राम किसी से शत्रुता नहीं रखते : दिनेश मालवीय

राम किसी से शत्रुता नहीं रखते……..

दिनेश मालवीय
दुश्मन का भी भला चाहते हैं
योद्धा हैं पर युद्धख़ोर नहीं
अंतिम क्षण तक युद्ध टालने का किया प्रयास

मित्रो, इस एपीसोड मे हम भगवान श्रीराम के व्यक्तित्व के एक ऐसे पहलू पर प्रकाश डालेंगे, जिसको समझकर और जीवन मे उतारकर पूरे विश्व का कल्याण हो सकता है।

ज़रा सोचिये कि जिस व्यक्ति ने धर्म और अच्छे लोगों की रक्षा के लिये जीवनभर भयानक राक्षसों से युद्ध कर उन्हें मारा हो,उनके मन मे किसीके भी प्रति शत्रुता का भाव नहीं रहा। वह शत्रुता रखने वालों से शत्रुओं से भी शत्रुता नहीं रखते । अपना अहित करने वालों का भी हित चाहते हैं।

श्रीराम के लिये शास्त्रों मे अनेक विशेषण दिये गये हैं, जैसे खरारि, रावणारि, दूषणारि, दनवारि आदि। लेकिन इन विशेषणों को इसलिए सही कहा जा सकता कि उनका कोई शत्रु भले ही हो, वह किसीको शत्रु नहीं मानते। उनके इस गुण की उनके शत्रु तक प्रशंसा करते हैं।

राम
श्रीराम के जीवन के इस पक्ष को उजागर करने वाले कुछ प्रसंगों की हम चर्चा करेंगे।

लंका युद्ध मे भीषण द्वंद्व युद्ध मे लक्ष्मण के हाथों मेघनाद का वध होता है। उसका कटा हुआ सिर और मृत शरीर वानर रामजी के शिविर मे ले आते हैं। श्रीराम उस अप्रतिम वीर को पूरे सम्मान के साथ रखते हैं। बाद मे शव को वीरोचित सम्मान के साथ वह लंका के द्वार पर रखवाते हैं।

इस बीच मेघनाद की परम सती पत्नी सुलोचना रावण से कहती है कि मुझे कम से कम अपने पति का सिर मिल जाए। 

इस पर रावण कहता है कि तुम राम के शिविर मे जाकर पति का सिर माँग लो

सुलोचना कहती है कि आप मुझे शत्रु के शिविर मे जाने को कह रहे हैं। रावण ने कहा कि उसे शत्रु का शिविर  नहीं माना जा सकता, क्योंकि राम मुझे अपना शत्रु ही नहीं मानते।

देखिये, उस समय के सबसे खूंखार दानवराज रावण तक को श्रीराम के इस महान गुण का अससास था।

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यहाँ तक कि मेघनाद भी श्रीराम के इस गुण को पहचान लिया थी। इसीलिए उसने राम और लक्ष्मण का नाम लेकर प्राण त्यागे।

एक और प्रसंग देखते हैं। भगवान श्रीराम अंतिम समय तक चाहते हैं कि अपने रास्ते से भटक गया महाज्ञानी और तपस्वी रावण अपनी दुर्भावना छोड़ दे। वह सम्मान के साथ सीता को लौटा दे। ऐसी स्थिति मे वह लंका पर आक्रमण नहीं करते और न युद्ध होता।

युद्ध के संहार को टालने के लिये वह बाली के पुत्र अंगद को रावण के दरबार मे शांतिदूत बनाकर भेजते हैं। भेजते समय श्रीराम अंगद से जो कहते हैं, वह श्रीराम के शत्रुता रहित व्यकतित्व को दर्शाता है।

श्रीराम अंगद से कहते हैं कि रावण के साथ ऐसी बातचीत करना, जिससे हमारा काम हो जाये और उसका भी कल्याण हो।

रावण द्वारा सीता का अपहरणकरने जैसा अक्षम्य अपराध  किया गया थख,फिर भी श्रीराम उसका कल्याण चाहते हैं।

श्रीराम बहुत नीतिनिपुण हैं। उन्होंने रावण के पास शांति दूत इसलिए नहीं भेजा था कि उन्हें युद्ध से कोई भय था। उन्होंने इस नीति का पालन किया कि युद्ध अंतिम विकल्प होना चाहिए।

लेकिन वह अहंकारी रावण को यह भी जताना चाहते थे कि उन्हें युद्ध और रावण की शक्ति का कोई भय नहीं है।

लिहाजा श्रीराम ने लंका की चोटी पर स्थित राजमहल मे रासरंग मे डूबे रावण के छत्र मुकुट और मंदोदरी के कर्णफूल को एक ही वाण से काट गिराया।

श्रीराम के इसी स्वभाव को बताने वाली एक बात और है। उनके राजा बनने की पूरी तैयारी हो चुकी थी। ऐन वक्त पर सौतेली माता कैकेई ने षणयंत्र करके  उन्हें राजा नहीं बनने दिया। इतना ही नहीं, उन्हें वनवास भी दे दिया।

लेकिन श्रीराम ने कैकेयी के प्रति कभी शत्रुता का भाव नहीं रखा।उसके साथ हमेशा ऐसा व्यवहार किया कि वह लज्जित महसूस न करे। वह चित्रकूट मे उनसे बहुत अच्छा व्यवहार करते हुए यही कहते हैं कि माँ! आप इस घटनाक्रम के लिये स्वयं को दोषी न मानें, यह विधाता का लेख है।

इसके अलावा वह वनवास से लौटकर सबसे पहले कैकेयी से मिलते हैं। उनके पांव छूकर सबसे पहले उसका आशीर्वाद लेते हैं। वह सारे ख़ुराफ़ात की जड़ मंथरा को भी माफ कर देते हैं।

श्रीराम के इस गुण से यही प्रेरणा मिलती है कि किसी कारणवश किसीसे शत्रुता हो भी जाये, तो मन मे शत्रुता का भाव नहीं रखना चाहिए।

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जय श्रीराम

भगवान श्रीराम के जन्म के समय का अयोध्या नगरी का माहौल

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