रंतिदेव ने भगवान से संसार के सारे दुःख माँग लिए -दिनेश मालवीय

रंतिदेव ने भगवान से संसार के सारे दुःख माँग लिए

-दिनेश मालवीय

हमारे शास्त्रों में प्राणि मात्र में ईश्वर के दर्शन करने और सब में समभाव रखने की सीख दी गयी है. हमारे देश में ऐसे अनेक लोग हुए भी हैं. वे सांसारिक लोगों से कुछ अलग हटकर सोचते और करते हैं.

भगवान के भक्तों का दृष्टिकोण दुनिया से अलग ही होता है. दुनिया भगवान से सुख माँगतीहै, जबकि वे उन से दुःख की याचना करते हैं. पांडवों की माता देवी कुंती ने भी भगवान से दुःख ही दुःख माँगा था. आखिर इसका रहस्य क्या है? इसका रहस्य कबीरदास खोल गये हैं कि-"दुःख में सुमिरन सब करें सुख में करे न कोई". दुःख में मनुष्य भगवान कोयाद करता है और सुख में उन्हें भूल जाता है. इसीलिए सच्चे भक्त भगवान से दुःख की याचना करते रहते हैं.

अपने लिए दुःख माँगने की बात तो उपरोक्त वर्णन से समझ आती है, लेकिन एक ऐसे भी भक्त हुए हैं जिन्होंने भगवान से सारे संसार के दुःख माँग लिए. वह भक्त थे रंतिदेव. महान राजा दुष्यंत के वंशज रंतिदेव बहुत दिनों तकराज करने के बाद अपनी रानी और पुत्र के साथ वन में तप करने चले गये. तप करते-करते हुए उन्हें चित्त की ऐसी अवस्था प्राप्त हो गयी कि वह किसी को दुखी नहीं देख सकते थे. किसी भूखे को देखकर उसकी भूख शांत करने के लिए वह कुछ भी कर सकते थे. उनके पास जो भी होता, उसे दे देते थे. इसलिए उन्हें ख़ुद भूखे रह जाना पड़ता था. इसके कारण उनका शरीर बहुत दुर्बल हो गया.

एक बार ऐसा हुआ कि अड़तालीस दिन बिना भोजन और जल के बीत गये. उसके बाद सुन्दर प्रसाद  रूप में उन्हें अन्न-जलप्राप्त हुआ. वे तीनों भोजन करने ही वाले थे कि इतने में एक ब्राह्मण अतिथि आ गये. रंतिदेव ने उन्हें सादर भोजन कराया. इसके बाद एक भूखा शूद्र आ गया. उसे भी उन्होंने भोजन कराया. इसके बाद एक चाण्डाल कुत्तों को लेकर आया और भूख के कारण दीनता दिखाने लगा. दयावश शेष बजे भोजन से उन्होंने उस चाण्डाल और कुत्तों की भूख को संतुष्ट किया.

अब केवल थोड़ा-सा जल ही बचा रह गया. वे उसे पीने ही वाले थे कि एक वनवासी ने आकर कहा -"कि है राजन! तुम बड़े परोपकारी हो. मैं कई दिन का प्यासा हूँ." रंतिदेव ने वह जल भी उसे पिला दिया .

ऐसा दरअसल इसलिए हुआ क्योंकि रंतिदेव को उन सभी में भगवान के अतिरिक्त कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा था. जब राजा ने बिना कष्ट के उपरोक्त सभी का कष्ट दूर करदिया, तो इससे प्रसन्न होकर भगवान उनके सामने प्रकट हो गये. असल में इन सब रूपों में स्वयं भगवान ही आकर उनके भाव की परीक्षा ले रहे थे. भगवान् ने रंतिदेव से वर माँगने को कहा. रंतिदेव ने कहा कि संसार के सभीसुख-भोग मिथ्या और तुच्छ हैं.आप मुझे संसारके सभी प्राणियों के पापों का फल भोगने का वर देने का कष्ट करें. मैं तो केवल यही चाहता हूँ कि सम्पूर्ण प्राणियों के ह्रदय में स्थित हो जाऊँ और उनका सारा दुःख मैं ही सहन करूँ, जिससे और किसी प्राणी को दुःख न हो.

इसका प्रसंग का सन्देश यही है कि तत्वज्ञ व्यक्ति विद्या और विनय से युक्त होते हैं और ब्राहमण, चांडालतथा पशुओं में भी समभाव रखते हैं.

NEWS PURAN DESK 1



हमारे बारे में

न्‍यूज़ पुराण (PURAN MEDIA GROUP)एक कोशिश है सत्‍य को तथ्‍य के साथ रखने की | आपके जीवन में ज्ञान ,विज्ञान, प्रेरणा , धर्म और आध्‍यात्‍म के प्रकाश के विस्‍तार की |
News Puran is a humble attempt to present the truth with facts. To spread the light of knowledge, promote scientific temper, inspiration, religion and spirituality in your life.


संपर्क करें

0755-3550446 / 9685590481



न्‍यूज़ पुराण



समाचार पत्रिका


श्रेणियाँ