प्रधानमंत्री ने “भय” की बात क्यों कही -दिनेश मालवीय

प्रधानमंत्री ने “भय” की बात क्यों कही

-दिनेश मालवीय

मेरे एक अतिबौद्धिक मित्र ने मुझसे पूछा कि श्रीराम मंदिर के भूमि-पूजन के अवसर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में अनेक बहुत महत्वपूर्ण बातों के साथ रामचरित मानस के दोहे की एक पंक्ति- “भय बिन होई न प्रीत” की बात क्यों कही? आखिर वह किसे भयभीत करना चाहते हैं? उनका इससे क्या तात्पर्य है.

मैंने उन्हें बताया कि वह किसी को भयभीत करना नहीं चाहते. किसी को भयभीत करना भारत की संस्कृति ही नहीं है. इसके अलावा भयभीत वो लोग ही करते हैं, जो कमजोर होते हैं. शक्तिशाली लोग किसी को नहीं डरते और न किसीसे डरते. इस भाषण में प्रधानमंत्री का आशय शक्तिशाली होने और अपनी शक्ति को लगातार बढाने से है. उनका आशय इतना ही है कि हम इतने शक्तिशाली बनें कि कोई हम पर आँख उठाकर भी देखने का सहस नहीं करा सके.

संत तुलसीदास ने यह दोहा तब कहा जब तीन दिन तक श्रीराम ने समुद्र से रास्ता देने की प्रार्थना की और उसने कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया. भगवान ने अपने भाई लक्ष्मण से कहा कि- “मेरा धनुष-वाण लेकर आओ. मैं अग्निवाण से समुद्र को सुखा दूंगा. शठ के साथ विनय, कुटिल के साथ प्रीति, स्वाभाविक रूप से कृपण के साथ सुन्दर नीति,ममता से ग्रसितव्यक्ति के साथ ज्ञान की बात और बहुत लोभी के साथ वैराग्य की बात करना वैसा ही है, जैसे ऊसर भूमि में बीज बोना.” यानी इन सभी बातों का कोई असर नहीं होता.

एक बात और विशेष यह है कि यह तुलसीदास द्वारा “प्रीति” शब्द का प्रयोग व्यंग्य में किया गया है.

हमारे देश की युगों-युगों से यह नीति रही है कि हमारे किसी राजा ने बहुत शक्तिशाली होते हुए भी कभी किसी देश पर अपनी तरफ से आक्रमण नहीं किया, किसी की भूमि या आजादी छीनने का प्रयास नहीं किया, किसी को बलात धर्म बदलने के लिए मजबूर नहीं किया, किसी पर कोई धर्म या कोई नियम थोपने का प्रयत्न नहीं किया. किसी के धर्म स्थानों को नुकसान नहीं पहुँचाया. खुद पर आक्रमण होने पर आक्रमणकारी को जबाव अवश्य दिया.

आज भारत चारों तरफ ऐसे देशों से घिरा हुआ है, जिनमें से अधिकतर हमारे प्रति शत्रुता का भाव रखते हैं. इन्हीं प्रधानमंत्री ने बार-बार इन देशों से कहा है कि हम एक-दूसरे से लड़ने की बजाय गरीबी, अशिक्षा और पिछड़ेपन से मिलकर लड़ें. लेकिन विस्तारवादी शक्तियों की शय होने से उनपर इसका कोई असर नहीं हुआ. वे हमारे खिलाफ लगातार षडयंत्रकर रहे हैं या उनमें शामिल हो रहे हैं.

ऐसी स्थिति में हमारे पास एक ही विकल्प है कि हम अपनी शक्ति को लगातार बढाते जाएँ, ताकि कोई हमसे हिमाकत करने की बात सोच भी नहीं सके. इतिहास इस बात का गवाह है किहम जब भी कमज़ोर हुए, तभी गुलाम हुए.

राजा तोरमाण के बाद ग्यारहवीं शताब्दी तक पाँच सौ साल भारत एक ऐसी अजीबो गरीब हालत में रहा जो किसी भी देश के लिए घातक ही हो सकती है. हमारी राष्ट्रीय एकता और शक्ति के अभाव में मुट्ठीभर अंग्रेज आकर हमें हमारे ही देश में गुलाम बना कर ढाई सौ साल तक हम पर राज करते रहे.

शक्ति से तात्पर्य सिर्फ सैन्य शक्ति से नहीं है. इसका अर्थ आर्थिक और  सामाजिक शक्ति से भी है. हमारा समाज यदि जाति, धर्म, वर्ग या किसी अन्य आधार पर विभाजित रहा तो वह कमजोर ही होगा, जिसका लाभ हमारे शत्रु लगातार उठाते रहेंगे. लिहाजा हमें इन क्षेत्रों में भी शक्तिशाली रहना होगा.

आज भारत में ऐसी ताकतें सक्रिय हैं जो बहुत योजनाबद्ध तरीके से इतिहास की घटनाओं को अपनी तरह से तोड़-मरोड़कर हमारे सामाजिक ताने-बाने को नष्ट कर हमें एक राष्ट्र के रूप में मजबूत नहीं होने देना चाहतीं. कई तरह के प्रोपोगंडा किये जा रहे हैं. कई तरह की मनगढ़ंत बातें फैलाई जा रही हैं. कई तरह की छोटी-मोटी विकृतियों को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जा रहा है. शास्त्रों में कही बातों को सन्दर्भ से हटकर प्रस्तुत कर समाज के बीच नफरत की खाई पैदा की जा रही है.

इस बात को याद रखा जाना चाहिए किजो समाज अपने इतिहास को भूल जाता है, उसका कोई भविष्य नहीं होता. आज हम किसी भी तरह की उन स्थितियों को पैदा न होने दें जिनमें हम किसी भी क्षेत्र में कमज़ोर हों. यही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है. किसी बाहरी ताकत से डरने की ज़रुरत नहीं है. हम हर प्रकार से सक्षम हैं. हाँ, लेकिन हम अगर भीतर से कमजोर रहे तो सैन्य शक्ति होते हुए भी हम शत्रु से पूरी ताकत से नहीं लड़ सकेंगे. शत्रु का हमारी सैन्य और आंतरिक ताकत से भयभीत होना बहुत आवश्यक है. प्रधानमंत्री का आशय सिर्फ इतना ही था. इसके अलावा यदि कोई कुछ और अर्थ निकालता है, तो यह उसका दुराग्रह ही है.

आइये, सब लोग मोदीजी की बात को सही सन्दर्भ और परिप्रेक्ष्य में समझकर सभी मिलजुल कर रहें.अपने देश को इतना शक्तिशाली बनाएं और कि बड़ी से बड़ी ताकत हम पर बुरी नज़र डालने की हिमाकत नहीं कर सके.

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