प्रवासी भारतीयों का भारत की अर्थ-व्यवस्था में भरोसा बढ़ा

प्रवासी भारतीयों का भारत की अर्थ-व्यवस्था में भरोसा बढ़ा

-दिनेश मालवीय

कोरोना संकटकाल में ऐसी कुछ बड़ी अजीब बातें हो रही हैं, जिनकी इसके पहले कल्पना करना मुश्किल था. जहाँ हमारे देश के कुछ विशेषज्ञ और सियासी टाइप के बुद्धिजीवी भारत की अर्थ-व्यवस्था की बहुत बुरी तस्वीर पेश कर रहे हैं, वहीँ दूसरे देशों में रहने वाले भारतीयों का इसमें भरोसा बढ़ा है. इस देश के रूपये में उनका भरोसा बढ़ा है और यहाँ की अर्थ-व्यवस्था के प्रति उनके दृष्टिकोण में बहुत सकारात्मक बदलाव आया है.



यह बात की पुष्टि इस तथ्य से होती है कि विदेशों में रहनेवाले भारतीयों ने भारत के बैंकों में ज्यादा पैसा जमा करना शुरू कर दिया है. भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, भारत में Non-resident External Rrupee Account में जमा होने वाली राशि में जबरदस्त वृद्धि हुयी है. पिछली साल अप्रैल-जून की तिमाही की तुलना में इस वर्ष इस अवधि में लगभग चार गुना बढ़ोत्तरी हुयी है. कोरोना के कारण पैदा हुए व्यवधान के बाबजूद इस दौरान इस खाते में 4 बिलियन डॉलर जमा हुए हैं, जबकि पिछले साल इस अवधि में सिर्फ 1 बिलियन डॉलर की राशि जमा हुयी थी.

इसका कारण तुलनात्मक रूप से लचीली भारतीय अर्थ-व्यवस्था में इसके रूपये की स्थिरता और भारत तथा दूसरे देशों के बीच बढ़ते rate differential है. CARE Ratings के chief economist मदन सबनवीस के अनुसार कोरोना महामारी से विश्व को अधिक आर्थिक नुकसान होगा. इसके अलावा दूसरे देशों में रहने वाले भारतीय अपने मूल देश में वहीं की करेंसी को जमा करना अधिक समझदारी की बात समझ रहे हैं,जिससे यहाँ रहने वाले उनके परिवारों को भी मदद मिले.डाटा से पता चलता है कि डॉलर एकाउंट से अब रुपया एकाउंट की तरफ प्रवाह होगा. डॉलर एकाउंट में प्रवाह इस वर्ष अप्रैल और जून के बीच 1.8 बिलियन डॉलर कम हुआ है. उन्हें ऐसा लग रहा है कि भारत के रूपये में ऐसी कोई तेज गिरावट नहीं आएगी, जिससे उनके डिपाजिट रिटर्न पर बुरा असर पड़े. एनआरई डिपॉजिट्स में विगत 2-3 साल में काफी बढ़ोत्तरी नहीं हुयी है, क्योंकि दूसरे देशों में स्थानीय दर वैश्विक दर की तुलना में तेजी से कम हुयी है.


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