आदर-सत्कार को मालवी लोकगाथा : सत्कार को अधिकारी कुण ? सम्मान का अधिकारी कौन?

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Hindi and Malvi Lokgatha

एक राजा अपने दरबार में आने वाले हर विद्वान का स्वागत करते और पुरस्कार देकर सम्मानित करते थे। एक दिन बड़ी दूर से चलकर दो विद्वान उनके दरबार में पहुँचे। उनमें से एक के वस्त्र उजले थे और दूसरे के मैले। राजा ने उनका स्वागत किया, और उजले वस्त्र वाले विद्वान को अपने सिंहासन के पास तथा मैले वस्त्र वाले विद्वान को उनके नजदीक आसन पर बैठाया।

सबसे पहले राजा ने उजले वस्त्र वाले विद्वान से चर्चा की। कुछ देर चर्चा के बाद जब वे जाने लगे, तो राजा ने अपने कोषाध्यक्ष से कहा कि इन्हें यथोचित पुरस्कार दे दिया जाये। लेकिन उनके जाते समय न तो राजा सिंहासन से उठे और न उन्हें द्वार तक पहुँचाने गये। फिर उन्होंने मैले वस्त्र वाले से चर्चा की। चर्चा में घण्टों बीत गये। जाते समय राजा ने उठकर उन्हें यथोचित पुरस्कार दिया और द्वार तक पहुँचाने भी गये उनके चले जाने पर राज-कर्मचारियों ने पूछा- 'महाराज !

क्या वजह है कि एक के जाने पर आप अपने आसन पर से उठे नहीं, जबकि दूसरे को पहुँचाने के लिए राजद्वार तक गये?' राजा ने कहा- 'जब मैंने उजले वस्त्र वाले विद्वान को देखा, तो सहज ही मेरे मन में उनके प्रति आदर जगा, लेकिन जब मैंने उससे चर्चा की, तो मुझे लगा कि वे तो अज्ञानता के भण्डार हैं। जैसे-जैसे हमारी चर्चा आगे बढ़ती गयी, मुझे उनके वस्त्र मैले से मैले लगते चले गये। जब वे जाने लगे तो मेरा मन उठने तक को नहीं हुआ।' 'लेकिन जब मैंने मैले वस्त्र वाले व्यक्ति से चर्चा की तो मुझे लगा कि वे ज्ञान से परिपूर्ण हैं। और जैसे-जैसे हमारी चर्चा आगे बढ़ती गयी, मुझे उनके वस्त्र उजले प्रतीत हुए। इसीलिए जब वे जाने लगे तो मैं पहुँचाने के लिए राजद्वार तक गया।' जिसका हम आते समय स्वागत करते हैं, वह उस व्यक्ति का नहीं उसके वस्त्रों का स्वागत होता है। लेकिन जिसका हम जाते समय स्वागत करते हैं, वह उसके वस्त्रों का नहीं गुण का सम्मान होता है।

आदर-सत्कार को अधिकारी कुण?

एक राजा अपणा दरबार मऽ आवण वाळा हरेक विद्वान खऽ इनाम दइन आदर सत्कार करतो थो। एक दिन बड़ी दूर से ही विद्वान राजा का दरबार मऊ गया। एक विद्वान का कपड़ा धौळाफक था पण दुसरा का कपड़ा मैळा-मैळा था। राजा न उनको स्वागत करयो। धौळा कपड़ा वाळा खऽ सिंघासण का पास ऽ आरू मैळा कपड़ा वाळा खऽ पास का आसन प बठाड्यो। राजा न पयलऽ उजळा कपड़ा वाळा सी थोड़ी सी देर बातचीत करी फिर खजान्ची सी इनाम देवाड़ी न वो खऽ बिदा कर्यो। विद्वान गयो तव राजा अपणा सिंधासण प बठयो रयो। फिर मैळा कपड़ा वाळा विद्वान सी बात न करी बात न मऽ असा बिलम्या कि कइ घंटा बीती गया। इना विद्वान खऽ राजा न ढेर सारो इनाम दियो आरू बाना तक संगात जाइ न बिदा कर्यो। खजान्ची न पूछ्यो- 'महाराज, धौला कपड़ा वाळा खऽ आप न असोज बिदा करीदियो, आप सिंघासण सी उठ्या तक नी। पण मैळा कपड़ा वाळा खऽ आप न ढेर सारो इनाम दियो न बान्ना तक संगीत जाइन बिदा कर्यो असो केऊँ?' राजा बोल्यो- 'उजळा कपड़ा देख्या तो म्हारा मन मैं आदर जाग्यो न सिंघासण का पास बठायो पण बातचीत में वो मूर्खानंद लग्यो। वो का उजळा कपड़ा मैळा-मैळा वाळा लग्या। इनाज् कारण सी वो खऽ चलचलाऊ बिदा करुते। पण जवेऽ मेळा कपड़ा वाळा सी बात न सुरू करी तो असो रस आयो कि वात नऽ खुटतीज नी थी।

वो सच्चो विद्वान थो। वो का मैळा कपड़ा न का भित्तर उजळो मन थो। वो सम्मान को सच्चो अधिकारी थो। ना जो कारण सी वो खऽ यात्रा तक संगीत जाइ न बिदा कर्यो। जे को हम आवती बखत स्वागत करांज् वो उना आदमी को नई वो का कपड़ा न को सम्मान होज् पण जे को जाती घड़ी सम्मान करांज् वो कपड़ा न का बजाय गुण न को सम्मान होज्।’


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