EDITORSeptember 4, 20201min28

हिंदू-भारत की स्तुति : सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्

हिंदू-भारत की स्तुति : सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्

हिंदू-भारत की स्तुति

ए देश भारत! हमारे तुम प्यारे देव, महिमा अपार, तीन लोक से उपर हो;

गोद में तुम्हारी जन्म चाहते समोद सुर, तुम भव सिन्धु से उतारने को तरि हो। काशी में वृषध्वज, पुरी में गरुडध्वज हो; शीश-पदतल में भी धारे सुरसरि हो; है

सुगौर-धाम, श्याम त्यों अमा-से तुम; जान पड़ता है नहीं, हर हो कि हरि हो॥

(२) अमित-महिम हिमगिरिका मुकुट माथ, सागर पखारता चरण लहराता है; हास काशमीर, हीर-हार नदियों की धार, पञ्चनद-रव पाञ्चजन्य-सा सुहाता है।

नव वन माला से अलंकृत विशाल वक्ष, गौरव गदा का लिये विन्ध्य गिरि भाता है

चक्र चित्रभानु, शक्र मस्तक झुकाता सदा, भारत अनूप विष्णु रूप छवि पाता

(३) शारद प्रदेश मुख, अवध-बिहार उर, दायाँ हाथ सिंध, बंग बायाँ हाथ प्यारा है; गंगा-गोमती ने, गंडकी ने, गौतमी ने जिसे निज जलधार-हार देकर सँवारा है। मध्य प्रदेश नाभि देश है सुहाता, कटि किंकिणी समान नर्मदा की अम्बुधारा है; आन्ध्र औ द्रविड, महाराष्ट्र हैं चरण; विश्व-वन्दित अखण्ड यही भारत हमारा है।

(४)  नव घन-मण्डल के भरत कमण्डल मे गङ्गवारि पावस तुम्हें ला नहलाती है; शरद पिन्हाकर प्रफुल्ल पंकज के हार, चन्द्र-रश्मियों के चारु चन्दन चढ़ाती है। पूजती हिमानी हिमबिन्दु-मौक्तिकों से तुम्हें, शिशिर पदों में पत्र-पुष्प बरसाती है; मधु ऋतु आती, मधुरस का लगाती भोग; तप्त ग्रीष्म ऋतु तुम्हें तपसे रिझाती है।

(५) धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष को निधान तू है; चार धाम, सप्त पुरियोंका तू सहारा है;

तू ही मातृभूमि, पितृभूमि और तीर्थंभूमि; तूने कितनोंको यहाँ तारा है, उबारा है।

तू है धर्म-क्षेत्र, तू ही कर्मक्षेत्र भी है; तेरे अङ्कमें अजन्मा प्रभुने भी जन्म धारा है;

वन्दनीय देश! नन्दनन्दनका रूप मान तेरे चरणों में अभिवन्दन हमारा है।

 


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