क्या कारण हैं कि सम्मोहन या तंत्र-मन्त्र के प्रयोग में लगे लोगों की आंखें तनावग्रस्त और डरावनी होती हैं ?

सम्मोहन या तंत्र-मन्त्र के प्रयोग में लगे लोगों की आंखें तनावग्रस्त और डरावनी होती हैं ? क्या यह एक दुष्ट कला है? क्या आंखों की गति रोककर ऊर्जा रूपांतरित की जा सकती है ?
जो लोग सम्मोहन -विद्या जैसी चीजों का प्रयोग करते हैं उनकी आंखें तनावग्रस्त होंगी, यह साफ ही है। कारण यह है कि वे बलपूर्वक अपनी ऊर्जा को आंख के माध्यम से प्रवाहित करने की कोशिश करते हैं। वे किसी को प्रभावित करने के या किसी पर अधिकार जमाने के इरादे से अपनी समस्त ऊर्जा को आंख के पास इकट्ठा कर लेते हैं।उनकी आंखें तनाव से भर जाएंगी; क्योंकि वे आंखों में उतनी ऊर्जा भर देते हैं जितनी ऊर्जा वे झेल नहीं सकतीं। उनकी आंखें लाल हो जाती हैं और तन जाती हैं और उन्हें देखकर ही आप  सहसा कांपने लग सकते हो। बात यह है कि वे अपनी आंखों का राजनीतिक ढंग से उपयोग कर रहे हैं। अगर वे आपकी  तरफ देखते हैं तो वे आंखों द्वारा अपनी ऊर्जा भेजकर आप  पर मालकियत करना चाहते हैं।और आंख के द्वारा किसी पर मालकियत करना आसान है।तो यह एक दुष्ट कला है, काली साधना है।काली साधना का, जादूटोने का अर्थ है कि आप  दूसरे पर प्रभुत्व जमाने के लिए अपनी ऊर्जा का अपव्यय कर रहे हो। और शुभ साधना उसे कहते हैं जिसमें उन्हीं उपायों का इस्तेमाल आप  अपने पर प्रभुत्व के लिए, अपना स्वामी आप बनने के लिए करते हो।
यह केवल आदमियों पर ही घटने वाली दुलर्भ चीज नहीं है; पशु जगत में भी यह घटित होता है। अनेक पशु हैं जो अपने शिकार की आंखों में घूरते हैं। और यदि शिकार ने भी उनकी आंखों से आंखें मिला लीं तो वह गया।
किसी शिकारी के सामने अचानक एक सिंह प्रकट हो जाए और शिकारी निहत्था हो तो वह क्या करे? ऐसी हालत में कुशल शिकारी सदा एक काम करते हैं। शिकारी सिंह की आंखों में आंख डालकर घूरेगा।अब बात इस परनिर्भर है कि शिकारी की आंखें ज्यादा चुंबकीय हैं या सिंह की।
आंख के जरिए आप  अपनी समस्त ऊर्जा को प्रवाहमान कर सकते हो; लेकिन जब ऐसा करोगे तो आपकी  आंखें तनाव से भर जाएंगी, आपकी  नींद खो जाएगी, आप  आराम में न रह सकोगे। जो लोग भी दूसरों पर मालकियत करने में लगे हैं वे चैन से नहीं रह सकते।
जो दूसरों पर मालकियत करने की चेष्टा में लगे हैं, उनकी आंखें तनी होंगी, अशुभ होंगी। उनकी आंखों में आपको  किसी निर्दोषता की, पवित्रता की खबर नहीं मिलेगी। आपको  उनमें आकर्षण जरूर मिलेगा; लेकिन वह आकर्षण शराब जैसा होगा। आपको  उनकी तरफ एक चुंबकीय खिंचाव अनुभव होगा; लेकिन वह खिंचाव आपको  गुलाम बनाने वाला होगा, मुक्त करने वाला नहीं।
यही कारण है कि बुद्ध, महावीर, जीसस निरंतर जोर देकर कहते रहे, कि जिस क्षण आप  आध्यात्मिक खोज पर निकलो, तो सबके लिए ..शत्रुओं के लिए भी प्रेम से भरकर ही निकलो।
इसलिए जब किसी आध्यात्मिक साधना से कुछ उपलब्ध हो तो उसे छिपाए रखना। उसका प्रचार मत करो; उसका उपयोग मत करो। उसे अछूता, शुद्ध रहने दो। तभी वह आंतरिक रूपांतरण के काम आएगा। अगर उसका बाहरी उपयोग करोगे तो वह व्यर्थ चला जाएगा।
अगर आप  अपनी आंखें बंद करो तो कभीकभी आपको  वहां थोड़ा तनाव, थोड़ी बेचैनी अनुभव हो सकती है। इस संबंध में कुछ बातें उपयोगी हो सकती हैं। एक तो यह कि जब आंखें बंद करो तो उसके संबंध में तनाव न लो; उन्हें शिथिल रहने दो। आप  आंखों को जबरदस्ती भी बंद कर सकते हो, तब तनाव पैदा होगा, तब आपकी  आंखें थक जाएंगी और आपको  भीतर बेचैनी महसूस होगी। पहले चेहरे को शिथिल होने दो, फिर आंखों को शिथिल होने दो और तब उन्हें बंद होने दो।आंखों को बंद होने दो ..उन्हें बंद मत करो। विश्राम में रहो.. पलकों को गिरने दो और आंखों को बंद होने दो। उनके साथ जबरदस्ती मत करो। जबरदस्ती करना अच्छा नहीं है।
आप ने प्रकाश देखा होगा जिसका स्रोत होता है ..चाहे वह सूर्य से आए, चांद -तारों से आए और चाहे दीए से आए। उसका कोई न कोई स्रोत होता है। लेकिन जब ऊर्जा तीसरी आंख से होकर बहती है तब एक स्रोतहीन प्रकाश का उदय होता है। यह कहीं से आता नहीं है; यह बस है।यही कारण है कि उपनिषद कहते हैं कि परमात्मा स्रोतहीन प्रकाश है। वह सूरज या ज्योतिशिखा की भाति नहीं है; उसका कहीं भी कोई स्रोत नहीं है, केवल प्रकाश है, रोशनी हैमानो वह ऊषाकाल है जब कि रात तो चली गई और सूर्य उदित नहीं हुआ है। दोनों के बीच जो ऊषाकाल है, यह वह है। या यह संध्या की गोधूलि है, जब सूर्य डूब गया है और रात अभी आई नहीं है। इसलिए उसे संध्या भी कहते हैंदिन और रात की संधिवेला।
और यही कारण है कि हिंदुओं ने ध्यान के लिए संध्या को उचित समय माना है। वे ध्यान को संध्या ही कहने लगे फिर। वह ठीक मध्यवेला है; जब दिन जा चुका है और रात आने को होती है। क्यों? यह महज प्रतीक है। प्रकाश तो है, लेकिन स्रोतहीन। वही बात अंतस से घटित होगीस्रोतहीन प्रकाश घटित होगा। उसकी कल्पना मत करो, उसकी प्रतीक्षा करो। और आखिरी बात याद रखने की यही है उसकी कल्पना मत करो।
आप  कुछ भी कल्पना कर सकते हो। इस लिए आपको  बहुत सी बातें बताना खतरनाक है, आप  उनकी कल्पना करने लगोगे। आप  आंखें बंद कर लोगे और कल्पना में देख लोगे कि तीसरी आंख खुल रही है। कल्पना से आप  प्रकाश भी देख लोगे। लेकिन यह कल्पना मत करो। कल्पना से बचो। आंखें बंद करो और प्रतीक्षा करो। जो भी आए, उसे अनुभव करो, उसके साथ सहयोग करो। लेकिन प्रतीक्षा करो। आगे की छलांग मत लो;अन्यथा कुछ भी नहीं होगा। तुम्हारे हाथ एक सपना आ सकता है-सुंदर आध्यात्मिक सपना..और कुछ नहीं।
अगर सचमुच आपको  वह प्रकाश दिखाई पड़े जो तीसरी आंख से आता है तो आप  दूसरे ही व्यक्ति हो जाओगे। और तब आपको  किसी को भी बताने की जरूरत नहीं होगी। लोग जान लेंगे कि आप  दूसरे व्यक्ति हो गए हो। आप  इसे छिपा भी नहीं सकते; यह बात लोगों के अनुभव में आ जाती है। आप  जहां भी जाओगे वहा लोग महसूस करेंगे कि इस आदमी को कुछ हुआ है। इसलिए कल्पना मत करो।आप  विधि का प्रयोग करो और प्रतीक्षा करो और चीजों को अपने आप ही घटित होने दो। आगे की छलांग मत लो।
 

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