ग्रहों की योगकारक आयुर्वेदिक चिकित्सा

ग्रहों के जन्म से अथवा गोचर से शरीर पर प्रभाव पडता रहता है और उस प्रभाव के कारण या तो शरीर की क्षति होती रहती है या शरीर काम करने के योग्य नही रहता है। जब शरीर ही स्वस्थ नही है तो दिमाग मी स्वस्थ नही रहेगा और मानसिक सोच मे भी बदलाव आजायेगा या तो चिढचिढापन आजायेगा या किसी भी काम को करने का मन नही करेगा अच्छी शिक्षा के बावजूद भी जब समय पर शिक्षा का प्रयोग नही हो पायेगा तो धन और मान सम्मान की कमी बनी रहेगी।
Solar system, illustration
अक्सर यह भी देखा जाता है कि दो कारण एक साथ जीवन मे जवान होने के समय मे उपस्थित होते है पहला कारण अच्छी तरह से कमाई के साधन बनाने के और दूसरे रूप मे जीवन साथी के प्राप्ति के लिये,दोनो कारणो से शरीर मे कोई न कोई व्याधि लगना जरूरी हो जाता है जैसे कमाई के साधनो की प्राप्ति के लिये अधिक दिमाग का और मेहनत का प्रयोग किया जाना वही जीवन साथी और उम्र के चढाव के साथ कामसुख की प्राप्ति के लिये सहसवास आदि से शरीर के सूर्य रूपी वीर्य या रज का नष्ट होने लगना कुछ समय तो यह हालत सम्भाल कर रखी जा सकती है लेकिन अधिक समय तक इसे सम्भालना भी दिक्कत देने वाला होता है इसी कारण से अक्सर धन की प्राप्ति तो हो सकती है वह भी अगर पहले से कोई पारिवारिक या व्यक्तिगत सहायता मिली हुयी है और नही मिली है तो पारिवारिक जीवन भी खतरे मे होता है धन कमाने का कारण भी दिक्कत देने लगता है जीवन साथी से बिगडने लगती है और अक्सर यह कारण संतानहीनता के लिये भी देखे जाते है। 

इन सबके लिये शरीर का सही रहना जरूरी होता है,शरीर को सम्भाल कर रखने के लिये और मानसिक शांति के लिये लोग कई प्रकार के नशे की आदतो मे भी चले जाते है वे समझते है कि उनकी मानसिक शांति अमुक नशा करने से प्राप्त होती है लेकिन उन्हे यह पता नही होता है नशा कोई भी अपना घर अगर शरीर के अन्दर बना लेता है तो वह आगे जाकर आदी बना देता है बजाय लाभ के वह हानि देने लगता है आदि बाते भी पैदा होती है। ग्रहो से सहायता लेकर अगर सभी ग्रहों की मिश्रित चिकित्सा की जाती रहे तो ग्रह अपने अनुसार बल नही देंगे तब भी शरीर के अन्दर उस ग्रह की उपस्थिति होने से खराब कारण पैदा करने वाला ग्रह भी अपनी शक्ति से शरीर और मन के साथ बुद्धि को खराब नही होने देगा।
मैने अपने अनुसार जो आयुर्वेदिक रूप ग्रहों के लिये प्रयोग मे लिया है उसके अनुसार पुराने समय के बीमार सिर के रोगी संतान हीन लोग ह्रदय और सांस के मरीज पेट की पाचन क्रिया से ग्रसित लोग कमजोरी से अंगो के प्रभाव मे नही रहने से अपंगता वाले लोग अपने वास्तविक जीवन मे लौटते देखे है। जब कोई भी आयुर्वेदिक दवाई का लिया जाना होता है तो पहले किसी भी प्रकार के नशे की लत को छोडना जरूरी होता है तामसी भोजन से भी बचना होता है जैसे अधिक खटाई मिठाई चरपरी चीजे त्यागनी होती है। इस आयुर्वेदिक चिकित्सा का प्रयोग करने से पहले यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि किसी प्रकार से अन्य औषिधि जो डाक्टरो के द्वारा दी जा रही है,उसके साथ लेने से और भी दिक्कत हो सकती है साथ ही अगर पास मे कोई आयुर्वेदिक चिकित्सा का केन्द्र है या कोई वैद्य है तो उससे भी इस चिकित्सा के लिये परामर्श लेना जरूरी है।
हमेशा शरीर को स्वस्थ रखने के लिये आयुर्वेदिक चिकित्सा का नुस्खा
ग्रहों की रश्मियों के बिना वनस्पति भी अपने अनुसार नही उग सकती है,वनस्पति को पैदा करने मे ग्रहों का भी बहुत बडा योगदान है,जैसे सूर्य की अच्छी स्थिति मे ही गेंहू की पैदावार होती है,जब सूर्य पर किसी शत्रु ग्रह की छाया होती है या साथ होता है तो फ़सल मे किसी न किसी प्रकार की दिक्कत आजाती है,इसके अलावा भी शनि चने का कारक है और चना तभी सही रूप से पैदा हो पाता है जब जमीन मे नमी हो लेकिन बारिस ऊपरी कम हो अगर शनि की फ़सल मे पानी की अधिक मात्रा का प्रयोग कर दिया जाता है तो फ़सल मे पैदावार कम हो जाती है उसी प्रकार से चन्द्रमा की फ़सल चावल के समय मे अगर राहु का प्रकोप चन्द्रमा पर अधिक हो या किसी प्रकार से दु:स्थान पर हो तो फ़सल मे कीडे लग जाते है या खाद आदि के प्रयोग से फ़सल जल जाती है या कम हो जाती है इसके अलावा राहु की अधिकता होने पर जैसे कर्क के राहु मे चावल की पैदावार कम होती है लेकिन चावल के पुआल की मात्रा बढ जाती है। शरीर मे सभी प्रकार के ग्रहो के तत्वो को पूरा करने के लिये आयुर्वेद मे जडी बूटियों का प्रयोग किया जाता है।

यह नुस्खा इस प्रकार से है:

  1. दक्षिणी गोखुरू (सूर्य बुध राहु) १०० ग्राम
  2. असगंध (शनि केतु) १०० ग्राम
  3. शुद्ध कौंच (गुरु शनि) १०० ग्रम
  4. शतावरी (मंगल गुरु) १०० ग्राम
  5. बिदारी कंद (चन्द्र शनि) १०० ग्राम
  6. सतगिलोय (राहु मंगल) १२५ ग्राम
  7. चित्रक की छाल (मंगल शनि) ३० ग्राम
  8. तिल काले (शनि केतु) १०० ग्राम
  9. मिश्री (चन्द्र मंगल) ४५० ग्राम
  10. शहद (चौथा मंगल) २२५ ग्राम
  11. गाय का घी (शुक्र राहु) १२५ ग्राम
  12. काली मूसली (अष्टम शनि चन्द्र) १०० ग्राम
  13. सफ़ेद मूसली (चौथा चन्द्र शनि) १०० ग्राम
  14. खरैंटी (राहु गुरु) १०० ग्राम
  15. तालमखाना (अष्टम चन्द्र शुक्र) १०० ग्राम
  16. मकरध्वज (बारहवां मंगल) ५ ग्राम
  17. प्रवाल पिष्टी (लगन का मंगल) २० ग्राम
  18. बसंत कुसुमाकर (बुध शनि केतु) २० ग्राम
इन अठारह जडी बूटियों को साफ़ सफ़ाई से पीस कर आटा चालने वाली छलनी से बडी परात में छान कर मिला लेना चाहिये बाद में घी और शहद को मिला लेना चाहिये,इन्हे मिलाकर किसी साफ़ स्टील के बडे बर्तम मे रख लेना चाहिये। यह दवाई किसी भी उम्र के लिये अत्यन्त फ़ायदे वाली है,बच्चों के दिमागी रूप से कमजोर होने पर दी जा सकती है जिन बच्चो की आंखो की कमजोरी है याददास्त कमजोर है उन्हे भी दी जा सकती है। चिन्ता करने वाले लोग भी इसे प्रयोग मे लाकर दिमागी काम कर सकते है नि:सन्तान लोग भी इस दवाई के लगातार प्रयोग से संतान को प्राप्त कर सकते है,जिनके जननांग मे कमजोरी है और वे सन्तान पैदा करने मे असमर्थ है वे लोग रोजाना सुबह शाम को डाबर का सांडे का तेल और मल्ल तेल मिलाकर जननांग पर चार बूंद मालिस करते रहे तो जननांग की कमजोरी मे फ़ायदा होता है। दिमागी काम करने वाले लोग इसे लेते रहे तो किसी भी प्रकार के दिमागी काम मे उनकी उन्नति देखी जा सकती है। 

इस दवाई को बच्चे आधा चम्मच फ़ीके गुनगुने दूध के साथ ले सकते है,बडे लोग एक चम्मच फ़ीके गुनगुने दूध के साथ तथा बुजुर्ग लोग डेढ चम्मच फ़ीके दूध गुनगुने दूध के साथ ले सकते है। इस दवाई के लेने के समय मे युवा लोग मैथुन आदि से एक महिने दूरी रखे,बुजुर्गों के घुटनों का दर्द पीठ का दर्द मास पेशियों का दर्द सभी मे यह रामबाण औषिधि की तरह से काम करती है। जिन लोगो के द्वारा इस दवाई को नही बनाया जा सकता है या सामान नही मिलता है वह मुझे ईमेल से लिख सकते है ।
रामेन्द्र सिंह

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