भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम क्यों हैं? एक उदाहरण से समझ जायेंगे आप राम क्या हैं ?

भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम क्यों हैं? एक उदाहरण से समझ जायेंगे आप राम क्या हैं ?

भगवान  श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है| मर्यादा का पालन करने में उनके जैसा चरित्र कोई और दिखाई नहीं देता| वह छोटे से छोटे व्यक्ति के अधिकार का सम्मान करते हैं| किसी को हीन या हेय नहीं समझते| रामचरित मानस में प्रसंग आता है कि वह जनकपुर में छोटे भाई लक्ष्मण के साथ अपने गुरु के लिए पुष्प लेने पुष्पवाटिका जाते हैं| तब तुलसीदास ने लिखा है कि

चहुं दिसि चितई पूंछि मालीगन

लगे लेन दल फूल मुदित मन।।

श्रीराम वहां मालियों से पूछ कर पुष्प लेते हैं। कहने को तो इसमें कुछ खास बात नजर हीं आती, लेकिन उनके इस आचरण में एक बड़ी बात छुपी है, जो उनके चरित्र की बहुत बड़ी विशेषता है। यह गुण है उनका आत्मानुशासन (self-discipline) और नीति परायणता (adherence to morality)|

श्री राम चक्रवर्ती सम्राट दशरथ के सबसे बड़े पुत्र थे| एक अन्य चक्रवर्ती राजा जनक के राज अतिथि थे| पूरा जनकपुर उनके रूप, शील और आचरण पर अत्यधिक मोहित था। वह चाहते तो कहीं से भी पुष्प तोड़ लेते, उन्हें रोकने वाला कौन था ? उन्हें यदि राजा का पुत्र होने का गर्व होता तो, वह मालियों जैसे छोटे कर्मचारियों की सहज ही अवहेलना कर सकते थे और इससे मालियों को भी कुछ अस्वाभाविक नहीं लगता। लेकिन तब वह मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं होते।

श्रीराम के चरित्र के आत्मपरायणता के गुण को यदि हम थोड़ा भी जीवन में उतर लें तो हमारा जीवन ऊंचाईयों को छू सकता है|

श्रीराम द्वारा मालियों से अनुमति लेकर पुष्प लेने का कार्य हमें यह शिक्षा देता है कि हम कोई भी हों, कुछ भी हों, हमें अपने आपको नियम और कानून के ऊपर नहीं समझना चाहिए और सभ्यता तथा नीति का पालन हर हालत में करना चाहिए।

हम जरा सी पद-प्रतिष्ठा पाने पर या धन-सम्पत्ति आ जाने पर अपने को बहुत ऊँचा मान कर यह समझने लगते हैं कि हमारे ऊपर कुछ भी नहीं है। घमंड में चूर होकर हम आत्मानुशासन की तो छोड़िये दूसरों के अनुशासन की भी अवहेलना करते हैं। किसी भी संस्था के नियमों और अनुशासन को हम कुछ समझते ही नहीं। उनका उल्लंघन करने में अपनी शान तक समझते हैं।

आज के युग की सबसे बड़ी दुविधा ही यही है कि हर कोई अपने आप को “”कुछ” समझ कर अपने को सब नियम, कायदों, नीति से ऊपर मान रहा है। उसे लगता है कि इस संसार का कोई नियंता या नियामक नहीं है और सब कुछ अराजकता में चल रहा है। लेकिन अगर कोई आत्मानुशासन पाल ले तो उसे विश्व का अनुशासन भी समझ आ जाएगा। उसे समझ आ जाएगा कि “”देयर इज ए सिस्टम इन द मेडनेस”।


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