जानवरों के प्रति जुनून ऐसा कि नाम ही पड़ गया ‘कुत्ते वाली भाभी’ : कराया 1500 के आसपास कुत्तों का ऑपरेशन

बेजुबानों से बेइंतहा नफरत करने वालों के बीच कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो न केवल उनका दुःख-दर्द समझते हैं, बल्कि उनके अधिकारों के लिए कानून का दरवाज़ा खटखटाने से भी पीछे नहीं हटते। फिर भले ही इसके लिए उन्हें लाखों गालियाँ क्यों न मिलें। भोपाल की शिवांगी ठाकुर, वीना श्रीवास्तव और नीलम धुर्वे ऐसे ही लोगों में से हैं। अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाने के साथ-साथ सभी पिछले काफी समय से बेजुबानों को इंसानी क्रूरता से बचाने की दिशा में काम करती आ रहीं हैं। जानवरों के प्रति इनके जुनून का आलम यह है कि अब लोग इन्हें ‘कुत्ते वाली भाभी’ या ‘कुत्ते वाली दीदी’ भी कहने लगे हैं।

2016 से पहले तक सभी अलग-अलग काम करते थे, लेकिन फिर एक रैली में हुई मुलाकात ने उन्हें एकजुट किया और आज सभी एक टीम के रूप बेजुबानों की आवाज़ बनी हुई हैं। शिवांगी हर रोज़ 20-25 कुत्तों को खाना खिलाती हैं, क्योंकि वह जानती हैं कि जानवरों की आक्रामकता भूख से जुड़ी होती है, हालांकि ये बात अलग है कि अधिकांश लोग इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं होते। वैसे शिवांगी इस संबंध में जागरुकता फैला रही हैं और कुछ हद तक कामयाब भी हुई हैं। शिवांगी अब तक अनगिनत बेजुबानों को रेस्क्यू करके नया जीवन दे चुकी हैं। उनके इस अभियान की शुरुआत सही मायनों में 2012 में तब हुई जब कॉलेज जाते समय उन्हें रास्ते में एक घायल कुत्ता नज़र आया। शिवांगी बताती हैं, “बात काफी पुरानी है, बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी जाते समय मेरी नज़र एक घायल कुत्ते पर पड़ी। मेरे लिए उसे उसी हाल में छोड़कर जाना संभव नहीं था, इसलिए मैं किसी तरह उसे डॉक्टर के पास लेकर पहुंची। डॉक्टर ने बताया कि उसे ठीक होने में समय लगेगा। अब समस्या यह थी कि कुत्ते को रखा कहां जाए, क्योंकि मेरे घर में पहले से ही एक डॉग था। तभी मुझे एक शेल्टर के बारे में पता चला, मैं वहां गई और जब पूरी तरह आश्वस्त हो गई कि कुत्ता सुरक्षित रहेगा तो उसे वहां छोड़ दिया। हालांकि, मैं उसे सही होते देखना चाहती थी, इसलिए मैंने वॉलिटियर के रूप में शेल्टर में काम करना शुरू कर दिया।” शिवांगी ने शेल्टर की आर्थिक रूप से भी मदद की, लेकिन इसके लिए उन्होंने जिस तरह से पैसा जुटाया, आज उसे याद करके वह हंस देती हैं। वह बताती हैं ‘मैं कॉलेज में थी, तो फीस पेरेंट्स ही देते थे। मैं फीस थोड़ी ज्यादा बताती और जो अतिरिक्त पैसे मिलते उन्हें इकठ्ठा करती, इस तरह मैंने शेल्टर में शेड आदि बनवाया।” शिवांगी भोपाल के जाटखेड़ी इलाके में रहती हैं और यहां आसपास रहने वाले सभी लोगों को पता है कि यदि किसी भी जानवर को कोई आंच आई, तो फिर शिवांगी के प्रकोप से उन्हें कोई नहीं बचा सकता।

हालांकि, इस नेक काम के लिए भी शिवांगी को लोगों की आलोचना और गालियों का सामना करना पड़ता है। एक घटना का जिक्र करते हुए वह बताती हैं, “शादी के तुरंत बात मैं चिनार पार्क में रहती थी। एक दिन मैं किसी काम से घर से बाहर निकली ही थी कि घरवालों ने फ़ोन पर बताया कि कुछ लोग एक कुत्ते को जिंदा जला रहे हैं। मैं फ़ौरन वापस लौटी तो देखा कि एक युवक हाथ में पेट्रोल की बोतल लिए कुत्ते को जलाने का प्रयास कर रहा है, मैंने किसी तरह उससे बोतल छीनी। मेरे ऐसा करते ही लोग भड़क गए और गालियां देना शुरू कर दिया, लेकिन मैं खामोश रही क्योंकि मेरी पहली प्राथमिकता कुत्ते को वहां से सुरक्षित निकालना था। इसमें सफल होने के बाद मैंने लोगों को उन्हीं की भाषा में जवाब दिया। उनका आरोप था कि कुत्ते ने बच्ची को काटा है, जबकि ये सही था या गलत कोई नहीं जानता।” शिवांगी एनिमल बर्थ कंट्रोल यानी एबीसी पर ज्यादा जोर देती हैं, क्योंकि कुत्तों की बढ़ती संख्या उनके और इंसान दोनों के लिए ही सही नहीं है। वह अब तक 1500 के आसपास कुत्तों का ऑपरेशन करवा चुकी हैं। नियमानुसार नगर निगम भी यही करता है। निगम कर्मी जिस इलाके से कुत्तों को पकड़ते हैं नसबंदी और एंटी रेबीज इंजेक्शन लगाने के बाद उन्हें उसी क्षेत्र में छोड़ा जाता है, लेकिन लोग चाहते हैं कि सड़कों पर घूमने वाले कुत्तों को हमेशा के लिए वहां से हटा दिया जाए, जो मुमकिन नहीं। इसी बात को लेकर लोगों का शिवांगी जैसे पशु प्रेमियों से विवाद होता रहता है। ऐसे ही एक मामले में शिवांगी के खिलाफ स्थानीय रहवासियों ने काफी हंगामा किया था। उन्हें इससे भी नारजगी थी कि शिवांगी कुत्तों को खाना खिलाती हैं, हालांकि नियम-कायदों की इस लड़ाई में जीत शिवांगी की ही हुई। इसके बाद से लोगों ने शिवांगी से उलझना बंद करना दिया, इतना ही नहीं जो लोग कल तक उनके खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे आज वो भी इस अभियान में उनके सहभागी हैं। वीना श्रीवास्तव के लिए बेजुबानों के प्रति अपने प्यार को बरक़रार रखना शिवांगी की अपेक्षा ज्यादा चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि उन्हें परिवार का पूरा साथ नहीं मिलता। वीना के पति वैसे तो उनका समर्थन करते हैं, लेकिन केवल तब तक जब तक कि उनका पशु प्रेम पारिवारिक जीवन को प्रभावित नहीं करता और जायज है ऐसा ज्यादा दिनों तक संभव नहीं हो पाता।

वीना ने कहा, “किसी भी सामान्य इंसान के लिए 15 कुत्तों के बीच रहना आसान नहीं, इसलिए कभी-कभी इस बात को लेकर मेरी घर में नोकझोंक हो जाती है। अच्छी बात यह है कि मेरा बेटा हर काम में मेरा साथ देता है, फिर चाहे वो कुत्तों को खिलाना हो या उनका इलाज करवाना।” वीना जब घर से निकलती हैं, तो उनके पास जानवरों के खाने-पीने का सामान होता है और यदि ऐसा संभव नही हो पाता तो वह जहाँ जाती हैं, वहां कुछ न कुछ व्यवस्था कर देती हैं। बकौल वीना, “मैं किसी जानवर को भूखा नहीं देख सकती। शादी वगैरह में भी जाती हूँ तो वहां से कुछ खाना ले जाकर बाहर कुत्तों को दे आती हूँ। शुरुआत में मेरे परिचितों को यह बेहद अजीब लगता था, लेकिन अब उन्हें आदत हो गई है। फिर भी कुछ हैं जिनकी नज़र में यह मेरा पागलपन है, मगर मैं उनकी सोच से इत्तेफाक नहीं रखती।” वीना को भी गालियाँ और धमकियां मिलती रहती हैं। इस बारे में वह कहती हैं, “बुरा लगता है जब किसी भूखे का पेट भरने के लिए हमें कोसा जाता है, जान से मारने की धमकी दी जाती है। अधिकांश लोग चाहते हैं कि आवारा कुत्तों को खाने के लिए कुछ न दिया जाए, लेकिन वो यह नहीं समझते कि भूखा कुत्ता आक्रामक हो सकता है। कुछ वक़्त पहले इसी बात को लेकर एक युवक ने बीच सड़क पर मेरे साथ दुर्व्यवहार किया, वो गालियां बक रहा था और लोग तमाशबीन बने थे। किसी ने उसे रोकने की जहमत नहीं उठाई।” शिवांगी की तरह वीना भी एसीबी पर खास ध्यान देती हैं, ताकि आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या को नियंत्रित किया जा सके और उनके खिलाफ होने वाले अत्याचार को भी। पेशे से शिक्षक नीलम धुर्वे भोपाल के शिवाजी नगर इलाके में रहती हैं और पिछले 15-16 सालों से लगातार बेजुबानों की सेवा करती आ रही हैं।

खास बात यह है कि उनका पूरा परिवार इस काम में उनके साथ है। नीलम के काम करने का तरीका थोड़ा जुदा है, उनकी कोशिश रहती है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपने साथ जोड़ा जाए ताकि विरोध में उठने वालीं आवाजों को मंद किया जा सके। हालांकि, जानवरों को हिंसा से बचाने के प्रयास में उन्हें खुद लोगों की हिंसा से दो-चार होना पड़ता है। नीलम ने कहा, “मैं रोजाना घूम-घूमकर 15-20 कुत्तों को खाना खिलाती हूँ। कई बार लोग इसे लेकर झगड़ा करते हैं। कुछ वक़्त पहले तो एक महिला ने मुझपर हँसिए से हमला किया था, भगवान का शुक्र रहा कि मैं किसी तरह बच गई।”

नीलम के मुताबिक, ऐसे कई लोग हैं जो खुद बेजुबानों के लिए कुछ करना चाहते हैं, लेकिन दूसरों के डर से या व्यस्तता के चलते ऐसा कर नहीं पाते, वह डॉग फ़ूड आदि मुझे डोनेट कर देते हैं। शिवांगी और वीना की तरह नीलम भी कुत्तों की नसबंदी का खास ख्याल रखती हैं। वह अब तक 50 के आसपास कुत्तों का ऑपरेशन करवा चुकी हैं। स्कूल और परिवार की ज़िम्मेदारी के साथ-साथ जानवरों की सेवा के लिए वक़्त निकालना कितना मुश्किल है? इसके जवाब में नीलम कहती हैं, “मुश्किल तो बहुत है, सुबह और शाम दो-दो घंटे निकालने पड़ते हैं कुत्तों को खाना खिलाने के लिए। इसके अलावा यदि मेडिकल इमरजेंसी हो तो फिर समय का पता ही नहीं चलता। मुझे बेजुबानों की मदद करना अच्छा लगता है, और जो काम आपको अच्छा लगता है उसके लिए आप किसी न किसी तरह वक़्त निकाल ही लेते हैं।” शिवांगी, वीना और नीलम लोगों से पशुओं के प्रति दया-भाव की अपील करना चाहती हैं। इसके साथ ही पशु प्रेमियों को उनकी सलाह है कि यदि कोई जानवरों पर क्रूरता करता है तो उसके खिलाफ सबूत इकठ्ठा करना सुनिश्चित करें जैसे कि फोटो या वीडियो, ताकि क़ानूनी कार्रवाई की जा सके। भारतीय कानून के साथ-साथ हमारे संविधान में भी बेजुबानों के अधिकारों का जिक्र है। कोई उन्हें नुकसान नहीं पहुंचा सकता और न ही किसी को उन्हें खाना खिलाने से रोक सकता है।

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