यम और रावण के युद्ध की गति – रावण की त्रैलोक्य विजय – 49

यम और रावण के युद्ध की गति.
Ravan-ki-Katha-49
रावण की त्रैलोक्य विजय -49 
रावण और यमराज के मध्य निरंतर सात दिनों और सात रातों तक भीषण संग्राम चलता रहा। यमराज ने रावण को भयंकर क्षति पहुंचाई थी। यमराज धे भी तो देवताओं के चार लोकपालों -इंद्र,वरुण,कुबेर और यम में से एक थे। रावण अपने अग्रज कुबेर को परास्त कर ही चुका था। यमराज से युद्घ चल रहा था।
यमराज अप्रितिम योद्घा थे। उनके आयुधों ने रावण को पीड़ित कर रखा था। उसकी छाती लहूलुहान थी। घाव पर घाव। शल्यों (बाणों) के प्रहार ने उसको व्यथित कर दिया था। वह यमराज के सामने टिक नहीं पा रहा था। प्रतिशोध नहीं ले पा रहा था। युद्ध चर्चित और रोमांचक बिंदु पर पहुंच चुका था। देवता, गंधर्व,नाग और ऋषिगण आदि ,रावण का अंत चाहने वाले,ऐसे सभी संबंधित युद्ध देखने आ चुके थे।

यम की मार से सुध बुध खोकर एक बार तो रावण युद्ध से विमुख ही हो गया। -'सप्तरात्रं कृतः संख्ये विसंज्ञो विमुखो रिपु। ' परन्तु पराजित नहीं हुआ था। दोनों सेनाओं में संघर्ष और मारकाट बढ़ती ही जा रही थी। योद्घा आते। मोर्चा सम्हालते।अपने पक्ष और प्रतिष्ठा के लिये स्वयं का सर्वस्व "प्राणों "का उत्सर्ग करते। जो घायल अथवा मूर्छित होते, वे युद्ध चिकित्सकों के सिपुर्द कर दिये जाते। और वे...! सब स्वस्थ होते ही मृत्यु से टकराने पुनः आ जाते। युद्ध कर्म करने वाली यह जाति ( कर्म से क्षत्रिय ) अपने समक्ष ही अपने संबंधियों की मृत्यु से विचलित नहीं होती। युद्ध में पिता के मृत्यु के आगोश में जाते ही, उसका योद्घा पुत्र विलाप नहीं करता। वह तो शत्रुपक्ष को संताप ही देता ।

ऐसे वीरोत्तेजक,बलिदानी और आत्मोत्सर्ग के वातावरण में रावण की चेतना लौटी। सभी लोकपालों पर विजय प्राप्त करने निकला यह दुर्घर्ष योद्धा यम के सामने जा पहुंचा। रावण ने धनुष उठाया।फिर बाणों की बौछार करने लगा।

प्रेतराज यम और रावण के युद्ध से ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे मानों आकाश बाणों से ठस गया हो। रावण और उसकी चतुरंगिणी सेना अब शत्रु का प्रतिकार मात्र नहीं कर रही थी। वरन घातक,मारक और शोधों से प्रतिष्ठित बाणों से प्रहार कर रही थी।

रावण की पुनर्वापसी और प्रबल प्रतिरोध ने यमराज को क्रोधाभिभूत कर दिया। अब यम के सेना नायक मृत्यु और काल ने वैवस्वत यम से रावण को समाप्त करने की आज्ञा मांगी। मृत्यु ने कहा -यह मेरी स्वभाव सिद्ध मर्यादा है कि मुझ से भिड़ कर कोई भी जीवित नहीं रह सकता है।काल ने भी अपने स्वामी यमराज से इसी प्रकार से विनती की। दोंनों ही स्वामी की सहायता और युद्ध सेवा करने के लिए व्यग्र थे। तत्पर और तैयार थे। परन्तु यमराज ने उनको अनुमति न देकर स्वयं ही कुछ ठान रखा था।

यमराज के इसी निर्णय ने ब्रह्मा जी को चौकन्ना कर दिया। पितामह के साथ युद्ध के दृश्यों को देख रहे देवता और गंधर्व भी भयभीत हो रहे थे। वे समझ रहे थे कि अब कोई अप्रत्याशित अनर्थ होने वाला है।

लाल, लाल आंखों और रोष से भरे यमराज ने अपना "कालदंड "निकाल ही लिया। फिर उन्होंने कालपाश (जिसको सहयोग से कालदंड चलाया जाता था) को संबद्ध किया। उपस्थित देवताओं की भी सांसें रूकने लगीं। सभी बेचैन हो गये। हाथ पांव धुजने लगे। परमपिता को अपने वचनों की मर्यादा का स्मरण हुआ। ब्रह्मा जी ही देवताओं के लोकपालों की नियुक्ति करते थे। उन्हीं ने लोकपाल यम को कालदंड जैसा घातक आयुध प्रदान किया था। जिसके उपयोग के बाद परिणाम मृत्यु और सिर्फ मृत्यु ही होता। ब्रह्मा जी को अपने और भी वचन याद आ चुके थे। युवावस्था में रावण, कुंभकर्ण और विभीषण को गोकर्ण (गोवा) में उनकी तपस्या उपरांत दिया गया वरदान याद आया । पितामह को पुत्रेष्टि यज्ञ के समय अपने स्वयं के आदेश में किये गये संशोधन का स्मरण भी रहा। जिसमें वे रावण की मृत्यु को सिर्फ मनुष्य के द्वारा ही निर्धारित कर चुके थे।

अपने ही बोल वचनों ,आश्वासनों और वरदानों की उलझनों में फंसे ब्रह्मा जी के समक्ष सबसे बडी़ चुनौती तो महावीर रावण के प्राण बचाने की थी। यमराज के कालदंड और रावण के प्राणों के मध्य बस क्षणों का फासला था। यह फासला कितना बढ़ना और घटना था, यह मात्र ब्रह्मा जी पर निर्भर था। वे शवों के ढे़रों और लोहित की नदियों के बीच से होते हुए, युद्ध क्षेत्र में जा पहुंचे।

माजरा भांप और अपनी प्रतिष्ठा की खातिर पितामह तत्काल दोनों योद्धाओं के मध्य खडे़ हो गये। यमराज जो उनके ही द्वारा मनोनीत लोकपाल थे,उनसे अपना निर्णय वापस लेने को कहा। यह हम पीछे बता ही चुके हैं। इस प्रकार ब्रह्मा जी के हस्तक्षेप से रावण के प्राण बचे। किंतु यमराज ने भी तत्काल यह कहते हुए कि -अब युद्ध का प्रयोजन ही क्या...? पुरी को वापस चले गए।

किंतु रावण ने कोई चूक न करते हुए स्वयं को विजयी घोषित कर लिया। जैसा कि उसने बलूचिस्तान में मरुत राजा संवर्त से भी इसी प्रकार विजय प्राप्त की थी। मरूत यज्ञ कर रहे थे। और रावण ने स्वयं को विजयी घोषित कर लिया था।

लेखक भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार व धर्मविद हैं |


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