसी ही स्थिति पैदा हो जाएगी, जैसी श्रष्टि के निर्माण
के पहले बतायी जाती है.

विभिन्न देशों ने जो हथियार बनाए हैं, उनके उपयोग के लिए यह धरती बहुत
छोटी पड़ जाएगी. अब तो जंग तो अन्तरिक्ष में होगी, जिसका सीधा प्रभाव
पृथ्वी पर होगा. अन्तरिक्ष में ज्यादा से ज्यादा हक़ जमाने की होड़ कोई
वैसे ही थोड़ी लगी है.

आप देश का कोई भी न्यूज चैनल देख लीजिये, बस आपको संभावित जंग के बारे
में बहुत डराने वाली रिपोर्ट्स देखने को मिल जाएँगी. इन्हें देखकर लोगों
के मन में एक अजीब-सा खौफ तारी हो गया है. लोग भी इन रिपोर्ट्स को देखने
में बहुत दिलचस्पी दिखाते हैं, जिसके कारण चैनलों की टीआरपी बढती है. वे
ऎसी और रिपोर्ट्स दिखाने के लिए प्रोत्साहित होते हैं.

आप एक उदाहरण ले लीजिए कि भारत में पाँच राफेल लड़ाकू विमान आने के कितने
दिन पहले से चैनलों ने इनका गाना गाना शुरू कर दिया था. उसकी खूबियों के
बारे में ऐसे बता रहे थे कि ख़ुद राफेल बनाने वालों को भी इन्हें सुनकर ही
पता चली होंगी. ऐसा लगता है, बनाने वालों ने हमारे टीवी चैनलों को बनाने
से पहले ही सबकुछ बता दिया होता और बनने के बाद तो कोई भी बात गोपनीय
नहीं रखी होगी.

यह इस दृष्टि से कुछ हद तक सही ठहराया जा सकता है कि राफेल के प्रचार से
देशवासी देश की सुरक्षा के प्रति बहुत आश्वश्त हो गये. लेकिन यार हर बात
की हद होती है. यह इतना ज्यादा बताया गया कि कोफ़्त होने लगी. पाकिस्तान
को भी कहना पड़ा कि भारत पाँच नहीं पाँच सौ राफेल बुला ले तब भी हम लड़ने
के लिए तैयार है. हालाकि यह खिसियानी बिल्ली के खम्भा नोचने जैसी बात थी,
लेकिन बात तो बुरी थी.

तो मेरे देश के न्यूज चैनलों बरायमेहरबानी जंग की बात इतनी ज्यादा न
फैलाइए कि बिना जंग के ही लोग दहशत में मरने लगें.

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