प्रामाणिकता(Credibility) से ही कोई सच्चा सम्मान मिलता है….नहीं तो पतन निश्चित

यदि आपको अपनी फ़ील्ड में सच्चा सम्मान पाना है तो अपनी क्रेडिबिलिटी को बढ़ाइए वह प्रामाणिकता ही है जो आपको जीवन के हर क्षेत्र में आदर दिलाती है |

 

कोई किसी भी फील्ड में हो, उसमें यदि प्रमाणिकता नहीं है तो वह कभी सच्चा सम्मान नहीं पा सकता | कुछ समय के लिए वह भले ही अपनी वाहवाही लूट ले या लोगों को गुमराह करके कुछ इज़्ज़त हासिल कर ले, लेकिन यह बहुत देर तक नहीं चलता. इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण हमें रामचरित मानस कि एक चौपाई से मिलता है-

सब नृप भय जोग उपहासी

जैसे बिनु बिरागु सन्यासी।

अर्थात, सब राजा उपहास के योग्य हो गये, जैसा बिना वैराग्य का सन्यासी.

यह चौपाई बालकाण्ड के प्रसंग में आती है. बड़े-बड़े राजा शिव-धनुष उठाने में विफल हो जाते हैं. वे उसी प्रकार हँसी के पात्र बन जाते हैं, जिस प्रकार बिना वैराग्य का सन्यासी. अयोध्या काण्ड में भी गोस्वामीजी ने भरत से कहलवाया है कि “”सोचिअ जती प्रपंचरत, विगत विवेक बिराग”। अर्थात वह सन्यासी या यती शोचनीय है, जो प्रपंच में रत है और विवेक, वैराग्य से रहित है। एक संत वैराग्यहीन सन्यासी को भांड कहते हैं” मूड मुडयो बादि ही भांड भयो तजि गेह।

Image result for धनुष यज्ञ"सच पूछिए तो यह बात सिर्फ सन्यासी के बारे में नहीं है। यह हर किसी के लिए सच है,यहाँ बल प्रामाणिकता पर है। इसका मतलब है बाहर और भीतर से एक होना. चाहे सन्यासी हो, कवि हो, लेखक हो, विद्वान हो या राजनेता, यह बात सभी पर लागू होती है. जब तक वह प्रामाणिक नहीं होगा, वह हँसी का पात्र ही बनेगा. इसे कथनी-करनी की एकता और विश्वसनीयता के अर्थ में भी लिया जा सकता है।

आमतौर पर देखा यह जाता है, कि हम सोचते कुछ हैं, कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं. वह होने का दावा करते हैं, जो हम नहीं हैं. हमारे कितने ही चेहरे हैं, जब जैसी सुविधा होती है, उसी के अनुरूप चेहरा लगा लेते हैं. हमारी कथनी और करनी में साम्य नहीं है. इसी से विश्वसनीयता और आस्था का संकट खड़ा हुआ है, जो आज समाज का सबसे बड़ा संकट है. किसी की किसी पर आस्था नहीं रह गई है और कोई किसी पर विश्वास नहीं करता. यहाँ तक कि पिता-पुत्र, बहन-भाई, पति-पत्नी के बीच भी विशवास में भारी कमी आई है. यह हमारे व्यक्तित्व और चरित्र में प्रामाणिकता की कमी से ही हुआ है.

हालाकि, यह अपेक्षा करना भी भोलापन है कि समाज में सभी लोग प्रामाणिक हो जाएँ. यह तो कभी, किसी भी युग में नहीं हो पाया है. आम आदमी से विचारशील लोगों ने कभी यह अपेक्षा भी नहीं की. लेकिन सन्यासी, कवि, लेखक, विद्वान, राजनेता और अन्य गुणीजन से प्रामाणिक होने की अपेक्षा की जाती है, क्योंकि उनके ऊपर समाज को दिशा देने की बड़ी जिम्मेदारी होती है. वे समाज में श्रेष्ठ माने जाते हैं और उनके कहे और किये का अनुकरण दूसरे करते हैं. जब ये लोग अप्रामाणिक हो जाते हैं तब पूरा समाज दिशाहीन हो जाता है. ये लोग जब किसी लाभ, लोभ या प्रमाद के वशीभूत होकर वह नहीं कहते, लिखते, करते हैं, जिसे वे सत्य मानते हैं, तो समाज का बड़ा अहित होता है. दुर्भाग्य से आज हमारे समाज में ये लोग सर्वाधिक अप्रामाणिक हो गये हैं। इसी कारण आज समाज में वे उपहास के पात्र बन कर रह गये हैं। यदि यही स्थिति जारी रही तो वे सार्वजनिक अपमान और यहां तक कि घृणा के पात्र भी बन जाएँगे.

हमारा बोलना, रहना, करना, सभी कुछ प्रामाणिक होना चाहिये. पूरी तरह प्रामाणिक होने में व्यवहार-जगत में कठिनाइयां हैं, इसीलिए कुछ शिथिलता भी स्वीकार्य है, लेकिन जहाँ तक हो सके प्रामाणिक होने के लिए सब को प्रयास करना चाहिए. एक बार व्यक्ति की प्रामाणिकता सिद्ध हो जाने पर, उसके विषय में कोई कितनी ही झूठी बातें बताये या उसकी छवि धूमिल करने का प्रयास करे, उसे सफलता नहीं मिलती.

भरत का चरित्र प्रामाणिकता कि सबसे अच्छी मिसाल है. चित्रकूट में भरत श्रीराम को मनाने जाते हैं. रास्ते में निषाद को उनकी नीयत पर शक होता है। वह यह समझता है कि भरत सेना लेकर श्रीराम और लक्ष्मण को मारने जा रहे हैं. लेकिन भरत से मिलकर उनका यह संदेह दूर हो जाता है. यह भरत के चरित्र की प्रामाणिकता ही है, कि मिलते ही निषाद का संदेह दूर हो गया. इसी प्रकार का संदेह लक्ष्मण के मन में भी हुआ कि भरत को राजमद हो गया है और वह सेना के साथ श्रीराम को समाप्त करने आ रहे हैं. परन्तु श्रीराम, भरत की प्रामाणिकता और सच्चाई को समझते थे. वह कहते हैं कि “ब्रम्हा, विष्णु और महादेव का पद पाकर भी भरत को राजमद नहीं हो सकता. अंधकार चाहे दोपहर के सूर्य को निगल जाए, आकाश चाहे बादलों में समाकर मिट जाए, गौ के खुर जितने पानी में चाहे अगस्त्यजी डूब जाएँ  और चाहे पृथ्वी अपने स्वाभाविक धर्म सहनशीलता को छोड़ दे, लेकिन भरत को राजमद नहीं हो सकता.” कितना भरोसा है श्रीराम को भरत पर. यह भरत की प्रामाणिकता के ही कारण है.

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ऐसी ही प्रामाणिकता आज हमारे समाज के नायकों को चाहिए. थोड़ी-सी भी प्रामाणिकता से क्रांति हो सकती है. इसके चमत्कारिक परिणाम आ सकते हैं. महात्मा गांधी का जीवन हमारे सामने प्रत्यक्ष उदाहरण है. अपने चरित्र में प्रामाणिकता लाकर ही वह सम्पूर्ण भारत के “बापू” हो गये। उन्होंने सारा जीवन अपने को प्रामाणिक बनाने में लगा दिया. उनका प्रयास यही रहा कि वह ऐसा उपदेश न करें, जिस पर वह खुद अमल न कर सकें, और वह कर सकें, जिसका वह उपदेश दे रहे हैं. वह कबीर की इस बात को मानते थे कि “कथनी मीठी खॉड सी करनी विष की लोय. कथनी तपि करनी करे, विषते अमरत होय.” उनकी इसी प्रामाणिकता के प्रभाव से उनके समय के कवियों, लेखकों, विद्वानों और राजनेताओं के जीवन में भी काफी प्रामाणिकता आ सकी. इससे उनमें इतनी शक्ति और सत्य-संकल्प का उदय हुआ कि सारा भारत उनके साथ खड़ा हो गया. उन्होंने आत्मशक्ति के बल पर ऐसा संघर्ष किया कि भारत से उस महाबली साम्राज्य के पैर उखड़ गये, जिसके राज्य में सूर्य नहीं डूबता था.

यही भाव ग्रहण करके हम सभी को जीवन में यथा संभव प्रामाणिक होने का प्रयास करना चाहिए. हम वहीं करें, जो हम कर रहे हैं और वही कहें, जो हम कर सकते हैं. इससे न केवल हमारा जीवन ऊपर उठेगा, बल्कि पूरे समाज को इसका लाभ मिलेगा। ऐसा न होने पर हम उसी तरह उपहास के पात्र बनते चले जाएँगे, जिस प्रकार बिना वैराग्य का सन्यासी।


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