गांवों में आबादी भूमि पर मालिकाना हक: काम जारी, और भी हैं चुनौतियाँ| 

गांवों में आबादी भूमि पर मालिकाना हक: काम जारी, और भी हैं चुनौतियाँ|
गांवों में आबादी भूमि पर मालिकाना हक: काम जारी, और भी हैं चुनौतियाँ| 

Unique villages in India

गांवों में आबादी भूमि पर रहने वालों का सर्वे कर उन्हें जमीन का मालिकाना हक देने का काम जारी

सर्वे के डाटाबेस से पंचायत स्तर पर संपत्ति रजिस्टर तैयार करने में प्रदेश आगे| 

MP में हरदा जिला PM स्वामित्व योजना अंतर्गत ग्रामीणों को आबादी का मालिकाना हक प्रदान करने सम्बन्धी सभी आवश्यक दस्तावेज वितरण के लिए तैयार तैयार करने वाला देश का प्रथम जिला  बन गया है|

मध्य प्रदेश सरकार ने  प्रदेश के गांवों की आबादी भूमि का सर्वे करने और एक-एक इंच भूमि का व्यवस्थित सीमांकनव रिकॉर्ड तैयार करने की दिशा में कदम उठाया है। इसके लिए भू-राजस्व संहिता में संशोधन किया जा रहा है, साथ ही गांवों के व्यवस्थित नक्शे बनाए जा रहे हैं। सभी भूमि का मालिकाना हक भी रिकॉर्ड में दर्ज होगा।

गांवों में शासकीय और निजी भूमि का अस्पष्ट सीमांकन व मालिकाना हक भू-अभिलेख में साफ दर्ज नहीं होने के कारण दशकों से भूमि विवाद होते आ रहे हैं। गरीब किसान, मजदूर और हर वर्ग के ग्रामीण लोग अपने मालिकाना हक की जमीन के भी सही कागजात और रजिस्ट्री न होने पर या सरकारी रिकॉर्ड में अपडेट जानकारी नहीं होने के कारण बरसों परेशान होते हैं। गांवों में पटवारी तहसीलदार का रिकॉर्ड ही वैध प्रमाण होता है। ऐसे में उनकी मनमानी भी चलती है। पैसे लेकर भू-अभिलेख में गलत मालिकाना हक या दूसरी जानकारी दर्ज करने के मामले अक्सर सामने आते ही हैं। मामला कोर्ट कचहरी में पहुंच जाए, तो गरीब लोग जिनके पास पैसा नहीं होता, वे बर्बाद हो जाते हैं। न्यायालय भी पहली नजर में पटवारी के भू-रिकॉर्ड को ही सही मानता है। ऐसे में मुकदमेबाजी दशकों चलती है और पैसा खर्च होने पर भी फैसला नहीं। होता। विवाद झगड़े, मार-पीट से होता हुआ कई बार हत्या तक पहुंच जाता है। ऐसे में जो कमजोर होता है, वो अगर सही भी है, तो भी हारता है। 

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उसकी भूमि के साथ उसकी व परिवार की जान तक चली जाती है। बाहुबली जीत जाते हैं। गांवों में भूमि विवादों की एक और बड़ी वजह रास्ते और गलियां होती हैं। कच्ची पगडंडियां होने के कारण अक्सर रास्ते निजी खेतों में से या सरकारी जमीन में से निकलते हैं। जब संबंधित भूमि का स्वामी इस पर आपत्ति जताता है और रास्ता बंद करता है, 'खून-खराबे की नौबत आ जाती है। ग्रामीण लोग दस्तावेजों की बारीकियां नहीं समझते और भूमि मालिक भी स्पष्ट रिकॉर्ड के अभाव में अपना पक्ष कानूनन नहीं रख पाता। ऐसे में विवाद बड़ा रूप ले लेता है। गांवों में लावारिस पड़ी शासकीय व निजी भूमि भी अक्सर अतिक्रमण और कब्जे का शिकार होती है। इन तमाम स्थितियों में भूमि का सर्वे और व्यवस्थित रिकॉर्ड होने से सबकुछ आधिकारिक हो जाएगा। 

ग्रामीणों के लिए जमीन बेचना-खरीदना आसान होगा। धोखे की संभावना न्यूनतम हो जाएगी और बेचवाल को जमीन का मूल्य सही मिलेगा। गांवों में जिनके पास जमीन हैं, किंतु सारे वैध दस्तावेज नहीं हैं, उन्हें बैंक से ऋण लेने में भी दिक्कत का सामना करना पड़ता है। नई पहल से ऋण लेने में आसानी होगी। किंतु ग्रामीण आबादी भूमि का सर्वे बेहद चुनौतीपूर्ण और बड़ा कदम है। इसमें जीपीएस सहित उपलब्ध अन्य टेक्नोलॉजी का भी इस्तेमाल किया जाना चाहिए। भूमि अधिकार दर्ज करने से पहले हर पक्ष के दावे-आपत्तियों का निराकरण करना होगा। ये राजस्व विभाग के लिहाज से एक क्रांतिकारी कदम है और इस पर आगे बढ़ना ही होगा ।

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पहले चरण में प्रदेश के 10 जिलों के 10553 गांवों में सर्वे 

PM नरेंद्र मोदी ने इतिहास में पहली बार ग्रामीणों को उनकी आबादी भूमि में मालिकाना हक देने के लिए स्वामित्व योजना शुरू(PM Swamitva Yojana MP) की । 

पहले चरण में खरगोन सहित 10 जिले

योजना के पहले साल में भोपाल, मुरैना, श्योपुर, सागर, शहडोल, खरगोन, विदिशा, सीहोर, हरदा और डिंडोरी जिले शामिल किए गए । यहां सर्वे का कार्य थ्री फेज़ में किया जा रहा है । बाकी जिलों में दूसरे व तीसरे साल  सर्वे किया जाएगा। सर्वे में उन्हीं को शामिल किया गया है जो 25 सितंबर 2018 को आबादी भूमि पर काबिज थे या जिन्हें इस तारीख के बाद आबादी भूमि में भूखंड का आवंटन किया गया हो। 



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