कृतज्ञता से भरे नेत्र-जल से कीजिए पूर्वजों का तर्पण, जीवित बुजुर्गों की सेवा के संकल्प का भी अवसर -दिनेश मालवीय

कृतज्ञता से भरे नेत्र-जल से कीजिए पूर्वजों का तर्पण ,जीवित बुजुर्गों की सेवा के संकल्प का भी अवसर

-दिनेश मालवीय

सनातन धर्म में आज से पितृपक्ष का श्रीगणेश हो गया है. आने वाले पंद्रह दिन हमें अपने उन पूर्वजों का स्मरण कर, उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने का अवसर देते हैं, जिनके हम अंश हैं. इन दिनों में हम अपने ज्ञात-अज्ञात सभी पूर्वजों का जल से तर्पण करते हैं. यह तर्पण अपने सही अर्थों में तभी सार्थक होगा है, जब पूर्वजों को याद करते-करते हमारे नेत्रों में उनके प्रति कृतज्ञता का जल भर आये.


अनेक पीढ़ियों से हमारे पूर्वज पितृपक्ष में सम्बंधित पूर्वज की मृत्यु की तिथि पर श्राद्ध कर्म करते हैं. कहीं-कहीं इनके विधि-विधान में कुछ भिन्नता हो सकती है, लेकिन उद्देश्य एक ही है कि हम अपने पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिए उनका तर्पण करें. हमारे पुराणों और धर्म-शास्त्रों में पितृपक्ष में पूर्वजों के तर्पण का महत्त्व बहुत तरह से बताया गया है. कहा गया है कि ऐसा करने से हमारी आयु, बुद्धि, धन, विद्या और सुखों में वृद्धि होती है और हमें स्वर्ग या मोक्ष प्राप्त होता है. हमारे हाथों से जल ग्रहण और तर्पण ग्रहण कर पूर्वजों की आत्मा को शान्ति मिलती है और वे हमें भरपूर आशीर्वाद देते हैं, जिससे हम और हमारा परिवार संकटों से सुरक्षित रहता है.

शास्त्रों में कही इन बातों का अपना महत्त्व है, लेकिन यह हमारे लिए अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का अवसर है. यह हमें अपने जीवित माता-पिता और अन्य बुजुर्गों की सेवा करने और उन्हें सिर आँखों पर बैठा कर रखने के लिए संकल्पित होने का अवसर भी देता है.

कई वर्षों से देखने में आ रहा है कि देश में कुछ लोगों द्वारा एजेण्डा चलाया जा रहा है कि सनातन धर्म की हर बात को अन्धविश्वास कहकर खारिज कर दिया जाए और हमारी आने वाली पीढ़ियों के मन में भी यह बैठा दिया जाए कि यह सब निरर्थक है.

एक बार मैं बस में यात्रा कर रहा था. एक स्टॉप पर मेरे पास एक युवक आकर बैठ गया, जो स्कूल में मेरा सहपाठी था. उस समय पितृपक्ष चल रहा था. बातों-बातों में यह विषय भी निकल आया. वह बोला कि आप पढ़े-लिखे होकर भी इस अंधविश्वास को मानते हैं कि आपके द्वारा अर्पित जल और अन्य वस्तुएँ आपके पूर्वजों की आत्मा ग्रहण कर आपको आशीर्वाद देती हैं. मैंने कहा कि जी हाँ इस बात पर मुझे पूरा विश्वास है. उसने कहा कि इस विश्वास का आधार क्या है? मैंने कहा कि हजारों वर्षों से हमारी जो परम्परा है और जो हमारे पूर्वज शास्त्रों में लिख गयेहैं, वही इसका आधार है.

वह बोला कि मुझे तो इस पर बिल्कुल विश्वास नहीं है. यह सिर्फ पंडितों द्वारा खाने-पीने के लिए ढकोसला खड़ा किया गया है. मैं तत्काल समझ गया कि मेरा मित्र किस विचारधारा की चपेट में आ गया है. मैंने उसे आगे और बोलने दिया. उसने कहा कि मेरे पिता की मौत पर मैंने अपने बाल अर्पित नहीं किये. कोई तीसरा, दसवां या तेरहवीं वगेरह नहीं की. कारण पूछने पर उसने बताया कि  इन सब बातों पर मुझे विश्वास नहीं है.

मैंने कहा कि मित्र सिर्फ इतना बताओ कि यदि वर्ष में एक बार आप अपने उन पूर्वजों का स्मरण करते हुए उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं, जिनके आप अंश हैं, तो इसमें क्या बुरा या गलत है? रही पंडितों की बात तो आप उनके प्रति अनावश्यक दुराग्रह पाले हुए हैं. प्राचीन काल में जब ये विधि-विधान निर्धारित किये गये थे, तब ब्राह्मण या पंडित समाज का ऐसा व्यक्ति होता था, जो बहुत पवित्र आचरण वाला, अध्ययन-अध्यापन करने वाला और समाज को दिशा दिखने वाला मार्गदर्शक होता था. पूर्वजों की श्राद्ध के दिन ऐसे व्यक्ति को घर बुलाकर भोजन कराने और कुछ दान दक्षिणा देने का विधान निर्धारित किया गया था. आज भी ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है. समाज से ऐसे लोग विलुप्त नहीं हो गये हैं. फिर भी, आपको यदि ब्राह्मणों से परहेज हो तो आप किसी अन्य अच्छे व्यक्ति या जरूरतमंद या भिक्षुक को भोजन कराकर उसे दान-दक्षिणा दे सकते हैं.

इसी तरह पिता की मृत्यु पर सिर न मुंडवाने की बात पर मैंने पूछा कि यदि आप सिर मुंडवा देते तो आपका क्या बिगड़ जाता? क्या जिस पिता ने आपको जन्म दिया, पाला-पोसा, बड़ा किया, आपको इस योग्य बनाया कि आप शिक्षित होने का दावा कर रहे हैं, उसकी मृत्यु पर आप यह छोटा-सा विधान पूरा नहीं कर सकते? वह बोले के मुझे इस बात पर विश्वास ही नहीं है. इसके बाद उनसे बात करना मुझे निरर्थक लगा.

कुछ देर बाद मेरे मित्र का गंतव्य आ गया और वह बस से उतर गये. मैं सोच में पड़ गया कि समाज में यह सब हो क्या रहा है. ऐसे लोगों के सामने सिर्फ एक ही एजेण्डा है कि सनातन धर्म के अनुष्ठानों और विधि-विधानों को अन्धविश्वास कहकर खारिज कर दिया जाए. इस धर्म के मानने वालों की अगली पीढ़ी को अपनी जड़ों से बिल्कुल काट दिया जाए. यह काम बहुत लम्बे समय से चल रहा है और ये लोग इसमें कुछ सफल भी रहे हैं. लेकिन सनातनी संस्कार इतने कमजोर नहीं हैं कि, इन्हें कोई भी समाप्त कर दे.

अनेक लोग इस पखवाड़े के दौरान बहुत से कठिन नियम अपनाते हैं और उनका पूरा पालन करते हैं. मेरा अपने सभी सहधर्मियों से यही आग्रह है कि यदि आपको बाक़ी चीजों में विश्वास नहीं भी हो तब भी, पितृपक्ष में अपने पूर्वजों का तर्पण अवश्य करें. इसके लिए निर्धारित विधि-विधानों को देश-काल-परिस्थति के अनुसार यथासंभव पालन करें. और हाँ, ऐसा करते समय अपनी नयी पीढी के लोगों को भी पास में बैठा कर सिखाइए इसका महत्त्व बताइये. कहीं ऐसा न हो कि ये तथाकथित प्रगतिशीलता के चक्कर में ठूंठ के ठूंठ रह जाए. इस पवित्र अवसर पर आप अपने माता-पिता और बुजुर्गों कि पूरे मन से सेवा का संकल्प भी लें. समय के साथ-विधि-विधान कुछ बदल सकते हैं, लेकिन पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और आदर सदा यथावत रखें. तो, आइये अपने पूर्वजों के प्रति इस प्रकार कृतज्ञ हों कि हमारे नेत्रों में श्रद्धा का जल भर आये और हम जल के साथ ही इस नेत्र-जल से उनका पवित्र तर्पण करें.


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