इन मंदिरों में गैर-हिन्दुओं को प्रवेश नहीं,जानिये क्यों? -दिनेश मालवीय

इन मंदिरों में गैर-हिन्दुओं को प्रवेश नहीं, जानिये क्यों?

-दिनेश मालवीय

हिन्दुओं के ऐसे नौ प्रसिद्ध मंदिर हैं, जिनमें केवल हिन्दुओं को ही प्रवेश की अनुमति है. उड़ीसा के विश्वप्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक को प्रवेश नहीं दिया गया. कारण यह बताया गया कि पारसी फ़िरोज़ गाँधी से शादी करने के बाद वह पारसी हो गयी हैं. इंदिरा गांधी को ही क्यों, जगन्नाथ मंदिर में स्विटज़रलैंड के एक ऐसे ईसाई को भी प्रवेश नहीं दिया गया, जिसने मंदिर को एक करोड़ रूपये से अधिक का दान दिया था. इसके अलावा, थाईलैंड की महारानी को भी प्रवेश नहीं दिया गया था, जो बौद्ध थीं.
जगन्नाथ मंदिर
इसके अलावा चेन्नई के कपालेश्वर मंदिर, गुजरात के सोमनाथ मंदिर, केरल के गरवायुर और पद्मनाभ स्वामी मंदिर, भुवनेश्वर के लिंगराज मंदिर, काठमाण्डू के पशुपतिनाथ मंदिर, तमिलनाडु के कामाक्षी मंदिर और काशी के विश्वनाथ मंदिर में भी गैर-हिन्दुओं को अन्दर नहीं जाने दिया जाता.

आजकल के लोगों को यह बात बड़ी अनुचित लग सकती है. कथित बुद्धिजीवी इसे दूसरे धर्मों के लोगों के साथ भेदभाव होना बताते हैं. वे इसे हिन्दुओं की संकीर्णता मानकर इसकी आलोचना करते हैं. लेकिन यदि वह इसके पीछे का वास्तविक कारण जानते होते तो शायद ऐसा नहीं करते. यदि कारण जानने के बाद भी ऐसा करते तो वह उनके एजेण्डा के तहत होता.

दरअसल हिन्दुओं के हरएक मंदिर के निर्माण के पीछे कोई अवधारणा होती है. वहाँ पूजा-पाठ, उपासना के साथ ही अन्य अनुष्ठानो की निर्धारित व्यवस्था होती है. इनका पालन न करने वाले के लिए इन मंदिरों में जाने का कोई औचित्य नहीं है. वे वहाँ जो अनुष्ठान आदि होते हैं, उन्हें समझेंगे तो बिल्कुल नहीं. इसके विपरीत उनकी तुलना अपने धर्म के अनुष्ठानों के साथ करेंगे. इससे मेल न खाने पर वे बाहर आकर इसकी आलोचना भी कर सकते हैं. ये मंदिर कोई कोतूहल या पर्यटन स्थल तो हैं नहीं, जो कोई भी जाकर उन्हें निहारता रहे. ये हिन्दुओं के लिए परम पवित्र स्थान हैं और उन्हें इनकी पवित्रता बनाए रखने के लिए ही यह व्यवस्था की गयी है. उन्हें ही क्यों, हर धर्म को अपने धर्म और तीर्थस्थलों की पवित्रता कायम रखने का अधिकार है. वे लोग ऐसा करते भी हैं.

हम एक उदाहरण से इसे समझने की कोशिश करें. अनेक ऐसे कारखाने और उद्योग होते हैं, जहाँ कुछ ख़ास लोगों को ही प्रवेश मिलता है. ये लोग इसके लिए प्रशिक्षित होते हैं. कोई अप्रशिक्षित व्यक्ति उसमे चला जाए तो वहाँ उसे नुकसान हो सकता है. इसे उन लोगों के शाथ भेदभाव तो नहीं कहा जा सकता.

इसके अलावा एक ऐतिहासिक कारण भी है. इतिहास गवाह है कि भारत में मध्यकाल के दौरान बड़ी संख्या में दूसरे धर्म के लोगों द्वारा हिन्दू मंदिरों को बहुत नुकसान पहुँचाया गया, उन्हें लूटा और तोड़ा तक गया. इन मंदिरों में इतनी संपत्ति थी कि इन्हें लूटकर सुल्तानों और बादशाहों ने अपने खजानों को मालामाल किया. तमिलनाडु के रंगनाथ मंदिर को अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मालिक काफूर को कितनी बुरी तरह लूटा. सोमनाथ मंदिर का महमूद गजनबी ने किस तरह विध्वंस किया और लूटपाट-हत्याएं की, यह इतिहास के पन्नों में दर्ज है. भारत के हर कोने में इस तरह की घटनाएँ हुयीं. इसे देखते हुए भी इस तरह के प्रतिबन्ध लगाए गये. हालाकि कालान्तर में अन्य धर्मों के लोगों को प्रवेश न देना या केवल परम्परा बनकर रह गयी, लेकिन, लेकिन जब इस शुरू किया गया था, तब यह कारण भी बहुत अहम था.

सुरक्षा की दृष्टि से आज भी धर्म-स्थानों पर अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है, जिसके कारण बहुत स्पष्ट हैं. लेकिन मुख्य कारण यही रहा कि दूसरे धर्मों के लोग इन मन्दिरों की व्यवस्था और इसके अनुष्ठानो ने परिचित नहीं होते. वे मंदिर में जाकर करेंगे भी क्या? मंदिर कोई पर्यटन या स्थल तो हैं नहीं. इनका मकसद आध्यात्मिक साधना है. दूसरे धर्मों की साधना-पद्धतियाँ अलग हैं और वे मंदिरों की व्यवस्था और इसके पीछे के कारणों को नहीं समझते. इसलिए इन मन्दिरों में गैर-हिन्दुओं के प्रवेश की मनाही है.


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