संदर्भ तालिबानी फरमान, महान गायक मोहम्मद रफी भी आ गये थे मौलानाओं की बातों में.. दिनेश मालवीय


स्टोरी हाइलाइट्स

नदियाँ गा रही हैं. झरने गुनगुना रहे हैं. पक्षी चहक रहे हैं. भौरे गुनगुन कर रहे हैं. हवाओं का स्पर्श पाकर वृक्षों के पत्ते...

संदर्भ तालिबानी फरमान, महान गायक मोहम्मद रफी भी आ गये थे मौलानाओं की बातों में.. दिनेश मालवीय नदियाँ गा रही हैं. झरने गुनगुना रहे हैं. पक्षी चहक रहे हैं. भौरे गुनगुन कर रहे हैं. हवाओं का स्पर्श पाकर वृक्षों के पत्ते और डालियाँ नृत्य कर रही हैं. पूरी प्रकृति एक लयबद्ध रूप से चल रही है. इसका कोई भी घटक नीरस नहीं है. साँसों में भी एक संगीत है. कल्पना कीजिए कि, कहीं प्रकृति का कोई भी अवयव इतना ले और तालबद्ध नहीं होता, तो जीवन कितना नीरस और अर्थहीन होता. गीत, संगीत, चित्रकला, नृत्य सहित सभी कलाओं ने सदा से मनुष्य के जीवन के भीतर स्थित आनंद के स्रोत को जगाने का कार्य किया है. आनंद का स्रोत तो मनुष्य के भीतर है, लेकिन उसे जगाने के लिए कोई उद्दीपक तो चाहिए. कलाओं ने उद्दीपक का कार्य करके मनुष्य को आनंदित रहने में बहुत मदद की है. भारत में तो कला के सभी स्वरूपों को इतना अधिक महत्त्व दिया गया है कि, उन्हें ईश्वर की पूजा का ही एक रूप मान लिया गया है. नृत्य, संगीत, काव्य, चित्रकला आदि के माध्यम से कलाकार अपने आराध्य की साधना करता है. जो फल योगियों को योग से, ध्यानियों को ध्यान से, भक्तों को भक्ति से मिलता है, वही फल कलाकार को उसकी कला की साधना से मिलता है. भारत में विशिष्ट गुणों का मानवीकरण कर उन्हें किसी देवी या देवता का स्वरूप दे दिया गया है. ज्ञान और कला की उपासना करने वालों ने अपने भावों को देवी सरस्वती का रूप दिया है. उनकी प्रतिमा के चार हाथ हैं. ये बहुत प्रतीकात्मक हैं. उनके एक हाथ में वीणा है तो दूसरे हाथ में पुस्तक. तीसरे हाथ से वह वीणावादन कर रही हैं, तो चौथे हाथ में जप की माला धारण किये हैं. इसका अर्थ यह है कि, इन चारों चीजों से मिलकर ही जीवन परिपूर्ण होता है. वीणा संगीत का प्रतीक है, जिसके बिना जीवन नीरस और बोझिल होता है. पुस्तक ज्ञान का प्रतीक है, जिसके बिना इंसान पशु के समान होता है. तीसरे हाथ से वीणा बजायी जा रही है, जिसका अर्थ है कि, बिना कर्म या साधना के संगीत का सृजन नहीं किया जा सकता. जप की माला का अर्थ है कि, ईश्वर की आराधना या उनका स्मरण करने से ही बिना उपरोक्त तीनों चीजों की सार्थकता है. वह सफेद वस्त्र धारण करती हैं, जो शांति का प्रतीक है. भारत के देवी-देवताओंके वाहन भी बहुत प्रतीकात्मक अर्थ लिए हुए हैं. देवी सरस्वती का वाहन हंस है, जो  नीरी-क्षीर विवेक का प्रतीक है. हंस के बारे में कहा जाता है कि उसके सामने पानी मिलकर दूध रख दीजिये, वह दूध ग्रहण कर पानी छोड़ देगा. अर्थात, ज्ञानवान व्यक्ति सार्थक को अपनाकर, निरर्थक का त्याग कर देता है. भारत में नृत्य को ईश्वर की साधना का बहुत प्रमुख अंग माना गया है. भक्त को जब भक्ति का आवेश आता है, तो वह स्वत: ही नाचने लगता है. ऐसा वह कोशिश करके नहीं करता. उसके भीतर से नृत्य का प्रवाह उमड़ता है. चैतन्य महाप्रभु तो नाचते हुए सड़कों और गलियों में में कीर्तन करते चलते थे. उनके साथ चलने वालों के भीतर भी नृत्य का भाव आ जाता था. नृत्य करते हुए चैतन्य समाधि की अवस्था में पहुँच जाते थे. मध्यकाल में महान कृष्ण भक्त मीरा बाई के भीतर भी भक्त के प्रभाव में ऐसा नृत्य उपजा कि, उन्हें अपना महल तक छोड़कर जाना पड़ा. उनके नृत्य के भाव को नहीं समझकर उनके राज परिवार ने इसे अपना अपमान माना. सूफी संत भी नृत्य करते-करते वज्द यानी समाधि या trance की अवस्था में पहुँच जाते थे. उनके खानकाह में कव्वाली के आयोजन होते थे. वे ईश्वर को अपना प्रेमी यानी महबूब मानकर उसकी आराधना करते थे. वे स्वयं को ईश्वर की महबूबा मानकर उसके प्रेम में नाचते थे. उनकी कव्वाली के आयोजन बहुत दिव्यता लिए हुए होते थे. इसी तरह संगीत को भी भारत में ईश्वर की आराधना का एक प्रमुख अंग माना गया है. इसके सबसे सच्चे उदाहरण देवर्षि नारद हैं, जो सदा वीणा बजाते हुए ‘नारायण नारायण’ का जाप करते रहते हैं. हनुमानजी ने भी संगीत का गहरा प्रशिक्षण लिया था और उनको संगीत का बहुत श्रेष्ठ ज्ञान था. गंदर्भ आदि तो गायन में प्रवीण होते ही हैं. मध्य काल में महान गयाक तानसेन और बेजू बावरा के गुरु स्वामी हरिदास ने संगीत के माध्यम से भक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया. वे ब्रह्म महूर्त में जब भजन गाते थे तो, आत्मविभोर होकर समाधिस्थ हो जाते थे. सारा परिवेश भक्ति से भीग जाता था. एक बार सम्राट अकबर ने अपने दरबारी गायक तानसेन से कहा कि, तुम इतना अच्छा गाते हो, तुम्हारा गुरु कौन है. तानसेन ने स्वामी हरिदास का नाम बताया. अकबर ने कहा कि, उन्हें दरबार में बुलाओं, हम उनको सुनना चाहते हैं. तानसेन ने कहा कि, गुरुदेव अपनी कुटिया के बाहर कहीं नहीं जाते. उन्हें यहाँ लाना संभव ही नही है. अकबर ने पूछा कि,यदि मैं उन्हें सुनना चाहूँ तो यह कैसे संभव हो सकता है ? तानसेन ने कहा कि आप मेरे साथ उनकी कुटी पर चलिए. वे किसी के सामने नहीं गाते, सिर्फ ईश्वर के लिए गाते हैं. उसने एक युक्ति बताई कि, ब्रह्म महूर्त में में जब गुरुदेव गा रहे हों तो आप उनकी कुटिया के बाहर झाड़ियो में छिपकर बैठ जाइए और उनका गायन सुन लीजिये. अकबर ने ऐसा ही किया. जब स्वामी हरिदास ने भजन गाना शुरू किया, तो अकबर की आँखों से निरंतर अश्रु प्रवाह होने लगा. वह चेतना की बहुत ऊँची अवस्था में पहुँच गया. बाद में अकबर ने कुटिया में जाकर उनके दर्शन किए. बाहर आकर अकबर ने तानसेन से कहा कि, तुम्हारे गुरु को सुनने के बाद लगा कि, तुम तो कुछ हो ही नहीं. तानसेन ने कहा कि, यह सच है, क्योंकि मैं एक देश के बादशाह को खुश करने के लिए गाता हूँ, जबकि मेरे गुरुदेव संसार के स्वामी के लिए गाते हैं. ऐसे भी कुछ लोग हुए हैं, जिन्होंने मानव के कलाओं के प्रति सहज-स्वाभाविक प्रेम को बाधित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कुछ शास्त्रों और साधना पद्धतियों में गीत- संगीत आदि को ईश्वर के मार्ग में बाधक अवश्य कहा गया है, लेकिन यह बात साधना के जरिये चेतना की बहुत ऊँची अवस्था वाले साधकों के लिए है. ऐसा नहीं लगता कि, जनसामान्य को कलाओं से दूर रहने के लिए कहा गया है. बहरहाल, शास्त्रों में जो भी लिखा हो, लेकिन उन्हें पढ़ने वाले तो वही समझेंगे जो वे समझ सकते हैं. हाल ही में अफगानिस्तान में तालिबान “सरकार” ने गीत-संगीत आदि पर पाबंदी लगा दी है. खैर, यह उनका अपना मामला है, जिसमें किसी दूसरे का कुछ कहना उचित नहीं है. लेकिन इस तरह की व्याख्याएं होती रही हैं. भारत के महान पार्श्वगायक मोहम्मद रफी के साथ भी ऐसा ही हुआ. जब वह हज करने गये तो मौलवियों ने उनसे कहा कि अब आप हाजी हो गये हैं, लिहाजा गाना छोड़ दीजिये. रफी  साहब बहुत भोले इंसान थे. उन्होंने वापस घर लौटकर अपने घर वालों को बताया कि अब उन्होंने नहीं गाने का फैसला किया है. इस पर रफी साहब के भाइयों ने उन्हें समझाया कि, आपको जो गला मिला है, वह ख़ुदा की देन है. आपके गाने से लाखों लोगों का मन आनंद में झूमने लगता है. वे अपना दुःख भूल जाते हैं. इसके अलावा, आपको गाने के सिवा कुछ आता भी नहीं है, तो घर-परिवार कैसे चलेगा. लिहाजा रफी साहब ने फिर गाना शुरू कर दिया. व्यक्ति को गीत,संगीत, नृत्य, चित्रकला या किसी अन्य कला से लगाव अवश्य रखना चाहिए, जिससे जीवन को नीरस होने से बचाया जा सके.