धर्म का अर्थ तथा व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में उसका महत्व भाग 1

धर्म का अर्थ तथा व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में उसका महत्व भाग 1

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धर्म के सच्चे स्वरूप को न समझ पाने के ही कारण आधुनिक जगत में धर्म के प्रति एक प्रकार से अवहेलना तथा तिरस्कार का वातावरण बन गया है। आम आदमी धर्म के सम्बन्ध में न तो कोई अत्यन्त विचारशील मनोवृत्ति बना पाता है और न ही उसे इस तरह की कोई आवश्यकता ही अनुभव होती है। धर्म उसके लिए महज रिवाजों का परिपालन है। शास्त्रों की आज्ञाओं का अनुकूलन है कुछ निश्चित विधानों का अनुसरण मात्र है । न्यूमेन ने सही लिखा है कि धर्म का सार इस बात में है कि किसी वस्तु को प्रामाणिक माना जाए तथा उसका पूरी तरह अनुसरण किया जाए।

रूढ़ियों का निर्माण धार्मिक ग्रंथों तथा धर्म पुरुषों के देशों का अन्धानुसरण करने से ही होता है। ये आदेश पीढ़ी दर पीढ़ी चलते जाते हैं और इनके प्रारंभिक स्वरूप में विचार को स्फूर्त करने की जो भी क्षमता होती है वह धीरे-धीरे मृतप्रायः होती जाती है। कभी-कभी तो स्थिति यहाँ तक आ जाती है कि इन रूढ़ियों के अन्तर में छिपे विचार न तो धर्म-गुरुओं को प्रोत्साहित कर पाते हैं ना उनके अनुयायियों को । फिर भी अंध विश्वासों का सम्बल इन्हं शक्तिशाली बनाए रखता है। और आज स्थिति यह है कि विश्व का प्रत्येक धर्म इन रूढ़ियों के शिकंजे में ही जी रहा है। हिन्दू धर्म, यहूदी धर्म, ईसाई धर्म, मुस्लिम धर्म, पारसी धर्म, किसी भी धर्म को ले लीजिए, उसमें आप इस रूढ़िवादी अंश को प्रचुर रूप में पायेंगे। धर्मो में जो अनेकतायें तथा विविधतायें हैं उनकी जड़ में यही रूढ़िवादी प्रवृत्ति है।

उदाहरण के लिए एक अच्छे ईसाई के लिए कम से कम प्रति रविवार को गिरजे जाना जरूरी है, एक सच्चे मुसलमान के लिए रमजान का रोज़ा रखना लाजिमी है, एक सच्चे हिन्दू के लिए कोई उपवास या पूजन-अर्चन आवश्यक है।भागवत में लिखा है कि वेद में जो कुछ कहा गया है वह धर्म है उसके विपरीत सब अधर्म है। धर्म-दीपिका लिखती है कि शास्त्र-विहित क्रिया-माध्य गुण का नाम धर्म है : प्रतिपि क्रिया-साध्य गुण का नाम अधर्म है।

जैमिनी सूत्र भी “चोदना लक्षणोयों धर्म (वेद जिसकी घोषणा करें, वह धर्म है) कहकर वेदानुकूल आचरण को ही धर्म का प्रधान लक्षण बनाने का प्रयास करता है। विश्वामित्र स्मृति का कथन है कि आगमवेता आर्यगण जिस कार्य की प्रशंसा करते हैं वह है धर्म तथा जिसकी निन्दा करते हैं. वह है अधर्म । मनुस्मृति में भी वेदों को ही धर्म का मूल कहा गया है (वेदो खिलो धर्म मूलं)। मनु का तो यह कथन भी है कि माता-पिता आदि के आचरण के चरणचिन्हों पर आचरण को ढालना ही धर्म है। धर्म के इस परम्परावादी स्वरूप का स्पष्ट कथन देवल ने किया है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि प्रत्येक देश के देवों तथा द्विजों द्वारा जो आवरणीय कर्म निर्धारित किये जायें वे ही उस देश के धर्म समझे जाने चाहिए।

सामान्य जन समाज में धर्म का वही परम्परा वाटी रूप प्रमुख रूप से मान्यता प्राप्त कर लेता है और इसी आधार पर प्रत्येक व्यक्ति अपने आचरण को निर्धारित करने का आग्रह किया जाता है। धर्म का यह परम्परावादी रूप अंतत्वोगत्वा रूढ़ियों का रूप घारण कर लेता है। धर्म के इस रूढ़िवादी रूप के ही कारण राजनैतिक नेतागण भी सामान्य जनता को भड़काने और अविचारशील उपद्रव तथा संघर्ष करने के लिए तत्पर ही नहीं कर पाते,सफल भी हो जाते हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में इस तरह के उदाहरण अनक मिल सकते हैं। स्वयं पाकिस्तान का जन्म इसी तरह हुआ ।

यह हमारे दैनिक अनुभव की वस्तु है कि कभी-कभी कुछ लोग अपनी वस्तुओं का गलत उपयोग जाने अनजाने रूप से करने लगते हैं। उदाहरण के लिए ऐसे लोगों के विषय में हम कभी-कभी पढ़ते हैं जिन्होंने चाकू या कैची से किसी व्यक्ति का खून कर दिया। ऐसे व्यक्तियों के विषय में भी कभी-कभी पढने को मिल जाता है जिन्होंने अपनी ही धोती से अपना गला घोट डाला। यह बात स्पष्ट है कि चाकू का निर्माण उसके सर्जनात्मक उपयोग के लिए किया गया है। उसका उपयोग सब्जी या फल काटने के लिए या ऐसे ही अच्छे उपयोग के लिए किया जाना चाहिए।

यही बात कैंची और धोती के विषय में भी कही जा सकती है। यदि मानव समाज चाकू, कैंची, या धोती जैसी दृश्य एवं ठोस वस्तुओं का गलत उगा कर सकता है,तो धर्म जैसी सूक्ष्म वस्तु का यदि कोई दुरुपयोग करे तो आश्चर्य ही क्या है जिस प्रकार चाकू या कैंची-धोती का दुरुपयोग उनकी प्रकृति के नितांत प्रतिकूल है, इसी प्रकार धर्म का दुरुपयोग भी उसकी वास्तविक प्रकृति के नितांत प्रतिकूल कहा जा सकता है। व्यक्तियों द्वारा किये गए धर्म के गलत उपयोग के कारण धर्म की आलोचना करने वाले कुछ विद्वानों ने इसको नितान्त अग्रहणीय ही मान लिया। वाल्टेयर ने चर्च तथा पादरियों का मखौल उड़ाया। माक्क्स ने इसे निजी पूंजी को पवित्र करने का शैतानी प्रयास माना। किन्तु धर्म को गलत इसलिए ही मान लिया जाना विवेक हीनता कहलाएगी कि धर्म के अधिकांश मतावलम्बियों ने इसका दुरुपयोग किया और इसकी आंच में अपने गलत अरमानों की खिचड़ी पकाई । धर्म के क्षेत्र में जो गड़बड़ी हुई उसका एक कारण यह भी है कि साधारण व्यक्ति उसके सही रूप को समझ नहीं पाया।


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