निर्मल ह्रदय बलदाऊ- श्रीकृष्णार्पणमस्तु -23

निर्मल ह्रदय बलदाऊ 
                          श्रीकृष्णार्पणमस्तु -23

रमेश तिवारी 

बलराम बहुत ही इमोशनल व्यक्ति थे। भोले, सच्चे और स्पष्ट वक्ता थे। किंतु जिद्दी भी इतने कि एक बार ठान लें कि फलां व्यक्ति से बात नहीं करना, तो नही ही करना।

आधिकारिक तौर पर तो दाऊ युवराज थे परन्तु ऐसा बहुत कम हुआ होगा कि उन्होंने कभी अपने अधिकार का उपयोग किया हो। कृष्ण पर दाऊ के प्रेम की महिमा अपरम्पार थी।

यादवों की सुधर्मा सभा में जितनी भी गतिविधियां, होतीं उनमें प्रमुख भूमिका, श्रीकृष्ण की ही रहती। राजा उग्रसेन और बलराम सर्वथा कृष्ण के ही बुद्धि, चातुर्य और दिशा, निर्देशों का पालन करते थे। तात्पर्य यह कि कृष्ण बिना मुकुट के राजा थे।

अक्रूर जी, यादवों के प्रमुख नेता, मंत्री और अत्यंत सम्माननीय व्यक्ति थे। दाऊ और कृष्ण एक रक्त थे जबकि काका रक्त संबंधी। रुक्मणी ने जब कहा कि बड़े भैया के बिना अच्छा नहीं लगता। उन्हें वापस लेकर आइयेगा।

 श्रीकृष्णार्पणमस्तु
तब कृष्ण ने कहा ! हहह! मैं जानता था कि तुम यही कहोगी। मैं पहले ही भैया और काका को वापस बुलाने के लिये अमात्य विपृथु और काका देववृत के तीनों पुत्र, भाइयों, बुद्धि श्रेष्ठ उद्धव और बल श्रेष्ठ चित्रकेतु और बृहदबल को भेज चुका हूं।

यहां पाठकों को जान लेना चाहिए कि बलराम और कृष्ण के बीच दूरी बने हुए बहुत समय बीत चुका था। काशी से बिना बलराम को, जो नाराज हो कर मिथिला चले गए थे, साथ लिये अकेले लौटे कृष्ण इस बीच अनेक पराक्रम कर चुके थे।

वे द्वारिका से नरकासुर को दंडित करने जब आसाम को निकले, तो मार्ग में अवंती में उन्होंने एक विवाह और कर लिया। कृष्ण के इस क्षत्रियोचित निर्णय के पीछे बडी़ रोचक कथा है। अवंती में उनकी भुआ राजाधिदेवी और फूफा जयसेन की पुत्री मित्रवृंदा का स्वयंवर चल रहा था।

मित्रवृंदा के भाई विंद और अनुविंद जो अंकपाद आश्रम में कृष्ण के सहपाठी थे, कृष्ण से नाराज रहते थे। वे दोनों भाई जरासंध के प्रभाव में थे। विंद, अनुविंद को लगा कि कृष्ण स्वयंवर में भाग लेने आये हैं। उन्होंने कृष्ण को संदेश भेजा कि ग्वाला स्वयंवर में भाग नहीं ले सकता।

कृष्ण ने कहलवाया कि वे तो यहां से मात्र निकल रहे हैं। अपनी भुआ और फूफा के सम्मान में उपहार भेंट करना चाहते हैं। तब स्वाभाविक रुप से राजकुमारों को उनकी अगवानी करने नगरद्वार पर आना पडा़। कृष्ण ने अवसर देखा और मित्रवृन्दा का अपहरण कर उसको द्वारिका भिजवा दिया।

कृष्ण आसाम में नरकासुर का वध करके अमरनाथ यात्रा पर जाने वाले थे। इसी बीच कोसल देश की राजकुमारी सत्या का स्वयंवर था। वहां के राजा नग्नजित ने (कोसल की राजधानी तब श्रावस्ती थी) कृष्ण को चुनौती स्वरुप निमंत्रण भेजा। चुनौतियों को सहज स्वीकार करने वाले कृ्ष्ण ने तत्काल श्रावस्ती के लिये प्रस्थान कर दिया और फिर सत्या को जीता और उसको भी द्वारिका भेज दिया।

यहां यह भी जान लें कि श्रावस्ती, जनकपुर के समीप ही थी,जहां कि नाराज बड़े भैया वहां ठहरे तो थे किंतु श्रावस्ती में पहुंचे नहीं थे। अब तक कृष्ण की 5 रानियां हो चुकी थीं। कृष्ण ने अमरनाथ यात्रा की, फिर वे कश्मीर, पंजाब (पांचाल) और अर्बुद (राजस्थान) होते हुए द्वारिका लौट आये थे।

द्वारिका से बलराम को लौटा लाने के लिये वरिष्ठ अमात्य विपृथु को जनकपुर तथा अक्रूर को संदेश भेजकर लौटाने के लिये उद्धव, चित्रकेतु और बृहदबल जा ही चुके थे। देखना यह है कि इसमें कौनसी कूटनीति छिपी थी। रुक्मणी को कृष्ण ने जो बताया- रुक्मणी बडे भैया को मैंने विपृथु के हाथ एक सीसम पेटिका भेजी है। उसमें मेरे किरीट में लगने वाला मोरपंख है।

यह वही मोरपंख है जो वृन्दावन में वनलता के मुकुट मेँ सबसे पहले राधा ने मेरे माथे पर पहनाया था। बड़े भैया ने भी उस मुकुट को अंकपाद में मेरे माथे पर सजाया था। हां, भैया को मैने यह भी कहलवाया है कि जब से वह मुझसे नाराज होकर गये हैं, मैंने मुकुट में यह मोरपंख लगाया ही नहीं है। और तब तक लगाऊंगा भी नहीं जब तक भैया स्वयं अपने हाथ से मेरे माथे पर नहीं लगायेंगे।

रुक्मणी देखना - अब तो भैया रुक ही नहीं सकते। अवश्य ही लौट आयेंगे। वे मुझसे बहुत स्नेह करते हैं। तुम देखना, भैया अवश्य ही लौट आयेंगे। हां, मैं यदि उद्वव को भेजता तो कनिष्ठ के नाते वे उद्धव को ही डांट कर कर भगा देते। और हां, मैने नीति, न्यायप्रिय और संत पृवृत्ति उद्वव को प्रयाग से काका को लौटा लाने के इसीलिए भेजा है कि वह निपुण है। सिद्धहस्त है। किंतु भोला भी है।

सो मैने इसीलिए उसके दोनोँ महारथी भाइयों को साथ में भेजा है ताकि वे किसी भी स्थिति का सामना करके उद्धव की सुरक्षा कर सकते हैं महाराज्ञी रुक्मणी,जानती हो मैने काका को क्या कहलवा है- काका आप द्वारिका पधारें। अंत तक यही रहें। बस एक बार सुधर्मा सभा में वह स्यमन्तक मणि सभी को दिखा भर दें।

फिर चाहें तो आप काशी में ही क्यों न रहने चले जायें। और हां, कृष्ण थोडे़ गंभीर हुए। उद्धव को कह दिया है कि अक्रूर से कह दे कि द्वारिकाधीश को पुन:काशी न आना पडे़ ! समझ गयीं! रुक्मणी। मित्रो अधर्म का नाश करने के लिए अपने सगे मामा कंस को सभा में घसीट कर उसका शिरच्छेद करने वाले कृष्ण का वह रौद्ररुप अक्रूर ने अपनी खुली आंखों से देखा ही था।

अत:कृष्ण का यह संदेश कि 'मुझको काशी न लौटना पड़े' पर्याप्त चेतावनी थी। बड़े भैया को मयूर पंख भेजकर गोकुल, वृन्दावन तथा अंकपाद की मधुर स्मृतियों से सम्मोहित करना (इमोशनल ब्लैकमेलिंग, अथवा भैया की भावनाओं का मधुर दोहन) जितना कारगर कदम था उतना ही कारगर कदम अक्रूर को चेतावनी कि-घी अगर टेढी़ उंगली से ही निकला तो कृष्ण कोई कठोर कदम भी उठा सकता है!

कूटनीति के महान नायक श्रीकृष्ण के यह दोनों अस्त्र कारगर साबित हुए। सुधर्मा सभा में पहुंचे बड़े भैया और अक्रूर का सम्मान हुआ। बड़े ने छोटे के किरीट में मोरपंख लगाया । कृष्ण भावुक हो गये। सभा के भी अश्रु छलक पड़े। कृष्ण की आंखें भीग गयी।

युवराज का रिक्त आसन पुन:सुशोभित हो गया। अक्रूर ने साधारण पंक्ति में खड़े होकर स्यमन्तक मणि सभा को दिखाई। यद्यपि कृष्ण ने उनको सम्मान सहित उनका मंत्री पद बहाल करते हुए उन्हें उनके आसन पर पुन:सुशोभित तो कर दिया।

परन्तु चेतावनी भी दी- भविष्य में ऐसा हुआ तो क्षमा नहीं किया जायेगा। यह चेतावनी ह्रदीक और उसके पुत्र कृतवर्मा भी सुन रहे थे। शतधन्वा मारा ही जा चुका था। मणि चोरी की घटना ने यादवों में हलचल मचा दी थी।

कृष्ण ने वह मणि हालांकि अक्रूर को ही यह कहते हुए साँप दी कि आप काशी की तरह इससे उत्पन्न स्वर्ण को गरीबों में ही बांटते रहिये। और काकाश्री, काशी में मिली आपकी 'दानपति' की उपाधि भी यथावत रहेगी।

यह कारुणिक दृश्य देखकर अपने पति महान व्यक्तित्व कृष्ण के प्रति कृतज्ञ सत्यभामा का पल्लू भी अपने, भीगे सुंदर नेत्रों को पोंछते हुए दृष्टिगोचर हुआ। स्यमन्तक मणि चोरी का अंत कृष्ण की बडी़ उपलब्धि थी। किसी बात की तह में जाकर परिणाम प्राप्त करने तक संघर्ष करना कृष्ण की नियति थी। नीति थी।

आज की कथा बस यहीं तक। तो मिलते हैं। तब तक विदा।

                                          धन्यवाद।

                                                  

Priyam Mishra



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