Paralysis(लकवा): घातक है चिकित्सा में देरी: क्या है Paralysis: आयुर्वेद के उपाय और उपचार

Paralysis(लकवा) घातक है चिकित्सा में देरी..क्या है Paralysis: आयुर्वेद के उपाय और उपचार..
यद्यपि Paralysis एक ही प्रकार का होता है, किंतु व्यवहार में यह तीन तरह का दिखाई देता है- 1. धीरे-धीरे उत्पन्न होने वाला 2. सहसा या एकाएक उत्पन्न होने वाला तथा जो तीसरा प्रकार है, उसे अस्थायी Paralysis कहते हैं- इसमें Paralysis होता है तथा दो-चार दिन या दो-चार घंटे में उपचार से या बिना उपचार के ही ठीक हो जाता है। अस्थायी Paralysis के पुनः होने की अधिक संभावना रहती है।


रूखा-सूखा, ठंडा, कम तथा हल्का भोजन सेवन करते रहने से, अत्यधिक मैथुन व रात्रि जागरण करने से, असमय पंचकर्म या देश व काल के विरुद्ध असात्म्य आहार-विहार करने से, वमन विरेचन या वस्ति आदि के द्वारा दोष या मल एवं रक्त के अत्यधिक निकल जाने से, अधिक उछलने-कूदने, तैरने, पैदल चलने व अधिक व्यायाम आदि से, धातुओं का क्षय होने से, चिंता, शोक, रोगजन्य दुर्बलता तथा अधारणीय वेगों को बलपूर्वक रोकने से, शरीर में आमरस की उपस्थिति, चोट, उपवास तथा मर्मस्थान की बाधा से, हाथी, घोड़ा, ऊंट तथा वाहन आदि से गिर जाने के कारण शरीर में प्रकुपित हुआ वायु (वात) रिक्त (स्नेह, मृदुता, पिच्छिलता आदि गुणों से शून्य) स्रोतों को परिपूर्ण करके एक अंग में या सारे शरीर में विविध प्रकार की व्याधियां उत्पन्न करता है।

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वात एवं नाड़ी संस्थान दोनों का अस्तित्व पृथक-पृथक होते हुए भी दोनों एक-दूसरे से अत्यधिक संबद्ध हैं। संज्ञा एवं चेष्टा का वहन नाड़ी संस्थान से होता है, जबकि वात इनका अधिष्ठाता, नियंता एवं प्रणेता है। शरीर की समस्त चेष्टाओं में नाड़ी संस्थान एवं वायु कारणभूत हैं। 

लेकिन इन चेष्टाओं को करने का मुख्य आधार विभिन्न अवयव हैं। जब कभी भी चेष्टावह नाड़ियां विकृत होती हैं, तो इससे संबंधित अंगों की चेष्टाओं में कमी हो जाती है या पूर्णतः चेष्टा का नाश हो जाता है, जिसके फलस्वरूप वह अंग अपने लिए नियत चेष्टां का निर्वाह नहीं कर सकता, परिणामतः उसका घात हो जाता है, इसे अंगघात कहते हैं। अंगघात में संज्ञा तथा चेष्टावह नाड़ियां तत्काल अपना कार्य करना बंद कर देती हैं, लेकिन पोषणी नाड़ियां 1 पोषण करते रहती हैं। 

आयुष्मान पत्रिका में छपे एक लेख के अनुसार इससे धीरे-धीरे पोषण में भी कमी आती है और वह अंग पतला पड़ जाता है तथा बेजान सा लगने लगता है। Paralysis एक अंगघातक वातव्याधि है। शरीर में होने वाले अंगघात को उसके स्वरूप के अनुसार कई प्रकार से विभक्त कर सकते हैं।

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1. Paralysis( अर्धांगघात) लंबाई में सिर से पैर तक के हिस्से को दो भागों में विभक्त करने से एक भाग वामपक्ष (बायां) तथा दूसरा भाग दक्षिणपक्ष (दायां) कहलाता है। किसी भी एक पक्ष की चेष्टाओं का नाश होने पर इसे पक्षाघात, अर्धांगघात या पक्षवध कहते हैं।

2. एकांगघात शरीर के किसी एक अंग की चेष्टाओं के नाश को एकांगघात कहते हैं। संपूर्ण शरीर की चेष्टाओं का नियंत्रण मस्तिष्क से होता है। मस्तिष्क के शल्कीय भाग में नाड़ीतंतु दूर-दूर होते हैं, अतः जिस स्थान विशेष पर विकृति होती है, वहां जितने तंतु होते हैं, उनसे संबंधित संज्ञा एवं चेष्टाएं प्रभावित होती हैं। फलस्वरूप एक अंग विशेष या स्थान विशेष का ही घात होता है, जिसे एकांगघात कहते हैं। अर्दित (चेहरे का लकवा), खंजता (लंगड़ापन), विश्वाची, अवबाहुक, वाणी की विकृति, जिलास्तंभ (जीभ की जकड़न), हनुस्तंभ (जबड़ों की जकड़न), मन्यास्तंभ, विशिष्ट पेशियों का स्तंभ आदि एकांगघात संबंधी प्रमुख रोग हैं। 

3. अधरांगघात सुषुम्ना कांड से भी कुछ नाड़ियां उत्पन्न होती हैं। सुषुम्नाकांड के कटि प्रदेशीय भाग में आघात, संपीड़न, संक्रमण या अन्य किसी भी कारण से विकृति हो, तो नीचे के अंगों में आने और जाने वाले संज्ञा तथा चेष्टावाही वेग अवरुद्ध या विकृत हो जाते हैं, अ अंगों का घात होता है, जिसे अर्धरांगघात कहते हैं, इसमें पंगुता उत्पन्न होती है।

4. सर्वागघात मस्तिष्क में आघात (चोट) या अन्य कारण से संपूर्ण शरीर में जाने वाली नाड़ियों विकृति होने से सर्वागघात होता है।

Paralysis के कारण:-

लेख के प्रारंभ में उल्लिखित प्रकोषक कारणों से प्रवृद्ध वायु किसी एक पक्ष को आश्रित करके उस ओर के संधि बंधनों को शिथिल करके चेष्टाओं को नष्ट कर देता है, इसे पक्षवध या Paralysis कहते हैं। इसमें वेदना तथा वाणी का स्तंभ (बोली मंद होना या कष्टपूर्वक अस्पष्ट उच्चारण होना) होता है। इस रोग में मस्तिष्क की भी विकृति होती है। यह तथ्य आयुर्वेद के प्राचीन आचार्यों को ज्ञात था। महर्षि सुश्रुत ने Paralysis व्याधि में मस्तिष्क शिरोवस्ति का विधान विशेष रूप से निर्दिष्ट किया है। मस्तिष्क शिरोवस्ति में स्नेह से प्लावित कपड़ा या मई का फोहा सिर पर रखने का विधान है।

आधुनिक मतानुसार Paralysisके कारण:-

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार Paralysis को पूर्णतः मस्तिष्क में विकृति होने से होने वाला रोग बताया गया है। शरीर की संज्ञा एवं चेष्टाओं का नियंत्रण मस्तिष्कद्वारा होता है, अतः जब इसमें विकृति होती है, तब Paralysis होता है। मस्तिष्क में यह विकृति उर्ध्व चेष्टावह नाड़ी कंदाणुओं के घात से होती है। इन कंद्राणुओं से प्रसृत एवं निसृत नाड़ी सूत्र सुषुम्ना शीर्षक में आकर एक-दूसरे को पार करके विपरीत दिशा में गमन करते हैं अर्थात दाएं भाग से आए नाड़ी सूत्र वाम (बाएं) पक्ष में तथा वामपक्ष से आए नाड़ी सूत्र दक्षिण (दाएं) पक्ष में गमन करते हैं। अतः जब मस्तिष्क के दाएं भाग में विकृति होती है, तो बाएं भाग का तथा बाएं भाग में विकृति होने से दाएँ भाग का Paralysisहोता है।

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Paralysis का एकमात्र कारण नाड़ी तंतुओं का विनाश या नाड़ी तंतुओं में प्रबलतम अवरोध होना है, जो निम्नानुसार है अ. विशिष्ट रोग- तीव्र संक्रामक रोगों के विष का संचारण मस्तिष्क तक हो जाए, तब वहां धमनियों में क्षत होकर Paralysisहो सकता है। इसके अतिरिक्त गांजा, चरस, अफीम, शराब, कुचला, संखिया, तीव्र एंटीबायोटिक औषधियों का सेवन तथा धतूरा एवं सीसक विष आदि के कारण भी Paralysis हो सकता है। सन्यास, मूर्च्छा, तीव्र ज्वर, रक्ताधिक्य या रक्तभार में अत्यंत कमी, मस्तिष्क के अर्बुद, हृदयरोग, वृद्धावस्था, वृक्करोग, सुषुम्ना पर आघात तथा मस्तिष्क पर आघात होने से पक्षाघात हो सकता है। 

Paralysis होने का एक प्रमुख कारण रक्तवाहिनी की विकृति होना है। पूर्व में वर्णित कारणों से मस्तिष्क की रक्त वाहिनियों में या तो क्षत होकर उनसे हुआ रक्तस्त्राव मस्तिष्क के उन-उन भागों में जमकर अवरोध उत्पन्न करता है या इन रक्त वाहिनियों में किसी कारण से अवरोध होकर मस्तिष्क को रक्त नहीं पहुंचता, अतः वहां नाड़ी सूत्रों में शोध एवं क्षत उत्पन्न हो जाते हैं। 

रक्त वाहिनियों की निम्न विकृतियां इसमें कारण हैं..

1. रक्तवाहिनीगत धनात्रता (थ्रॉम्बोसिस)

2. अंतःशल्यता (एंबोलिज्म)

3. धमनी संकोच (एंजियो स्पाज्म)

4. धमनी दाढर्य (आर्टिरियो स्कलेरोसिस)

इस संबंध में आयुर्वेद के प्राचीन महर्षियों का एक सिद्धांत अनिवार्यतः उल्लेखनीय है। वात (वायु) का प्रमुख गुण रुक्ष है तथा अभिवृद्ध होने पर यह वायु शरीर में रुक्षता उत्पन्न करती है। रूक्षता के प्रभाव से धमनियों की स्निग्धता नष्ट होकर उनमें खरता उत्पन्न हो जाती है, जिसके फलस्वरूप उनकी मृदुता एवं स्थितिस्थापकत्व का गुण समाप्त हो जाता है, अतः उनमें भंगुरता आ जाती है। थोड़े से भी कारण (तीव्र ज्वर, रक्तभार, तनाव, शोक, चिंता, आघात) से वे टूट जाती हैं तथा रक्तस्त्राव होकर उपर्युक्त प्रक्रिया से Paralysisहो जाता है।

Paralysisके लक्षण:-

Paralysis में एक पक्ष के सभी अंगों की चेष्टा नष्ट हो जाती है। वाणी भी स्तब्ध हो जाती है। Paralysis से आक्रांत अंगों में सुई चुभोने या आघात करने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। प्रायः आरंभ में मूर्च्छा या तीव्र ज्वर होकर Paralysis होता है। कभी-कभी पूर्वरूप में तेज सिरदर्द होता है तथा गर्दन अकड़ जाती है। कभी-कभी शिरोभ्रम, पसीना निकलने एवं उल्टी होने के बाद Paralysis होता है।

Paralysis के परीक्षण एवं निदान में किसी प्रकार का संशय नहीं होता, फिर भी परीक्षण की दृष्टि से प्रभावित पक्ष की टांग को ऊपर उठाकर छोड़ देने पर वह एकदम से नीचे गिर जाती है। किसी भी तरह की संज्ञा एवं चेष्टा से संपूर्ण पक्ष शून्य रहता है।

चिकित्सा सिद्धांत:-

Paralysis के रोगी में सर्वप्रथम स्वेदन (नाड़ी स्वेद, संकर स्वेद, वाष्प स्वेद) करके स्नेहयुक्त विरेचन देना चाहिए। तत्पश्चात वृंहण एवं वातघ्न औषधियों का प्रयोग तथा वातघ्न तेलों से अभ्यंग (मालिश) करना चाहिए। घातित अंगों को हल्का व्यायाम करवाते रहना चाहिए। घातित पैर एवं बाहु आदि शरीर के साथ सटकर न रहें, इसलिए बीच में तकिया रख देना चाहिए। 

Paralysis में वस्ति का प्रयोग उत्कृष्टतम उपक्रम माना जाता है।


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