राजनितिक दल देश की संपत्ति हैं, अब इन्हें जनता के हाथों में सौंप दो…….अतुल विनोद 

राजनितिक दल देश की संपत्ति है, अब इन्हें जनता के हाथों में सौंप दो.. अतुल विनोद 
देश का कोई भी राजनीतिक दल किसी परिवार, व्यक्ति, या संस्था की बपौती नहीं| देश का प्रत्येक राजनीतिक दल इस देश की संपत्ति है| 

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भले ही किसी दल का नेतृत्व कुछ खास नेता करते हैं| लेकिन उस दल को बनाने में इस देश की जनता का खून पसीना लगा होता है| इस देश की जनता से ही निकले लोग इन राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता बनते हैं| जनता के तन, मन, धन से दिए गए समर्थन के कारण ही कोई राजनीतिक दल अस्तित्व में आता है|

इन दलों को सत्ता कौन देता है? इन दलों को आधार कौन देता है? यह किस के बलबूते पर खड़े होते हैं?

एक राजनीतिक दल को खड़ा करने में एक नहीं देश की कई पीढ़ियां अपना सर्वस्व लगा देती हैं| राजनीतिक दलों को खाद पानी देने वाली जनता खाली हाथ रह जाती है, लेकिन इसके माध्यम से सत्ता की मलाई खाने वाले राजनेता निजी स्वार्थ और महत्वाकांक्षा के लिए अपनी ही पार्टी को “खाने” लग जाते हैं| ये “घुन” बन जाते हैं| 

एक वृक्ष बड़ा होता है तो अनेक लोगों को फल देता है| हर वृक्ष में बहार भी आती है और पतझड़ भी| अखिल भारतीय कांग्रेस भी सियासत का एक वृक्ष है| भारत का यह पुराना सियासी वृक्ष न जाने कितने नेताओं को मीठे मीठे फल दे चुका है| दुर्भाग्य रहा कि इस दल के फल खाने में तो सभी आगे रहे लेकिन इससे फलदार बनाने के लिए खाद और पानी देने में किसी का ध्यान ना रहा|

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आज कांग्रेस वह वृक्ष हो गई है जिसके फल तोड़ने को सब तैयार हैं लेकिन इसकी खोखली होती जड़ों को खींचने में किसी की रुचि नहीं है| क्या इस दौर में जनता मूकदर्शक बनी रहे? क्या गाँधी परिवार के भरोसे पार्टी छोड़ कर जनता हाथ पर हाथ धरी बैठी रहे? मौजूदा दौर और व्यवस्था में कांग्रेस में वरिष्ठ नेताओं की नहीं चल रही तो वर्कर्स और जनता की क्या चलेगी!

कांग्रेस हो या बीजेपी, देश के हर घर परिवार के किसी ना किसी सदस्य या पीढ़ियों ने इनमे योगदान दिया है| और वोट के रूप में तो सभी इनमें किसी न किसी रूप में भागीदार हैं| इन्हें चन्दा देने वाले भी देश के आम नागरिक हैं| 

सवाल ये है कि भारत में रजनीतिक दलों में जनभागीदारी क्यों नहीं है? आज कांग्रेस तो कल बीजेपी मनमानियों का शिकार होगी? जनता का क्या जो इन्हें बनाने बढाने में अपना योगदान देती है? दुनिया के कई देशों में उम्मीदवारों के चयन में राजनितिक दलों को जनता की राय लेनी होती है| 

भारत में ये दल अपने उम्मीदवार थोपते हैं| रायशुमारी नाम भर के लिए होती है| पार्टी पदाधिकारी तो उपर ही तय कर लिए जाते हैं आंतरिक लोकतंत्र भी नाममात्र का होता है| 

कांग्रेस को ही लें..

इस वृक्ष को बड़ा करने में राजनीतिक व्यक्तियों का बहुत ज्यादा योगदान नहीं है| योगदान तो उनका है जिन्होंने आँख बंद कर दशकों तक हाथ के पंजे को मुहर लगाईं| राजनीतिक लोगों ने तो इस वृक्ष के फल खाने में रुचि ली है| लेकिन इसे बड़ा करने में हिन्दुस्तान की जनता ने जो योगदान दिया है उसे भुलाया नहीं जा सकता|

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कांग्रेस की तमाम ऐतिहासिक भूलों के बावजूद भी भारत की जनता ने इसे मरने नहीं दिया, इसे जीवित रखा और निश्चित अंतराल के बाद राज्यों के साथ-साथ देश की सत्ता में फिर-फिर बैठाया| सीधी सी बात है कांग्रेस गांधी परिवार या अन्य वरिष्ठ नेताओं की बपौती नहीं है| इसी तरह अन्य दल भी किसी की प्राइवेट प्रॉपर्टी नहीं| कांग्रेस हो या अन्य राजनीतिक दल वह जनता की प्रॉपर्टी हैं| 

आज जन मानस में चिंता कांग्रेस को लेकर है भले वो किसी अन्य दल के प्रति झुकाव रखते हैं लेकिन कांग्रेस में उनका इंटरेस्ट कम नहीं है| उनके परिवार के किसी न किसी व्यक्ति ने पार्टी वर्कर या वोटर बनकर इस पार्टी को सींचा है| 

आज जनता कांग्रेस की हालत देखकर दुखी है| कांग्रेस का ग्रह युद्ध चर्चा का विषय बना हुआ है| इस दल को खड़ा करने वाली जनता का इसके निर्णयों में कोई दखल नहीं है| और तो और गांधी परिवार को छोड़कर आम जनता से आने वाला कोई नेता इस दल का अध्यक्ष भी नहीं बन सकता|

यही हाल अन्य दलों में भी है| वे अछूते नहीं हैं| कोई किसी एक परिवार की संपत्ति बन गयी है तो कोई किसी संगठन या विचारधारा की| क्या वाकई भारत के राजनितिक दल आपनी मर्जी के मालिक हैं? यदि ऐसा है तो क्या जनता को अब ऐसे विकल्प पर विचार करना चाहिए जिसमे सब कुछ तय होने में उनकी प्रत्यक्ष भूमिका हो| प्रतिनिधि व्यवस्था से तो वो पूरी तरह इनके आंतरिक मसलों में दखल देने में असहाय है| 

आज कांग्रेस को लेकर तमाम तरह की चिंताएं जाहिर की जा रही हैं| कोई कहता है कि कांग्रेस अपने अंतिम दौर में चल रही है तो कोई कह रहा है कि कांग्रेस दुर्गति के उस हाल में पहुंचने जा रही है जहां से वापस आना मुमकिन नहीं होगा| 

राहुल और प्रियंका की जोड़ी पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं| जब भी कांग्रेस में कलह होती है इस तरह के आर्टिकल्स की बाढ़ आ जाती है जो कांग्रेस के पतन की भविष्यवाणी करते हैं| पर क्यों उस पार्टी का पतन होना चाहिए जो राष्ट्र की धरोहर है? 

सोनिया गांधी कांग्रेस की कमान संभाल रही है| लेकिन राहुल और प्रियंका मिलकर पार्टी के निर्णय ले रहे हैं| पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, झारखंड में पार्टी सत्ता में है| महाराष्ट्र, झारखंड में पार्टी की भूमिका पहले नंबर की नहीं है| पांच राज्यों में चुनाव होने हैं| इनके साथ कांग्रेस मोदी के 10 साल के शासन काल के बाद फिर से सत्ता में आने का सपना देख रही है| 

बाहर के दुश्मनों से तो आसानी से निपटा जा सकता है लेकिन अंदर हलचल मची हो तो बाहर कैसे लड़ा जाए| पेट में गैस हो रही हो तो माथा गर्म होते देर नहीं लगती और अंदर सब कुछ ठीक ना हो तो बाहर कुछ करना सुहाता नहीं| जब तक हम बाहर के दुश्मनों से खुलकर पूरी ताकत से मुकाबला नहीं करते तब तक युद्ध में जीतना नामुमकिन होता है|

जब हम चढ़ाई पर चढ़ते हैं तो हमें पूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ना होता है, बर्डन कम से कम रखना होता है, जरूरी सामान की हम रख सकते हैं, लेकिन यदि हमारे ऊपर बहुत अधिक बोझ है तो हम नहीं चढ़ सकते| शिखर पर झंडा फहराने की बात तो बहुत दूर की बात है| कांग्रेस की हालत इस तरह की है| चलना मुश्किल हो रहा है| केंद्रीय नेतृत्व को लेकर संशय बना हुआ है| राहुल प्रियंका लीड रोल में हैं| सोनिया बैठकों से दूर हैं|

राहुल गांधी बीजेपी सरकार पर हमला करते हैं लेकिन पार्टी के लोग राहुल गांधी पर हमला करते हैं| प्रियंका गांधी राहुल का साथ देती नजर आती है लेकिन यह तीनों लोग मिलकर भी पार्टी के कुनबे को बनाए रखने में नाकाम साबित हो रहे हैं|

हेमंत विश्वा शर्मा, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, सुष्मिता देव, गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री लुईजिन्हो फालेरयो, ललितेश त्रिपाठी, अभिजीत मुखर्जी तक कई चेहरे बाहर जा चुके हैं| अमरिंदर सिंह बाहर होने की तैयारी में हैं| बुजुर्ग और अनुभवी नेता नाराज हैं|

राहुल और प्रियंका के बोल्ड फैसले आलोचना का सबब बन रहे हैं| राजस्थान में गहलोत बनाम पायलट का विवाद थम नहीं रहा| ना तो अनुभवी नेता संभल रहे ना युवा नेता रुक रहे| जी-23 नेताओं की बगावत थमती नहीं| पंजाब राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सरकारें ठीक से चलती नहीं| महाराष्ट्र झारखंड में मनमुटाव है| कैप्टन को बाहर करते हैं फिर भी सिद्धू नाराज हो जाते हैं| सिद्धू को संभालते हैं तो कैप्टन नाराज हो जाते हैं| मतभेदों की कोई सीमा नहीं| चारों तरफ खतरे की घंटी बज रही है| लेकिन कांग्रेस के समर्थक मानते हैं कि कांग्रेस ने ऐसे कई दौर देखे हैं|

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी. सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा.

कांग्रेसियों को लगता है कि कांग्रेस की हस्ती मिट नहीं सकती| कितने गृहयुद्ध हो जाएं, कितनी सियासती चाय उबल जाए, कांग्रेस बची रहेगी, कांग्रेस बनी रहेगी और जनता के दम पर सत्ता के सिंहासन पर बैठ जाएगी|

सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस बर्बाद हो जाएगी, सवाल यह है कि कांग्रेस कैसे चलेगी? यह सवाल जरूरी है, कांग्रेस देश की सबसे बड़ी पार्टी में से एक है| इसे भारत ने तन मन धन से सींचा है| ये गांधी नेहरु की पार्टी नहीं है, ये देश की करोड़ों-करोड़ नागरिकों की पार्टी हैं|  

आज देश को नरेंद्र मोदी की सरकार चला रही है, लेकिन कांग्रेस ने भी देश को लंबे समय तक चलाया है, कांग्रेस ने देश को चलाया है इसलिए क्योंकि जनता ने कांग्रेस को चलाया है| 

सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष हैं लेकिन “अध्यक्ष” का अता पता नहीं है| निर्णय शायद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी लेते हैं| जिम्मेदारी तय नहीं है| केंद्रीय नेतृत्व को कमजोर बताया जा रहा है| पार्टी में कार्यकर्ताओं का मनोबल गिर रहा है| नेतृत्व पर सवाल पर सवाल खड़े हो रहे हैं|

पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने ट्वीट कर कहते हैं- मैं असहाय महसूस करता हूं जब हम पार्टी के भीतर सार्थक संवाद आरंभ नहीं कर सकते। मैं उस वक्त भी आहत और असहाय महसूस करता हूं जब कांग्रेस कार्यकर्ताओं की ओर से अपने एक साथी और सांसद के आवास के बाहर नारेबाजी किए जाने की तस्वीर देखता हूं। लगता है कि भलाई इसी में है कि व्यक्ति चुप्पी साध कर रखे।’

पी चिदंबरम का यह ट्वीट कांग्रेस के अंदर व्याप्त होती जा रही घोर निराशा को अभिव्यक्त करता है| ऐसे में संगठन में बदलाव की मांग जोर पकड़ रही है| खामियां ऐसी है कि आमूलचूल बदलाव की मांग हो रही है| राहुल गांधी निशाने पर हैं, लेकिन विकल्प की तलाश हो नहीं सकती क्योंकि कांग्रेस में गांधी परिवार के अलावा किसी और के हाथ शायद ही नेतृत्व जा पाए|

लोकतंत्र में पार्टियों को खड़ा करने वाली जनता को पार्टियों की दुर्दशा पर बोलने का अधिकार नहीं| जिस पार्टी को जनता खड़ी करती है उसमें यदि कुछ ठीक नहीं हो रहा तो क्या जनता को यह हक नहीं कि वह उस पार्टी में बदलाव के लिए सुझाव दे सके?

क्या कांग्रेस ऐतिहासिक पहल कर सकती है जिसमें जनता उसके अध्यक्ष को लेकर निर्णय दे| जिसमें जनता के मत के आधार पर संगठन का नए सिरे से गठन हो| 

आज जरूरत इस बात की है कि कांग्रेस बिना चुनाव के जनमत के आधार पर अपना पुनर्गठन करें और अपने उद्देश्यों की ओर लौटे|

आज हामरे देश के राजनितिक सिस्टम को बदलने की ज़रूरत है| पार्टियों के उम्मीदवार के चयन से लेकर संगठन के गठन में जनता की सीधी भागीदारी अब वक्त की मांग है| 

अतुल विनोद 




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