पिठौरा: भीलों की मिथकीय चित्र परम्परा

पिठौरा: भीलों की मिथकीय चित्र परम्परा

FolkTrading-newspuran-01

पिठौरा भीलों की चित्र परम्परा का सबसे सुंदर उदाहरण है। भील समुदाय प्रकृति के अस्तित्त्व में विश्वास करता है। वे पेड़-पौधों आदि सृष्टि की प्रत्येक वस्तु में किसी न किसी शक्ति अथवा देवता का वास मानते हैं, जिससे सारी सृष्टि और जीवन संचालित होता है। भजन उसी शक्ति की पूजा का उपक्रम करते हैं, जिसे पिठौरा बापदेव' कहते हैं। दिवाल पर वर्ष में एक बार चित्र बनाकर उसका

अनुष्ठान समारोह पूर्वक करते हैं, जिसमें पूरा समाज इकट्ठा होता है। पिठौरा पूजन देवी-देवताओं के आव्हान और पूजा का सबसे पवित्र और प्रमुख अवसर होता है। पिठौरा पर्व एक आदिम अनुष्ठान है, जो आदिम आस्था की अपूर्व गाथा बनकर उतरती है, जिसे भीलों ने अपनी चित्र परम्परा में स्वर और शब्द के माध्यम से सदियों-सदियों से संभाल कर रखा है, जो चित्र और शब्द की अनुपम युति कही जा सकती है। वह भीली चेतना का सबसे उजला चित्रित पृष्ठ है और है आदिम गाथाओं को जगाने का सबसे पावन अवसर। जहाँ पिठौरा के घोड़े आकाश में उड़ते हैं, बातें करते हैं, धरती से स्वर्ग तक जाते हैं। देवी-देवताओं को धरती पर लाते हैं ।

ढाँक पर बड़वे पिथौरा या पिठौरा बापूजी और काजलराणी की गाथा जगाते हैं। काजलराणी सबका कल्याण करने वाली है। ढाँक की रहस्यमयी गूंजती ध्वनियाँ जैसे देव-आत्माओं से संवाद करती हैं, जैसे उनकी प्रार्थना करुणा में बदल जाती है। पिथौरा कथा के माध्यम जैसे भीलजन अपनी जातीय स्मृतियों को एक बार फिर जगाने की कोशिश करते हैं। भीलों का पिठौरा भित्तिचित्र उनकी सम्पूर्ण संस्कृति और चित्रकर्म का अपने आप में एक मिथकीय दस्तावेज है।

पिठौरा परम्परा को जानने से पहले यहाँ भीलों के बारे में संक्षेप में जान लेना जरूरी है। झाबुआ मध्यप्रदेश का एक आदिवासी पश्चिमांचल है, जो राजस्थान और गुजरात की सरहदों से लगा हुआ है। झाबुआ से लगे हुए धार, बड़वानी और पश्चिम निमाड़ जिलों में भी भीलों का निवास है। यह कहना उपयुक्त होगा कि पश्चिमांचल देश की तीसरी सबसे बड़ी जनजाति भील की पहचान रखने वाला क्षेत्र है। समूचे झाबुआ में भीलों का ही निवास है। झाबुआ अपने आपमें बहुत बड़ा क्षेत्र है।
धार-झाबुआ में भीलों का प्रतिशत सर्वाधिक 85 प्रतिशत है। झाबुआ-राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र की सीमाओं से एक तरफ से घिरा हुआ है, दूसरी तरफ बड़वानी, धार और पश्चिम निमाड़ जिले की सीमाएँ भी उसे घेरती हैं। रतलाम, मन्दसौर और नीमच मध्यप्रदेश के हिस्से हैं, लेकिन ये जिले भी भीली संस्कृति के रूप में पहचाने जाते हैं।

FolkTrading-newspuranझाबुआ भीलों का केन्द्रीय स्थल है। विन्ध्य की पहाड़ियों में बसा झाबुआ प्रकृति का एक अलग हिस्सा है। नर्मदा के इस पार और उस पार दोनों ओर भील जनजाति का प्रसार है। झाबुआ में प्रकृति ने ऐसा मजाक किया है, जहाँ कोई वन सम्पदा नहीं है, जंगल है ही नहीं। सारी पहाड़ियाँ वृक्ष विहीन हैं। इसके कारण निरन्तर वर्षा की कमी रही है। आज से हजारों वर्ष पूर्व ही भीलों ने वन सम्पदा को समाप्त कर दिया था। नतीजा यह हुआ कि आज भीलों की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति दिनोंदिन बिखरती चली गई। झाबुआ की भौगोलिक स्थिति के कारण भीलों की जीवन पद्धति और उनकी परम्पराओं के निर्वहन पर

विपरीत असर पड़ा है। झाबुआ के आदिवासी गाँव के गाँव छोड़कर काम धन्धे की तलाश में मध्य प्रदेश और प्रदेश से बाहर जाने लगे। झाबुआ के गाँवों की बसाहट पहले ही विरल और एकान्तिक रही है। पलायन के कारण ज्यादा समय भील लोग अपने गाँव-घर से दूर रहने लगे हैं। इस विसंगति से भीलों का मूल जीवन विशृंखलित होता जा रहा है। फिर भी भील एक संस्कृति सम्पन्न जनजाति है। भील जनजाति के लोग कहीं भी रहें, अपनी जीवनशैली, संस्कृति और कला परम्परा से गहरे से जुड़े रहने की भरपूर कोशिश करते हैं।
घर में बैठक की सामने वाली दीवार पर पिथौरा भित्तिचित्र बनाने की परपा् है। श्री मुश्ताक ने लिखा है- 'मध्यप्रदेश में पिठौरा चित्रण की परम्परा झाबुआ, धार, खरगौन, निमाड़ आदि जिलों में देखने को मिलती है, इसका सम्बन्ध उर्वरता और समृद्धि से है। यह परम्परा कब और कैसे प्रारम्भ हुई, इस सम्बन्ध में मतभेट है। कुछ विद्वानों का मत है कि पिठौरा कृषिकर्म से सम्बन्धित अनुष्ठान है और भील एक खेतिहर आदिवासी जाति नहीं, अतः यह परम्परा उनकी मूल परम्परा नहीं है, बल्कि पड़ोसी जाति से कृषिकर्म सीखने के साथ अपनाई गई प्रथा है। जबकि कुछ विद्वान इसे भीलों की मूल परम्परा मानते हैं।

एक मत यह भी है कि पिठौरा चित्रण की परम्परा भीलों में राजपूतों के निकट संपर्क से आई है। ज्योतिन्द्र जैन ने गुजरात के राठ्यों के पिठौरा एवं सृष्टि रचना सम्बन्धी मिथकों का उल्लेख किया है, जिसमें कहा गया है कि छोटा उदयपुर तथा देवगढ़ बरीआ रियासतों के राजपूत राजा अपने महलों में पिठौरा चित्रित करवाते थे। उन्होंने वहाँ के पिठौरा चित्रों पर अनेक राजपूती प्रभाव विहिला किये हैं । वास्तविकता चाहे कुछ भी हो, किन्तु पिठौरा या पिथौरा परम्परा अपनी सम्पूर्ण अनुष्ठानिक महत्ता के साथ आज भी भीलों में प्रचलित है।

पिठौरा चित्रों में स्थानीयता का प्रभाव सबसे ज्यादा है। एक ही जिले के सभी पिठौरा चित्र एक समान हों, यह आवश्यक नहीं है। उनका रूप विधान, बनी हुई आकृतियों का विन्यास, उनके चरित्र तथा उनकी संख्या गाँव से गाँव बदल जाती है। धार जिले से जैसे-जैसे हम गुजरात की ओर बढ़ते जाते हैं - चित्रों में विवरणात्मकता तथा रंगों की चमक और अलंकरण बढ़ता जाता है। यही अन्तर भील और भिलाला अथवा राठवों में बनाये जाने वाले पिठौरा चित्रों में दीखता है। भील पिठौरा अपनी संरचना तथा सादगी में अधिक पुरातन प्रतीत होते हैं, जबकि भिलाला एवं राठवा चित्र ज्यादा विवरणात्मक एवं होते हैं।

झाबुआ के भाबरा गाँव कट्ठीवाड़ा क्षेत्र तक जाते-जाते तो चित्रित किये गये घोड़ों का स्वरूप तथा उनकी चारित्रिक विशेषताएँ ही बदल जाती हैं। भीली क्षेत्र के भगोर इलाके के पिठौरा में चित्रित घोड़े आमने-सामने खड़े बनाये जाते हैं, जबकि राठवा इलाके में यह घोड़े एक दूसरे के पीछे कतारबद्ध चित्रित किये जाते हैं। घोड़ों की संख्या भी चित्रण के लिए उपलब्ध स्थान अनुसार बदल जाती है। पिठौरा पूजा किस प्रकार आरम्भ हुई, इस सम्बन्ध में अधिकांश भील और भिलाला चुप रह जाते हैं। वे सम्बन्धित किंवदन्तियाँ और मिथक या तो भूल चुके हैं या उनकी बहुत धुंधली याद अब उनके पास बची है। गुजरात के राठवा अब भी अपनी मिथक परम्परा को गीतों के रूप में बचाये हुए हैं, परन्तु मध्यप्रदेश भीलों में इनके अनेक अवशेष विभिन्न परिवर्तनों के साथ खण्ड-खण्ड रूप मिलते हैं। जैसे इन्दी राजा और पिठौरा कुँवर आपस में मामा-भानजा हैं, भाबरा गाँव और आसपास के क्षेत्रों में उन्हें भाई-भाई माना जाता कट्ठीवाड़ा वे मामा-भानजा हैं|

किन्तु धार जिले के भिलाला उन्हें बड़ा-छोटा भाई मानते हैं। इसी प्रकार ऐसे अनेक जो गुजरात और उसके सीमावर्ती गाँवों के पिठौरा मिथकों में महत्त्वपूर्ण भूमिका हैं, उनका धार और झाबुआ के इलाकों में कहीं नामोनिशान भी नहीं है।

 


हमारे बारे में

न्‍यूज़ पुराण (PURAN MEDIA GROUP)एक कोशिश है सत्‍य को तथ्‍य के साथ रखने की | आपके जीवन में ज्ञान ,विज्ञान, प्रेरणा , धर्म और आध्‍यात्‍म के प्रकाश के विस्‍तार की |
News Puran is a humble attempt to present the truth with facts. To spread the light of knowledge, promote scientific temper, inspiration, religion and spirituality in your life.


संपर्क करें

0755-3550446 / 9685590481



न्‍यूज़ पुराण



समाचार पत्रिका


श्रेणियाँ