अभ्यास से सुधर सकता है व्यक्तित्व और कृतित्व : Swami Vivekananda

 

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अभ्यास से सुधर सकता है व्यक्तित्व और कृतित्व : स्वामी विवेकानंद अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्नीरोध:।। अर्थात अभ्यास और वैराग्य से उन वृत्तियों का निरोध होता है।

व्याख्या—इस वैराग्य को प्राप्त करने के लिए यह विशेष रूप से आवश्यक है कि मन निर्मल सत्य और विवेकशील हो। अभ्यास करने की क्या आवश्यकता है? प्रत्येक कार्य से मानो चित्तरूपी सरोवर के ऊपर एक तरंग खेल जाती है। यह कंपन कुछ समय बाद नष्ट हो जाता है। फिर क्या शेष रहता है? केवल संस्कारसमूह। मन में ऐसे बहुत से संस्कार पड़ने पर वे इकट्ठे होकर आदत के रूप में परिणत हो जाते हैं।

ऐसा कहा जाता है कि— "आदत ही द्वितीय स्वभाव है।" केवल द्वितीय स्वभाव नहीं बल्कि वह प्रथम स्वभाव ही है मनुष्य का समस्त स्वभाव इस आदत पर निर्भर रहता है। हमारा अभी जो स्वभाव है वह पूर्व-अभ्यास का फल है। यह जान सकने से कि सब कुछ अभ्यास का ही फल है मन में शांँति आती है क्योंकि यदि हमारा वर्तमान स्वभाव केवल अभ्यासवश हुआ हो तो हम चाहें तो किसी भी समय उस अभ्यास को नष्ट भी कर सकते हैं।

हमारे मन में जो विचारधाराएँ बह जाती हैं,उनमें से प्रत्येक अपना एक-एक चिन्ह या संस्कार छोड़ जाती है। हमारा चरित्र इन सब संस्कारों की समष्टि स्वरूप है। जब कोई विशेष वृत्तिप्रवाह प्रबल होता है तब, मनुष्य उसी प्रकार का हो जाता है। जब अच्छा भाव प्रबल होता है तब मनुष्य अच्छा हो जाता है। यदि बुरा भाव प्रबल हो,तो मनुष्य बुरा हो जाता है। यदि आनंद का भाव प्रबल हो तो मनुष्य सुखी होता है।

बुरी आदतों का एकमात्र प्रतिकार है,उनकी विपरीत आदतें। हमारे चित्त में जितनी बुरी आदतें संस्कारबद्ध हो गई है उन्हें अच्छी आदतों द्वारा नष्ट करना होगा। केवल सत्य कार्य करते रहो,सर्वदा पवित्र चिंतन करो,असत्य संस्कार रोकने का बस यही एक उपाय है।

ऐसा कभी मत कहो कि अमुक के उधार की कोई आशा नहीं है क्यों? इसलिए कि वह व्यक्ति केवल एक विशिष्ट प्रकार के चरित्र का कुछ आदतों की समष्टि का द्योतक मात्र है और यह आदतें नई और अच्छी आदतों से दूर की जा सकती है। चरित्रवश पुनः पुनः अभ्यास की समष्टीमात्र है। और इस प्रकार का पुनः पुनः अभ्यास ही चरित्र का सुधार कर सकता है।

स्वामी विवेकानंद


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