राम मंदिर : एक सशक्त व गौरवशाली भारत का आधार

 

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अयोध्या में राम मंदिर  का पुनर्निमाण एक सशक्त और गौरवशाली भारत के पुनर्निमाण का आधार बनेगा। यह मंदिर इस बात का प्रमाण है कि जब कोई समाज अपना खोया हुआ गौरव प्राप्त करने के लिए उठ खड़ा होता है तो दुनिया की कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती।

राष्ट्रीयता का गौरव किसी भी देश के लिए एक महत्वपूर्ण प्रेरक तत्व होता है परंतु, विभाजनकारी तुष्टीकरण की राजनीति के कारण भारत की राष्ट्रीयता की परिभाषा भ्रमित कर दी गई थी। अब भारत की राष्ट्रीयता को किसी विदेशी आक्रांता से नहीं जोड़ा जा सकता।

एक विदेशी आक्रांता बाबर द्वारा निर्मित स्मृतियों को ढहा कर राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक भगवान राम का मंदिर बनाने के लिए हिंदू समाज ने निरंतर संघर्ष किए हैं। 1984 से प्रारंभ हुए आंदोलन में तीन लाख से अधिक गांवों के साथ 16 करोड़ राम भक्तों ने भाग लिया। 9 नवंबर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय देने तक यह संघर्ष निरंतर चलता रहा। इस अद्वितीय अभियान का ही परिणाम था कि राष्ट्रीय शर्म का प्रतीक बाबरी ढांचा 6 दिसंबर 1992 को ढहा दिया गया। प्रश्न यह है कि आखिर एक मंदिर राष्ट्र के पुनर्निर्माण का आधार कैसे बन सकता है? या यह भी पूछा जा सकता है कि आखिर एक मंदिर के निर्माण की इतनी जिद क्यों थी?

आइए सिलसिलेवार बात शुरू करते हैं। और मैं अपने अनुभव से ही शुरू करता हूं। 1988 में हायर सेकेंडरी पास करने के बाद कैरियर से संबंधित एक मसले पर आंदोलन चलाने की बात दिमाग में आई( हम वह पीढ़ी हैं जिसने स्कूल- कॉलेजों में आंदोलन और हड़ताल देखीं हैं और बाद में कराईं भी) लेकिन तब किसी संगठन से कोई जुड़ाव नहीं था। आंदोलन के लिए समर्थन जुटाते- जुटाते विद्यार्थी परिषद से जुड़ गए। छोटे से प्रयास से ही वह मुद्दा समाप्त हो गया। लेकिन विद्यार्थी परिषद का संगठन पसंद आ गया। और उसी समय अयोध्या का यह आंदोलन अपने चरम पर था। आचार्य गिरिराज किशोर, अशोक सिंघल जी, साध्वी ऋतंभरा जी, साध्वी उमा भारती जी आदि की सभाएं और उन सभाओं की ऑडियो कैसेट अयोध्या पर पुस्तकें, लेख आदि सुनते पढ़ते थे।

इतने वर्षों बाद भी उन भाषण के कुछ अंश भुलाए नहीं जा सकते। मंच से बताया जाता था - ‘यह शाही फरमान एक प्रसिद्ध पत्रिका ‘मार्डन रिव्यू’ के जुलाई 1924 के अंक में इस तरह छपा था – ‘शहंशाह हिन्द मुस्लिम मालिकुल जहां बादशाह बाबर के हुक्म व हजरत जलालशाह के हुक्म के बमूजिब अयोध्या में राम जन्मभूमि को मिसार करके उसके जगह उसी के मलबे व मसाले से मस्जिद तामीर करने की इजाजत दे दी गई है। बजरिए इस हुक्मनामे के तुम को इत्तिला किया जाता है कि हिन्दुस्तान के किसी भी सूबे से कोई हिन्दू अयोध्या न आने पाए’। हिन्दुओं ने मीरबांकी की विशाल सेना की ईंट से ईंट बजा दी. जमकर संघर्ष हुआ, मंदिर के पुजारी, साधु संत, निकटवर्ती राजाओं के सैनिक और साधारण नागरिक सभी ने मंदिर की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी। कई लेखकों ने इस बात का उल्लेख किया कि अंग्रेज इतिहासकार और मीरबांकी के प्रशासनिक अधिकारी हेमिल्टन ने इस जालिम मुगल सेनापति के कुकृत्यों का परिचय बाराबंकी के गजेटियर में इस प्रकार दिया है – ‘जलालशाह ने हिन्दुओं के खून का गारा बनाकर लखौरी ईंटों को मस्जिद की नींव में लगा दिया। प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहासकार कनिंघम ने लिखा है -‘जन्मभूमि के गिराए जाने के समय हिन्दुओं ने अपनी जान की बाजी लगा दी और 1लाख 73 हजार लाशें गिर जाने के बाद ही मीरबांकी मंदिर को तोप से गिराने में सफल हो सका।’ इतने खून-खराबे के बाद बाबर ने मंदिर के स्वरूप को बिगाड़कर जो मस्जिदनुमा ढांचा खड़ा कर दिया था, उसे हिन्दुओं ने कभी स्वीकार नहीं किया।श्रीराम जन्मभूमि के स्थान पर मंदिर का पुनर्निर्माण करने के लिए हिन्दू समाज ने 76 बार आक्रमण करके 4 लाख से भी ज्यादा बलिदान दिए।

हर भाषण में कम से कम यह तो साफ था कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और योगेश्वर कृष्ण कोई मिथक या किसी कहानीकार की कल्पना नहीं हैं। वे हमारे इतिहास पुरुष हैं। हमारे पूर्वज हैं। हमारे पूर्वज उनके जन्म स्थान पर नहीं पूजे जाएंगे तो कहां पूजे जाएंगे?

नारा लगता था- राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे।

यह नारा अयोध्या की विवादित जमीन को लेकर था। सरकार ढांचे  के पास की जमीन देने को राजी थी। लेकिन आंदोलन के नेतृत्व का कहना था जिस स्थान पर रामजन्म हुआ, हम ठीक उसी स्थान पर मंदिर बनाएंगे। लेकिन आपको कैसे पता कि जन्म यहीं हुआ था? 500 वर्ष पूर्व जिस मंदिर को खंडित किया गया था, उसके गर्भ गृह को ही जन्म स्थान के रूप में मान्यता है इसलिए मंदिर वहीं बनाएंगे।

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1989 में भूमि पूजन का सच क्या है?

1989 में राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे। विश्व हिंदू परिषद मंदिर का शिलान्यास करना चाहती थी। काफी दबाव और अशोक सिंघल जी के प्रभाव में राजीव गांधी ने इसकी इजाजत दे दी। लेकिन शिलान्यास विवादित स्थल से दूर हुआ। इसमें राजीव गांधी के शामिल होने की बात गलत है। जिस स्थान पर शिलान्यास हुआ वहां सिंहद्वार का निर्माण होगा। इसलिए उसे सिंहद्वार का शिलान्यास माना गया।



क्या अब 500 वर्षों में देश में शांति की खातिर उस स्थान के आसपास मंदिर नहीं बना सकते थे?

यह सबसे महत्वपूर्ण है। जिस तरह से मुगल शासक ने उस मंदिर को तोड़ा था और उसके बाद जिस तरह हमारे पूर्वजों ने इसके लिए संघर्ष किया। इसलिए ठीक उस स्थान पर पुन: मंदिर का निर्माण हमारी प्रतिष्ठा का प्रश्न है। हम हमारे पूर्वजों के खोए सम्मान को पाना चाहते हैं। वर्तमान मुस्लिम भी भारत के नागरिक उनके और हमारे पूर्वज एक हैं। भारत के मुसलमानों के पूर्वज मुगल नहीं हैं। पूजा पद्धति बदल जाने से पूर्वज नहीं बदलते। यदि इतिहास के किसी कालखण्ड में कोई गलती हुई है तो उसे सुधारा जाना चाहिए। मुस्लिम समाज को यह समझाने की कोशिश की गई कि यदि वे हिंदुओं को उनके आराध्य का स्थल लौटा देंगे तो दोनों समुदायों के बीच सौहार्द्र बढ़ेगा। लेकिन कट्‌टरपंथियों और राजनीति ने यह होने नहीं दिया।  भारत में मुगल और अंग्रेजों की 1000 साल की गुलामी में अपना सांस्कृतिक गौरव खो चुके सोए हुए हिंदू समाज को भी नींद से जगाना आसान नहीं था। हिंदू समाज को षड्यंत्रपूर्वक न केवल काल्पनिक आधारों पर बांटा गया बल्कि हिंदुओं में एक हीन भावना का निर्माण भी किया गया। इस आंदोलन ने इसे समाप्त कर दिया है। जाति, पंथ, भाषा, क्षेत्र आदि से ऊपर उठकर हिंदू संगठित हुआ है। इसी स्वाभिमान, आत्मविश्वास व राष्ट्रीय गौरव के परिणाम स्वरूप भारत में विभाजनकारी राजनीति जीवन के सभी क्षेत्रों से लुप्त होती जा रही है।

Rammandir-Ayodha-Newspuran-01संपूर्ण देश अब आत्मविश्वास से परिपूर्ण होकर हर क्षेत्र में कल्याणकारी परिवर्तन ला रहा है। भगवान राम से बढ़कर राष्ट्रपुरुष कौन हो सकता है? इसे स्वयं देश के संविधान ने स्वीकार किया है। राष्ट्र पुरुषों की प्रेरक गाथाएं ही इस को परिभाषित करती हैं। । भगवान राम के मंदिर का शीर्ष कलश स्थापित होने तक सभी विभाजनकारी तत्व पूर्ण रूप से निरर्थक व निष्तेज हो जाएंगे और आत्म गौरव स्वाभिमान तथा आत्मविश्वास से युक्त एक नए भारत का संकल्प साकार होगा।

अयोध्‍या में राम मंदिर बनने और अंतिम बार तोड़े जाने तक का इतिहास 

इतिहासकारों के अनुसार कौशल प्रदेश की प्राचीन राजधानी अवध को कालांतर में अयोध्या और बौद्धकाल में साकेत कहा जाने लगा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर था। हालांकि यहां आज भी हिन्दू, बौद्ध एवं जैन धर्म से जुड़े मंदिरों के अवशेष देखे जा सकते हैं। जैन मत के अनुसार यहां आदिनाथ सहित 5 तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। बौद्ध मत के अनुसार यहां भगवान बुद्ध ने कुछ माह विहार किया था।

अयोध्या को भगवान श्रीराम के पूर्वज विवस्वान (सूर्य) के पुत्र वैवस्वत मनु ने बसाया था, तभी से इस नगरी पर सूर्यवंशी राजाओं का राज महाभारतकाल तक रहा। यहीं पर प्रभु श्रीराम का दशरथ के महल में जन्म हुआ था। महर्षि वाल्मीकि ने भी रामायण में जन्मभूमि की शोभा एवं महत्ता की तुलना दूसरे इन्द्रलोक से की है। धन-धान्य व रत्नों से भरी हुई अयोध्या नगरी की अतुलनीय छटा एवं गगनचुंबी इमारतों के अयोध्या नगरी में होने का वर्णन भी वाल्मीकि रामायण में मिलता है।

कहते हैं कि भगवान श्रीराम के पश्चात अयोध्या कुछ काल के लिए उजाड़-सी हो गई थी, लेकिन उनकी जन्मभूमि पर बना महल बरकरार था। भगवान श्रीराम के पुत्र कुश ने एक बार पुन: राजधानी अयोध्या का पुनर्निर्माण कराया। इस निर्माण के बाद सूर्यवंश की 44 वीं पीढ़ी के महाराजा बृहद्बल तक अपने चरम पर रहा। कौशलराज बृहद्बल की मृत्यु महाभारत युद्ध में अभिमन्यु के हाथों हुई थी। महाभारत के युद्ध के बाद अयोध्या उजड़-सी हो गई, मगर श्रीराम जन्मभूमि का अस्तित्व फिर भी बना रहा।

ईसा के लगभग 100 वर्ष पूर्व उज्जैन के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य एक दिन आखेट करते-करते अयोध्या पहुंच गए। थकान होने के कारण अयोध्या में सरयू नदी के किनारे एक आम के वृक्ष के नीचे वे अपनी सेना सहित आराम करने लगे। उस समय यहां घना जंगल हो चला था। कोई बसावट नहीं थी। महाराज विक्रमादित्य को इस भूमि में कुछ चमत्कार दिखाई देने लगे। तब उन्होंने खोज आरंभ की और पास के योगी व संतों की कृपा से उन्हें ज्ञात हुआ कि यह श्रीराम की अवध भूमि है। उन संतों के निर्देश से सम्राट ने यहां एक भव्य मंदिर के साथ ही कूप, सरोवर, महल आदि बनवाए। उन्होंने श्रीराम जन्मभूमि पर काले रंग के कसौटी पत्थर वाले 84 स्तंभों पर विशाल भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। 

विक्रमादित्य के बाद के राजाओं ने समय-समय पर इस मंदिर की देख-रेख की। उन्हीं में से एक शुंग वंश के प्रथम शासक पुष्यमित्र शुंग ने भी मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। पुष्यमित्र का एक शिलालेख अयोध्या से प्राप्त हुआ था जिसमें उसे सेनापति कहा गया है तथा उसके द्वारा दो अश्वमेध यज्ञों के किए जाने का वर्णन है। अनेक अभिलेखों से ज्ञात होता है कि गुप्तवंशीय चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय और तत्पश्चात काफी समय तक अयोध्या गुप्त साम्राज्य की राजधानी थी। गुप्तकालीन महाकवि कालिदास ने अयोध्या का रघुवंश में कई बार उल्लेख किया है।

600 ईसा पूर्व अयोध्या में एक महत्वपूर्ण व्यापार केंद्र था। इस स्थान को अंतरराष्ट्रीय पहचान 5वीं शताब्दी में ईसा पूर्व के दौरान तब मिली जबकि यह एक प्रमुख बौद्ध केंद्र के रूप में विकसित हुआ। तब इसका नाम साकेत था। कहते हैं कि चीनी भिक्षु फा-हियान ने यहां देखा कि कई बौद्ध मठों का रिकॉर्ड रखा गया है। यहां पर 7वीं शताब्दी में चीनी यात्री हेनत्सांग आया था। उसके अनुसार यहां 20 बौद्ध मंदिर थे तथा 3,000 भिक्षु रहते थे और यहां हिन्दुओं का एक प्रमुख और भव्य मंदिर भी था, जहां रोज हजारों की संख्या में लोग दर्शन करने आते थे।

इसके बाद ईसा की 11वीं शताब्दी में कन्नौज नरेश जयचंद आया तो उसने मंदिर पर सम्राट विक्रमादित्य के प्रशस्ति शिलालेख को उखाड़कर अपना नाम लिखवा दिया। पानीपत के युद्ध के बाद जयचंद का भी अंत हो गया। इसके बाद भारतवर्ष पर आक्रांताओं का आक्रमण और बढ़ गया। आक्रमणकारियों ने काशी, मथुरा के साथ ही अयोध्या में भी लूटपाट की और पुजारियों की हत्या कर मूर्तियां तोड़ने का क्रम जारी रखा। लेकिन 14वीं सदी तक वे अयोध्या में राम मंदिर को तोड़ने में सफल नहीं हो पाए।

विभिन्न आक्रमणों के बाद भी सभी झंझावातों को झेलते हुए श्रीराम की जन्मभूमि पर बना भव्य मंदिर 14वीं शताब्दी तक बचा रहा। कहते हैं कि सिकंदर लोदी के शासनकाल के दौरान यहां मंदिर मौजूद था। 14वीं शताब्दी में हिन्दुस्तान पर मुगलों का अधिकार हो गया और उसके बाद ही राम जन्मभूमि एवं अयोध्या को नष्ट करने के लिए कई अभियान चलाए गए। अंतत: 1527-28 में इस भव्य मंदिर को तोड़ दिया गया और उसकी जगह बाबरी ढांचा खड़ा किया गया।

बाबरनामा के अनुसार 1528 में अयोध्या पड़ाव के दौरान बाबर ने मस्जिद निर्माण का आदेश दिया था। अयोध्या में बनाई गई मस्जिद में खुदे दो संदेशों से इसका संकेत भी मिलता है। इसमें एक खासतौर से उल्लेखनीय है। इसका सार है, ‘जन्नत तक जिसके न्याय के चर्चे हैं, ऐसे महान शासक बाबर के आदेश पर दयालु मीर बकी ने फरिश्तों की इस जगह को मुकम्मल रूप दिया।’

मनोज जोशी

ये लेखक के अपने विचार हैं।


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