18 जून 1858 में रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों से लड़ते हुए प्राण त्याग दिए थे।

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रानी लक्ष्मी बाई बलिदान दिवस : स्‍वतंत्रता संग्राम में महती भूमिका निभाने वाली झांसी की रानी लक्ष्‍मी बाई का आज (18 जून) बलिदान दिवस है। 18 जून 1858 को ग्‍वालियर में अंग्रेजों से लोहा लेते हुए रानी वीरगति को प्राप्‍त हुई थीं। रामानंद सागर के लोकप्रिय धारावाहिक रामायण में भगवान राम का किरदार निभाने वाले एक्‍टर अरुण गोव‍िल ने झांसी की रानी लक्ष्‍मी बाई के बल‍िदान दिवस के अवसर पर उन्‍हें श्रद्धांजलि दी है। ट्व‍िटर पर उन्‍होंने सुभद्रा कुमारी चौहान की कव‍िता पोस्‍ट की है।
अरुण गोविल ने ल‍िखा- बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी। देश की आन बान और शान के लिए रणभूमि में अपने प्राण न्यौछावर करने ‌वाली वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के ‌बलिदान दिवस पर शत-शत नमन। सोशल मीडिया पर भी तमाम यूजर्स रानी लक्ष्‍मीबाई को याद कर श्रद्धांजलि दे रहे हैं।

गलवान घाटी में शहीद हुए जवानों को दी थी श्रद्धांजलि अरुण गोव‍िल ने गलवान घाटी भारत और चीन के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद भारतीय सेना के जवानों का हौसला बढ़ाया था। इसी के साथ उन्‍होंने घाटी में शहीद हुए भारतीय जवानों को श्रद्धांजलि भी अर्पित की थी। अरुण गोविल ने ट्वीट करते हुए लिखा था- 'गलवान घाटी में चीन को करारा जवाब देकर उनके इरादों को नाकाम करने वाले, शहीद हुए भारतीय सैनिकों को विनम्र श्रद्धांजलि।'

- 'झांसी क्रांति की काशी' के लेखक इतिहासकार ओम शंकर 'असर' के मुताबिक, 21 मार्च को जनरल ह्यूरोज के झांसी आने के बाद 1858 में रानी लक्ष्मीबाई का अंग्रेजों से युद्ध हुआ।
- 3 अप्रैल को रानी ने अपने सेवकों, कुछ परिजनों और सैनिकों के साथ किला छोड़ दिया। वो कालपी की ओर रवाना हुईं। 3 जून को रानी ग्वालियर पहुंची।
- 12 जून को पता चला कि अंग्रेजी फौज सिंध नदी के पास पहुंच गई है। क्रांतिकारी फौज ने 16 जून को तोपों से कंपनी फौज पर हमला कर दिया। भयंकर गर्मी और तोपों की मार के कारण कंपनी सेना पहाड़ियों की तरफ बढ़ गई।
मुंदीर की चीख सुनकर बचाने पहुंच गईं रानी 

- 17 जून को कंपनी सेना ने पहाड़ियों से आक्रमण किया। रानी युद्ध के दौरान फूलबाग (ग्वालियर) में थीं। फौज के साथ उनकी बहादुर सेविका मुंदीर भी साथ थी। उन्होंने अपने दत्तक पुत्र दामोदर को रामचंद्र राव देशमुख को सौंप दिया, जो उसे सुरक्षित स्थान पर ले गए।
- इसके बाद हुए भीषण युद्ध में रानी लक्ष्मी बाई, मुंदीर और रघुनाथ सिंह कुछ सिपाहियों सहित अपने सैनिक दल से बिछड़ गए। अकेला देख अंग्रेजी सेना इन पर टूट पड़ी। महारानी ने इस युद्ध में सोनरेखा नाला पार करना चाहा, लेकिन तभी मुंदीर को गोली लग गई।


युद्ध में कट गई थी दाहिनी आंख 

- ‘झाँसी क्रांति की काशी’ किताब लिखने वाले इतिहासकार ओम शंकर असर के मुताबिक, ये देख रानी ने गोली मारने वाले अंग्रेज सैनिक को पलक छपकते ही तलवार से मार गिराया। तभी कई अंग्रेजी सैनिकों ने रानी को घेर लिया और महारानी के सिर पर वार किया।
- रानी के चेहरे का दाहिनी आंख तक कट गई और गहरे जख्म होने की वजह से खून बहने लगा। फिर भी उन्होंने आगे बढ़ने की कोशिश की और नाला पार किया।
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घोड़े की पीठ पर खून से लथपथ पड़ी थीं रानी
– इसी दौरान उनके बाईं ओर से चलाई गई गोली सीने में प्रवेश कर गई। गोली लगने से वो घोड़े की पीठ पर ही बेहोश हो गईं। वो घोड़े पर ही खून से लथपथ पड़ीं थीं।
– उनके अंगरक्षक गुल मोहम्मद पठान बाद में रानी को गंगादास के आश्रम ले गए। यहीं वीरांगना ने प्राण त्याग दिए।
बाबा के आश्रम में हुआ अंतिम संस्कार
– रामचन्द्र राव ने महारानी के मुख में गंगाजल डाला था। गंगादास बाबा के आश्रम पर जो घास का ढेर और लकड़ियां थीं। इन्हीं से रानी का अंतिम संस्कार हुआ।
– अगले दिन 18 जून को सुबह करीब 9 बजे जब अंग्रेज अफसरों को इसकी सूचना मिली, तो वो गंगादास की कुटिया पहुंचे। तब उन्होंने 18 जून, 1858 को रानी की शहादत की घोषणा की।
कौन थी महारानी लक्ष्मीबाई
– महाराष्ट्रियन कराडे ब्राहमण परिवार में 19 नवंबर, 1827 को रानी का जन्म हुआ था। जब वो चार साल की थीं, तभी उनकी मां भागीरथी का निधन हो गया।
– वो अपने पिता मोरोपंत के साथ बाजीराव पेशवा के यहां बिठूर आ गईं। सन 1842 में रानी का विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव से हुआ।
– सन 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने पुत्र को जन्म दिया। इसका नाम दामोदर राव रखा गया। 3 माह बाद ही दामोदर का निधन हो गया। दुखी गंगाधर राव बीमार हो गए। तब जाकर 20 नवंबर, 1853 में गंगाधर राव ने दत्तक पुत्र को गोद लिया।
– उन्होंने अपने दत्तक पुत्र का नाम भी दामोदर राव रखा और गोद लेने के एक दिन बाद ही राजा गंगाधर राव का निधन हो गया।
– रानी एक बार फिर शोक में डूब गईं। गंगाधर राव के निधन के बाद रानी भी अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गईं।

 


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