हमारे शरीर के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर -दिनेश मालवीय

हमारे शरीर के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर

-दिनेश मालवीय

मनुष्य ही नहीं हर एक जीव को सबसे ज्यादा प्यार अपने शरीर से ही होता है. वह शरीर में रहता है और उससे इतना ज्यादा अटेच हो जाता है, कि खुद को शरीर ही समझने लगता है. यह एक तथ्य है कि जो चीज़ हमारे सबसे नजदीक होती है, हम उसीसे अनभिज्ञ रहते हैं. हमारे शरीर से निकट कुछ भी नहीं होता, लेकिन हम सबसे ज्यादा उसीसे अपरिचित रहते हैं. आजकल की भाषा में कहें तो हमारा शरीर हार्डवेयर की तरह है. इसके भीतर जो हमारा मन या चित्त है वह सॉफ्टवेर है. जब हम हार्डवेयर को ही नहीं समझ पाते, तो सॉफ्टवेयर को समझना तो बहुत दूर की बात है. जिस तरह सारे कंप्यूटर एक जैसे दीखते हैं और सिर उनकी बनावट में थोड़ा-बहुत फर्क होता है, उसी तरह मानव शरीर भी पूरी दुनिया में एक जैसे ही हैं. उनकी बनावट, रंग, आकृति अंग आदि में फर्क होते हैं, लेकिन बेसिक फीचर समान ही होते हैं.

शरीर यानी हार्डवेयर में समानता होने के बाद भी सभी के सॉफ्टवेयर यानी उनके मन का संसार एक-दूसरे से बहुत अलग होता है. दुनिया में करीब साढ़े सात अरब लोग हैं, लेकिन सबके मन और चित्त की अवस्थाएँ अलग-अलग हैं. उनका आंतरिक संसार एक-दूसरे से एकदम अलग है.

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वैज्ञानिकों के अनुसार, हमारे शरीर में अरबों कोशिकाएं यानी सेल्स हैं. हर एक सेल का अपना जीवन है. हमारा शरीर एक तरह की फेक्ट्री है. सोचिये, कितने आश्चर्य की बात है कि हमारा शरीर खाए हुए भोजन को किस तरह खून में बदलता है. इतना ही नहीं, इसके बाद इस फेक्टरी में में ऐसी ऑटोमेटिक व्यवस्था है जिसमें अपने आप यह निश्चित हो जाता है कि शरीर को किस चीज की कितनी ज़रूरत है. ज़रूरत से ज्यादा चीजों के अपने आप शरीर से बाहर निकलने की व्यवस्था है. शरीर के किस अंग को किस मात्रा में क्या चाहिए, यह भी अपने आप तय होकर पहुँच जाता है.  हम जो भोजन करते हैं, उससे हमारी हड्डियों का निर्माण होता है, रक्त बनता है, त्वचा बनती है, मस्तिष्क बनता है और शरीर को बिल्कुल ठीक से मालूम है, कि कौन सी चीज़ कितनी चाहिए. रक्त का निरंतर संचार होता रहता है.

आधुनिक चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि हम अपने शरीर के बारे में उतना नहीं जानते, जितना जानना चाहिए. अनेक बड़े चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि हम शरीर की किसी बीमारी को ठीक नहीं करते, शरीर स्वयं यह काम करता है- हम तो केवल इसमें सहायता करते हैं. प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान इसी सिद्धांत पर काम करता है. कितने आश्चर्य की बात है कि हम जिस शरीर में
रहते हैं, उसकी आश्चर्यजनक संरचना से लगभग पूरी तरह नावाकिफ रहते हैं.

सॉफ्टवेयर

 
शरीर यानी हमारा हार्डवेयर तो स्पष्ट दिखाई देता है, तब भी हम उसके बारे में नहीं जानते; फिर हमारे भीतर के सॉफ्टवेर यानी मन-चित्त को समझना तो बहुत दूर की बात है. जिस प्रकार हरएक कंप्यूटर में अलग-अलग चीजें फीड की हुयी हैं, उसी तरह हमारे भीतर भी करोड़ों चीजें भरी हैं. हमारा मन-चित्त एक माइक्रोसॉफ्ट चिप की तरह है, जिसमें हर पल कुछ न कुछ रिकॉर्ड हो रहा है. हम जो देख रहे हैं, पढ़ रहे हैं, सुन रहे हैं, कह रहे हैं और जिस के साथ जो भी इंटरेक्शन कर रहे हैं, वह सबकुछ पूरा का पूरा इस सॉफ्टवेर में रिकॉर्ड हो रहा है. इन्हीं को संस्कार कहा आता है.

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हमें ज़रूरत न केवल अपने हार्डवेयर यानी शरीर , बल्कि सॉफ्टवेर यानी मन-चित्त को समझने की भी है. हमारे चित्त में इतना अधिक कचरा इकट्ठा होता जा रहा है, कि हमारा शुद्ध सच्चिदानंद स्वरूप ही पूरी तरह छिप गया है. यही हमारी सारी परेशानियों और कष्टों की जड़ है.

महर्षि पतंजलि एक ऐसे वैज्ञानिक हुए हैं, जिन्होंने योग जैसा विज्ञान विकसित कर संसार को बहुत अनूठी भेंट दी है. उन्होंने जिस योग प्रणाली को विकसित किया, उसमें पहले मनुष्य का शरीर शुद्ध और मजबूत बनता है. एक बार ऐसा हो जाने पर फिर योग मन-चित्त पर काम करना शुरू कर देता है. भूलवश अधिकतर लोग आसनों और मुद्राओं आदि को ही योग मानने लगते हैं. वे इसे फिसिकल एक्सरसाइज मानते हैं. लेकिन योग का यह अंग मन-चित्त को योगभूमि पर ले जाने के लिए सिर्फ उपयुक्त भूमि विकसित करने का काम करता है.

जो भी व्यक्ति शारीरिक-मानसिक और आध्यात्मिक व्याधियों और कष्टों से पर जाना चाहता है, उसे सबसे पहले अपने हार्डवेयर यानी शरीर की रचना को समझकर उसे निरोग बनाने का प्रयास करना चाहिए. इस दिशा में थोड़ी सी प्रगति हो जाने के बाद शरीर एक मंदिर की तरह अनुभव होने लगता है. जिस तरह हम मंदिर को स्वच्छ रखते हैं और उसमें कोई अपवित्र चीज का प्रवेश नहीं होने देते, उसी प्रकार हम अपने शरीर को भी अपवित्र और अशुद्ध चीजों से दूर रखने लगते हैं. शरीर में हर समय कुछ न कुछ अटरम शटरम नहीं डालता. एक बार शरीर की शुद्धि हो जाने के बाद मन और चित्त की अवस्था भी धीरे-धीरे बदलने लगती है. व्यक्ति के योगारूढ़ होते है उसके भीतर से सारी विभूतियाँ एक-एक कर प्रकट और प्रकाशित होने लगती हैं. “योग विज्ञान” में अनेक तरह की दिव्य शक्तियों और विभूतियों का विस्तार से उल्लेख मिलता है. जैसे-जैसे मन-चित्त से विकार और आवरण हटते जाते हैं, वैसे-वैसे हमारे भीतर मौजूद विभूतियाँ प्रकट होने लगती हैं.

इसलिए हमें अपने शरीर और मन-चित्त को स्वस्थ रखने के लिए अपने हार्डवेयर यानी शरीर और सॉफ्टवेर यानी मन-चित्त के प्रति पूरी तरह सजग होने की ज़रूरत है. हमें न तो शरीर में अपवित्र चीजों को जाने देना चाहिए और न मन-चित्त में.  ऐसा करके हम शास्त्रों में उल्लेखित पूर्ण जीवन जी सकते हैं.


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