राम: भारतीय जनमानस के हृदय सम्राट , जन जन में कैसे बसे हैं राम….

राम

Ram .. settled in the people .. you would not know this glory of Ram?

दाशरथि राम भारतीय जनमानस के हृदय सम्राट हैं। राम" शब्द के अर्थ सुहावना, आनंदप्रद, हर्षदायक. सुंदर, मनोहर आदि किए जाते हैं ।

लगता है कोशकारों ने "राम" शब्द के ये अर्थ श्रीराम में ये गुण देखकर किए हैं या राम में इन गुणों की कामना के लिए उनका नामकरण संस्कार इसी नाम से किया है । राम तो यथा नाम तथा गुण स्वरूप हैं ।

राम को विष्णु का सातवाँ अवतार मानने वाले भक्त उन्हें ईश्वर, भगवान, जगत् नियंता जगतपिता, सर्वज्ञ, सर्व शक्तिमान और इसी प्रकार के सहस्रों नामों से स्मरण और धारण करते हैं।

राम की जनप्रियता का यह प्रमाण है कि अगणित व्यक्तियों के नाम के आदि. मध्य और अंत में 'राम" शब्द सुशोभित है। स्त्री हो या पुरुष दोनों के नाम इस शब्द से मंडित हैं जाने अनजाने में राम नामधारी व्यक्ति को बुलाते समय "राम" नाम स्मरण करने से लोग अपना वह क्षण धन्य समझते हैं ।

कितने ही स्थानों के नाम राम से संपृक्त होकर अपने को स्वनाम धन्य समझते हैं । राम-शिला और राम-गंगा से कौन अपरिचित है राम - गिरि या राम-टेक नागपुर में ऐसे ही रमणीक स्थल हैं जहाँ राम वनवास के समय कुछ समय टिके थे ।

इसके निकट ही रमणीक राम-सागर पवित्र स्नान के लिए प्रसिद्ध है। रामेश्वरम में एक ऊँचे टीले पर स्थित राम झरोखा स्थान कम रमणीक नहीं है जहाँ राम के गंभीर व्यक्तित्व के समान समुद्र भी अविचलित है और जो जनधारणा के अनुसार वह स्थल है जहाँ लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व रामजी रुके थे।

भारत में कितनी ही गिरि-कंदराएँ हैं जो रामरज से पवित्र हुई । चित्रकूट का कामद पर्वत तो इसका साक्षात् प्रमाण जिसकी चट्टानों से ऐसे पत्थर निकलते हैं जिनमें राम के चरणों के समान शंख और चक्र के चिह्नों की झलक मिलती है । रामधाम तो स्वयं साकेत ही है । राम सेतु तो एहलौकिक भी है और पारलौकिक भी।

राम के नाम का प्रसार वनस्पति जगत में भी है। राम केला, राम कौंटा, राम तोरी या राम तोरई. राम तुलसी, रामदास, रामबास, रामभोग आदि शब्द इसके प्रमाण हैं। रामशर एक प्रकार के सरकंडे को कहते हैं। राम-धनुष और रामायण राम की विराटता तथा अचूक तारक शक्ति के प्रमाण हैं। रां रामाय नमः' नामक राम तारक मंत्र रामौषधि ही माना जाता है।

इस मंत्र को राम मंदिर की संज्ञा दी जाती है ।

व्यापारिक क्षेत्र में कितने ही काम राम नाम से आरंभ किए जाते हैं। अन्न आदि तोलते समय पहले तोल को एक न कह कर 'रामा" या 'रामा भाई रामा' कहा जाता है । किसान बैल के कंधे पर जुआ रखते समय राम सुमरता है। कुओं चलाने वाला बारिया राम सुमर कर कुआँ चलाना आरंभ करता है तथा दुर्घटना रहित कार्य सम्पन्न की आशा से राम सुमरता और सुमरवाता या स्मरण करवाता है । भोजन का आरंभ 'राम नाम से किया जाता है । पाटी पूजा के समय विद्यार्थी से पहला शब्द "राम लिखवाया जाता है क्योंकि भक्त प्रहलाद अपने सहपाठियों की पत्तियों पर राम-राम शब्द लिख देते थे ।

राम की व्यापकता और जनप्रियता का एक अन्य उदाण देखिए । श्रावणी या रक्षा बंधन के दिन द्वार के दोनों ओर सोण' चीते या चित्रित किए जाते हैं। इन चीतनों में राम-राम शब्द लिखा जाता है। वास्तव में यह सोण पूजन श्रवण कुमार पूजन है और राम वह शब्द है जो राजा दशरथ द्वारा शब्द - बेधी बाण से बिंध कर श्रवण कुमार के मुख से निकले थे ।

भक्तजन अपना शरीर रामनामी चद्दर से ढाँपकर हाथ में राम सुमरनी लेकर मस्तक पर रामरज धारण करते हैं । रामनवमी धारण करने का उद्देश्य है कि पास से गुजरने वाले व्यक्ति उसे पढ़कर राम नाम उच्चारित करें।

आधुनिक काल में महात्मा गांधी राम धुन सुनकर भाव विभोर हो उठते थे और धीरे-धीरे "राम धुन उनके आश्रमवासियों का नैमित्तिक अंग बन गई ।

महात्मा गांधी की समाधि राजघाट पर अंकित हे राम शब्द इस बात का प्रमाण है कि वे दाशरथि राम के हो गए से और भारत में रामराज्य की स्थापना करना उनकी परम कल्पना थी। राम नाम पर साहित्य और समाज में अनेक मुहावरे और लोकोक्तियाँ प्रचलित हैं ।

राम राम करना' को ही लीजिए ।

इस मुहावरे के कितने ही अर्थ सिद्ध होते हैं-राम के बहुआयामी व्यक्तित्व के समान। एक ओर इसका अर्थ अभिवादन करना, प्रणाम करना, भगवान का नाम जपना है तो दूसरी ओर विदाई लेना, किसी काम को पुनः न करने की शपथ लेना, आश्चर्य प्रकट करना, किसी के कुशलक्षेम की कामना करना, जैसे-तैसे करके कष्ट का समय व्यतीत करना आदि । इसी प्रकार "राम रूठना, रामना, 'राम सुमर ना'. राम नाम का, 'राम नाम पर आदि कितने ही मुहावरे हैं जो दैनिकचर्या और हाट-बाजारों में सुने जा सकते हैं ।

ग्रामीण अंचल में राम खुलना (आकाश से बादल छँटना) राम फट (असाधारण घटना घटित होना). "राम बुलावा आदि अनेक मुहावरे जन-जन की जिह्वा पर हैं ।उन्हें राम की सोंह खाए बिना बात की सत्यता पर विश्वास नहीं होता तथा दुखी व्यक्ति को अपनी राम कहानी सुनाकर ही चैन पड़ता है।किंबहुना, राम के नाम पर छल कपट करने वालों की भी कमी नहीं है। ऐसे व्यक्तियों के नाम पर बगल में छुरी. मुँह में राम' लोकोक्ति समर्पित है। राम नाम जपना, पराया माल अपना कहावत ऐसे लोगों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। मारीचि राम स्मरण द्वारा सीता रूपी समाज की वंचना करने वालों की भी आज कमी नहीं है।

भारत के भक्तों की राम स्मरण की अपनी पद्धति रही है । उनका विश्वास है कि राम देता है तो छप्पर फाड कर देता है । गुरु नानक देव के बारे में प्रसिद्ध है कि जिस समय उन्हें खेत की रखवाली करने भेजा गया तो वे राममय होकर हर वस्तु में राम ही राम देखने लगे और उनके मुँह से निकल पड़ा –

राम जी की चिड़िया रामजी का खेत ।

खाओ चिड़िया भर-भर पेट ।।

उधर धन्ना जाट ने खेत बीजने के लिए प्राप्त अन्न को साधुओं की जमात में बाँट दिया और राम नाम को खेत में बीज दिया उसी बीज से उत्पन्न उनकी रामभक्ति की चर्चा जन-जन के मुख पर है । हर व्यवसायी के राम रटने का अपना-अपना ढंग है हलवाई इन शब्दों के साथ राम स्मरण करता है –

राम नाम लड्डू, गोपाल नाम घी ।

हर का नाम मिसरी तू घोल घोल पी ।।

अब जरा माली की दृष्टि देखिए। वह पेड़-पौधों में राम के दर्शन करता है –

राम नाम का भजन कर फेर भजैगा कब ।

ये हरियाली खड़े सूख जाएँगे तब ।।

जरा दो केवटों की वार्ता का भी आनंद ले लीजिए. एक नदिया पार उतारने वाले हैं तो दूसरे भवसागर । नदी के नाभिक की चतुराई तो देखिए –

नहीं लूँगा नाव उतराई रे । तुम राम हो मेरे भाई रे ।।

मेरा तेरा है उधार, जब आऊँ तेरे द्वार,

करियो बेड़ा मेरा पार,

नहीं लूँगा नाव उतराई रे ।।

भक्त तुलसीदास राम नाम का दीपक जलाने की सीख देते हैं –

राम नाम मणि दीप धरि जीभ देहरी द्वार ।

तुलसी भीतर बाहरो, जो चाहिए उजियार ।।

जुलाहा कबीर अपनी झीनी-झीनी चदरिया को दाग से बचाकर चुपके से राम की बहुरिया बन कर अपने अवगुंठन में आनंदित हो उठते हैं :

राम मेरे पीऊ मैं राम की बहुरिया ।

यदि हम दार्शनिक दृष्टि से देखें तो ज्ञात होगा कि राम का जीवन ही राम-लीला नहीं है अपितु जगत का सारा व्यापार, व्यवहार और विस्तार ही रामलीला है। भारतीय दर्शन अंड में पिंड, पिंड में ब्रह्मांड, व्यष्टि में समष्टि और समष्टि में व्यष्टि को मानने वाला है ऐसी स्थिति में दाशरथि राम सृष्टि का अंश हैं और सृष्टि उनका। यह अंश-अंशी का संबंध मकड़ी के जाले की तरह प्रकट रूप में सगुण है और ऊर्णनाभ द्वारा पुनः समेटे जाने पर निर्गुण या प्रच्छन्न है । चाहे कोई राम के सगुण रूप की उपासना करे चाहे निर्गुण की राम तो राम ही हैं ठीक उस प्रकार जैसे मणि और उसकी आभा, शब्द और अर्थ, वाणी और विचार या कवि और उसकी कल्पना ।


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