‘पद्म पुराण’ संक्षेप -दिनेश मालवीय

‘पद्म पुराण’ संक्षेप

-दिनेश मालवीय

सनातन धर्म वांग्मय के 18 पुराणों में पद्म पुराण का बहुत महत्त्व है. यह एक बहुत बड़ा ग्रंथ है. इसके श्लोकों की संख्या 50 हज़ार है. इस पुराण में उपाख्यानों और कथानकों की प्रधानता है. ये कथानक पौराणिक पुरुषों और राजाओं से सम्बंधित हैं.



‘पद्म पुराण’ मुख्य रूप से वैष्णव पुराण है और इसमें श्रीविष्णु की उपासना के महत्त्व को प्रतिपादित किया गया है. इसमें प्रसंगवश शिव का भी वर्णन मिलता है. विष्णु की प्रधानता वाला होने के बाबजूद इस ग्रंथ में त्रिदेवों में उन्हें सबसे बड़ा नहीं माना गया है. ‘पद्म पुराण’ पाँच भागों में विभाजित है- श्रृष्टि खण्ड, भूमि खण्ड, स्वर्ग खण्ड, पाताल खण्ड और उत्तर खण्ड.

श्रृष्टि खण्ड में 82 अध्याय और पाँच उपखण्ड हैं. इसमें मनुष्यों की सात प्रकार की श्रृष्टि रचना का विवरण मिलता है. इसमें सावित्री-सत्यवान उपाख्यान, पुष्कर आदि तीर्थ और प्रभंजन, धर्ममूर्ति, नरकासुर, कार्तिकेय आदि की कथाएं भी हैं. ‘पद्म पुराण’ में पितरों के श्राद्धकर्म, पर्वतों, द्वीपों, सप्त सागरों आदि का भी वर्णन मिलता है.

इस खण्ड के अनुसार एकादशी के दिन आंवले के जल से स्नान करने पर ऐश्वर्य और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है. इसमें आंवले के साथ ही तुलसी के गुणों का भी बखान किया गया है. तुलसी का पौधा घर में रखने से भूत-प्रेत और रोग आदि घर में नहीं आते. इसमें गंगा और श्रीगणेश की स्तुति भी की गयी है और संक्रांति काल के पुण्य फल का भी उल्लेख किया गया है.

भूमि खण्ड- इसमें अनेक आख्यान हैं. इसमें ब्रह्मचर्य, मानवधर्म आदि का वर्णन है. इसमें जैन धर्म का भी विवेचन है. भूमि खण्ड के प्रारम्भ में शिव शर्मा ब्राह्मण द्वारा पितृ भक्ति और वैष्णव भक्ति की सुंदर कथा दी गयी है. इसके बाद सोम शर्मा द्वारा भगवान विष्णु की भावयुक्त स्तुति है. इस खण्ड में वेन पुत्र राजा पृथु के जन्म चरित्र, गन्धर्व कुमार सुशंख द्वारा मृत्यु अथवा यम कन्या सुनीया को शाप, अंग की तपस्या, वेन द्वारा विष्णु की उपासना और पृथु के आविर्भाव की कथा दी गयी है. विष्णु द्वारा दान काल के भेदों का वेन को उपदेश, सुकाला की कथा, शूकर-शूकरी का उपाख्यान, पिप्पल की पितृ तीर्थ प्रसंग में तपस्या, सुकर्म की पितृ भक्ति, भगवान शिव की महिमा और भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने वाले स्तोत्र का भी इसमें उल्लेख है.

 ययाति की जरावस्था, कामकन्या से भेंट और पुत्र पुरु द्वारा उसे अपना यौवन प्रदान करने की कहता भी इस खण्ड में आती है. इसमें गुरु तीर्थ के प्रसंग में महर्षि च्यवन की कथा, कुंजल पक्षी द्वारा अपने पुत्र को ज्ञानव्रत और स्तोत्र के उपदेश आदि का वर्णन है. इस खण्ड मेंशरीर की उत्पत्ति का भी सुंदर विवेचन किया गया है.

स्वर्ग खण्ड- इसमें पुष्कर तीर्थ और नर्मदा के तट के तीर्थों का सुंदर और मनोहारी वर्णन है. इसके अलावा, शकुंतला-दुष्यंत उपाख्यान, ग्रह-नक्षत्र, नारायण दिवोदास, हरिश्चंद्र, मान्धाता आदि के चरित्र का सुंदर वर्णन है.

इस खण्ड में भारतवर्ष के कुल सात पर्वतों, 122 नदियों, उत्तर भारत के 135 और दक्षिण भारत के 51 जनपदों के साथ ही म्लेच्छ राजाओं का भी वर्णन है. इसमें ब्रहमाण्ड की उत्पति का भी सुंदर विवेचन है. विविध तीर्थों में नागराज तक्षक की जन्मभूमि विताता (कश्मीर), अबुर्दक्षेम, प्रभासक्षेम, सिन्धु-समृद्ध संगम त्रक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, पुण्डरीक तीर्थ, कपाल मोचन तीर्थ, पृथूदक तीर्थ और संनिहिता तीर्थ आदि का वर्णन है.स्वर्ग खण्ड में भगवान् विष्णु के पुराणमाय स्वरूप का वर्णन है.

पाताल खण्ड- इस खण्ड में रावण विजय के बाद रामकथा का वर्णन है. श्रीकृष्ण की महिमा, कृष्ण तीर्थ, नारद का स्त्री रूप आख्यान, रावण और अन्य राक्षसों का वर्णन, बारह महीनों के पर्व और महात्म्य तथा भूगोल सम्बन्धी सामग्री भी इसी खण्ड का अंग है.वास्तव में इस खण्ड में भगवान विष्णु के रामावतार और कृष्णावतार की लीलाओं का वर्णन है.

उत्तर खण्ड-इसमें जलंधर राक्षस और उसकी सती पत्नी तुलसी वृंदा की कथा और अनेक देवों तथा तीर्थों के महात्म्य का वर्णन है. इस खण्ड का प्रारम्भ नारद-महादेव के बीच बद्रिकाश्रम और नारायण की महिमा के संवाद के साथ होता है. इसके बाद गंगावतरण की कथा, हरिद्वार के महात्मय, प्रयाग, काशी और गया आदि तीर्थों का वर्णन है.

‘पद्म पुराण’ में नंदी धेनु उपाख्यान, बालि-वामन आख्यान, तुलाधर की कथा आदि का वर्णन है. तुलाधर कथा से पतिव्रत धर्म की शक्ति का प्रतिपादन किया गया है.इन उपाख्यानों में विभिन्न कथाओं के माध्यम से सत्य और सदाचरण का सन्देश दिया गया है. पूजा जाति नहीं, बल्कि गुणों की होनी चाहिए.


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